भाग-८८(88) सेना सहित भरत की चित्रकूट यात्रा का वर्णन

 


यात्रा करनेवाली उस विशाल वाहिनी से पीड़ित हो वनवासी यूथपति मतवाले हाथी आदि अपने यूथों के साथ भाग चले। रीछ, चितकबरे मृग तथा रुरु नामक मृग वनप्रदेशों में, पर्वतों में और नदियों के तटों पर चारों ओर उस सेना से पीड़ित दिखायी देते थे। महान् कोलाहल करनेवाली उस विशाल चतुरंगिणी सेना से घिरे हुए धर्मात्मा दशरथनन्दन भरत बड़ी प्रसन्नता के साथ यात्रा कर रहे थे। 

जैसे वर्षा ऋतु मेघों की घटा आकाश को ढक लेती है, उसी प्रकार महात्मा सेना ने दूरतक के भूभाग को आच्छादित कर लिया था। भरत की समुद्र जैसी उस विशाल, घोड़ों के समूहों तथा महाबली हाथियों से भरी और दूर तक फैली हुई वह सेना उस समय बहुत देर तक दृष्टि में ही नहीं आती थी। 

दूर तक का रास्ता तय कर लेने पर जब भरत की सवारियाँ बहुत थक गयीं, तब श्रीमान् भरत ने मन्त्रियों में श्रेष्ठ वशिष्ठजी से कहा - ब्रह्मन्! मैंने जैसा सुन रखा था और जैसा इस देश का स्वरूप दिखायी देता है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि भरद्वाजजी ने जहाँ पहुँचने का आदेश दिया था, उस देश में हमलोग आ पहुँचे हैं। जान पड़ता है यही चित्रकूट पर्वत है तथा वह मन्दाकिनी नदी बह रही है। यह पर्वत के आस-पास का वन दूर से नील मेघ के समान प्रकाशित हो रहा है। इस समय मेरे पर्वताकार हाथी चित्रकूट के रमणीय शिखरों का अवमर्दन कर रहे हैं। ये वृक्ष पर्वतशिखरों पर उसी प्रकार फूलों की वर्षा कर रहे हैं, जैसे वर्षाकाल में नील जलधर मेघ उन पर जल की वृष्टि करते हैं। 

इसके बाद भरत शत्रुघ्न से कहने लगे - शत्रुघ्न ! देखो, इस पर्वत की उपत्यका में जो देश है, जहाँ पर किन्नर विचरा करते हैं, वही प्रदेश हमारी सेना के घोड़ों से व्याप्त होकर मगरों से भरे हुए समुद्र के समान प्रतीत होता है। सैनिकों के खदेड़े हुए ये मृगों के झुंड तीव्र वेग से भागते हुए वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे शरत्-काल के आकाश में हवा से उड़ाये गये बादलों के समूह सुशोभित होते हैं। 

‘ये सैनिक अथवा वृक्ष मेघ के समान कान्तिवाली ढालों से उपलक्षित होने वाले दक्षिण भारतीय मनुष्यों के समान अपने मस्तकों अथवा शाखाओं पर सुगन्धित पुष्प गुच्छमय आभूषणों को धारण करते हैं। यह वन जो पहले जनरव - शून्य होने के कारण अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था, वही इस समय हमारे साथ आये हुए लोगों से व्याप्त होने के कारण मुझे अयोध्यापुरी के समान प्रतीत होता है।' 

'घोड़ों की टापों से उड़ी हुई धूल आकाश को आच्छादित करके स्थित होती है, परंतु उसे हवा मेरा प्रिय करती हुई- सी शीघ्र ही अन्यत्र उड़ा ले जाती है। शत्रुघ्न! देखो, इस वन में घोड़ों से जुते हुए और श्रेष्ठ सारथियों द्वारा संचालित हुए ये रथ कितनी शीघ्रता से आगे बढ़ रहे हैं। जो देखने में बड़े प्यारे लगते हैं उन मोरों को तो देखो। ये हमारे सैनिकों के भय से कितने डरे हुए हैं। इसी प्रकार अपने आवास-स्थान पर्वत की ओर उड़ते हुए अन्य पक्षियों पर भी दृष्टिपात करो।' 

‘निष्पाप शत्रुघ्न! यह देश मुझे बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता है। तपस्वी जनों का यह निवासस्थान वास्तव में स्वर्गीय पथ है। इस वन में मृगियों के साथ विचरने वाले बहुत से चितकबरे मृग ऐसे मनोहर दिखायी देते हैं, मानो इन्हें फूलों से चित्रित — सुसज्जित किया गया हो। मेरे सैनिक यथोचित रूप से आगे बढ़ें और वन में सब ओर खोजें, जिससे उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का पता लग जाये।' 

भरत का यह वचन सुनकर बहुत-से शूरवीर पुरुषों ने हाथों में हथियार लेकर उस वन में प्रवेश किया। तदनन्तर आगे जाने पर उन्हें कुछ दूर पर ऊपर को धुआँ उठता दिखायी दिया। 

उस धूमशिखा को देखकर वे लौट आये और भरत से बोले – 'प्रभो! जहाँ कोई मनुष्य नहीं होता, वहाँ आग नहीं होती। अत: श्रीराम और लक्ष्मण अवश्य यहीं होंगे। यदि शत्रुओं को संताप देनेवाले पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ न हों तो भी श्रीराम-जैसे तेजस्वी दूसरे कोई तपस्वी तो अवश्य ही होंगे। 

उनकी बातें श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा मानने योग्य थीं, उन्हें सुनकर शत्रुसेना का मर्दन करनेवाले भरत ने उन समस्त सैनिकों से कहा - तुम सब लोग सावधान होकर यहीं ठहरो! यहाँ से आगे न जाना। अब मैं ही वहाँ जाऊँगा। मेरे साथ सुमन्त्र और धृति भी रहेंगे। 

उनकी ऐसी आज्ञा पाकर समस्त सैनिक वहीं सब ओर फैलकर खड़े हो गये और भरत ने जहाँ धुआँ उठ रहा था, उस ओर अपनी दृष्टि स्थिर की। भरत के द्वारा वहाँ ठहरायी गयी वह सेना आगे की भूमि का निरीक्षण करती हुई भी वहाँ हर्षपूर्वक खड़ी रही; क्योंकि उस समय उसे मालूम हो गया था कि अब शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी से मिलने का अवसर आने वाला है। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-८८(88) समाप्त !

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