परिवार सहित भरत इच्छानुसार मुनि का आतिथ्य ग्रहण करके रात भर आश्रम में ही रहे। फिर सबेरे जाने की आज्ञा लेने के लिये वे महर्षि भरद्वाज के पास गये।
पुरुषसिंह भरत को हाथ जोड़े अपने पास आया देख भरद्वाज जी अग्निहोत्र का कार्य करके उनसे बोले – निष्पाप भरत! क्या हमारे इस आश्रम में तुम्हारी यह रात सुख से बीती है? क्या तुम्हारे साथ आये हुए सब लोग इस आतिथ्य से संतुष्ट हुए हैं? यह बताओ।
तब भरत ने आश्रम से बाहर निकले हुए उन उत्तम तेजस्वी महर्षि को प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर कहा - भगवन्! मैं सम्पूर्ण सेना और सवारी के साथ यहाँ सुखपूर्वक रहा हूँ तथा सैनिकों सहित मुझे पूर्णरूप से तृप्त किया गया है। सेवकों सहित हम सब लोग ग्लानि और संताप से रहित हो उत्तम अन्न-पान ग्रहण करके सुन्दर गृहों का आश्रय ले बड़े सुख से यहाँ रातभर रहे हैं।
‘भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अपनी इच्छा के अनुसार आपसे आज्ञा लेने आया हूँ और अपने भाई के समीप प्रस्थान कर रहा हूँ; आप मुझे स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखिये। धर्मज्ञ मुनीश्वर! बताइये, धर्मपरायण महात्मा श्रीराम का आश्रम कहाँ है? कितनी दूर है? और वहाँ पहुँचने के लिये कौन-सा मार्ग है? इसका भी मुझसे स्पष्टरूप से वर्णन कीजिये।
इस प्रकार पूछे जाने पर महातपस्वी, महातेजस्वी भरद्वाज मुनि ने भाई के दर्शन की लालसा वाले भरत को इस प्रकार उत्तर दिया – भरत! यहाँ से ढाई योजन (दस कोस ) - की दूरी पर एक निर्जन वन में चित्रकूट नामक पर्वत है, जहाँ के झरने और वन बड़े ही रमणीय हैं (प्रयाग से चित्रकूट की आधुनिक दूरी लगभग २८ कोस है)।
‘उसके उत्तरी किनारे से मन्दाकिनी नदी बहती है, जो फूलों से लदे सघन वृक्षों से आच्छादित रहती है, उसके आस-पास का वन बड़ा ही रमणीय और नाना प्रकार के पुष्पों से सुशोभित है। उस नदी के उस पार चित्रकूट पर्वत है। तात! वहाँ पहुँचकर तुम नदी और पर्वत के बीच में श्रीराम की पर्णकुटी देखोगे। वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चय ही उसी में निवास करते हैं।'
‘सेनापते! तुम यहाँ से हाथी-घोड़ों से भरी हुई अपनी सेना लेकर पहले यमुना के दक्षिणी किनारे से जो मार्ग गया है, उससे जाओ। आगे जाकर दो रास्ते मिलेंगे, उनमें से जो रास्ता बायें दाबकर दक्षिण दिशा की ओर गया है, उसी से सेना को ले जाना। महाभाग ! उस मार्ग से चलकर तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन पा जाओगे।
'अब यहाँ से प्रस्थान करना है' – यह सुनकर महाराज दशरथ की स्त्रियाँ, जो सवारी पर ही रहने योग्य थीं, सवारियों को छोड़कर ब्रह्मर्षि भरद्वाज को प्रणाम करने के लिये उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं। उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दीन हुई देवी कौशल्या ने, जो काँप रही थीं, सुमित्रा देवी के साथ अपने दोनों हाथों से भरद्वाज मुनि के पैर पकड़ लिये। तत्पश्चात् जो अपनी असफल कामना के कारण सब लोगों के लिये निन्दित हो गयी थी, उस कैकेयी ने लज्जित होकर वहाँ मुनि के चरणों का स्पर्श किया और उन महामुनि भगवान् भरद्वाज की परिक्रमा करके वह दीनचित्त हो उस समय भरत के ही पास आकर खड़ी हो गयी।
तब महामुनि भरद्वाज ने वहाँ भरत से पूछा - रघुनन्दन ! तुम्हारी इन माताओं का विशेष परिचय क्या है? यह मैं जानना चाहता हूँ।
भरद्वाज के इस प्रकार पूछने पर बोलने की कला में कुशल धर्मात्मा भरत ने हाथ जोड़कर कहा - भगवन्! आप जिन्हें शोक और उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दुःखी देख रहे हैं, जो देवी-सी दृष्टिगोचर हो रही हैं ये मेरे पिता की सबसे बड़ी महारानी कौशल्या हैं। जैसे अदिति ने धाता नामक आदित्य को उत्पन्न किया था, उसी प्रकार इन कौशल्या देवी ने सिंह के समान पराक्रमसूचक गति से चलने वाले पुरुषसिंह श्रीराम को जन्म दिया है।
'इनकी बायीं बाँह से सटकर जो उदास मन से खड़ी हैं तथा दुःख से आतुर हो रही हैं और आभूषणशून्य होने से वन के भीतर झड़े हुए पुष्पवाले कनेर की डाल के समान दिखायी देती हैं, ये महाराज की दूसरी रानी देवी सुमित्रा हैं। सत्यपराक्रमी वीर तथा देवताओं के तुल्य कान्तिमान् वे दोनों भाई राजकुमार लक्ष्मण और शत्रुघ्न इन्हीं सुमित्रा देवी के पुत्र हैं।'
‘और जिसके कारण पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ से प्राण - सङ्कट की अवस्था (वनवास) में जा पहुँचे हैं तथा राजा दशरथ पुत्रवियोग का कष्ट पाकर स्वर्गवासी हुए हैं, जो स्वभाव से ही क्रोध करनेवाली, अशिक्षित बुद्धि वाली, गर्वीली, अपने-आपको सबसे अधिक सुन्दरी और भाग्यवती समझने वाली तथा राज्य का लोभ रखने वाली हैं, जो शक्ल-सूरत से आर्या होने पर भी वास्तव में अनार्या है, इस कैकेयी को मेरी माता समझिये। यह बड़ी ही क्रूर और पापपूर्ण विचार रखने वाली है। मैं अपने ऊपर जो महान् संकट आया हुआ देख रहा हूँ, इसका मूल कारण यही है।'
अश्रुगद्गद वाणी से इस प्रकार कहकर लाल आँखें किये पुरुषसिंह भरत रोष से भरकर फुफकारते हुए सर्प की भाँति लंबी साँस खींचने लगे।
उस समय ऐसी बातें कहते हुए भरत से श्रीरामावतार के प्रयोजन को जानने वाले महाबुद्धिमान् महर्षि भरद्वाज ने उनसे यह बात कही - भरत! तुम कैकेयी के प्रति दोष-दृष्टि न करो। श्रीराम का यह वनवास भविष्य में बड़ा ही सुखद होगा। श्रीराम के वन में जाने से देवताओं, दानवों तथा परमात्मा का चिन्तन करने वाले महर्षियों का इस जगत में हित ही होनेवाला है।
श्रीराम का पता जानकर और मुनि का आशीर्वाद पाकर कृतकृत्य हुए भरत ने मुनि को मस्तक झुका उनकी प्रदक्षिणा करके जाने की आज्ञा ले सेना को कूच के लिये तैयार होने का आदेश दिया।
तदनन्तर अनेक प्रकार की वेश-भूषा वाले लोग बहुत-से दिव्य घोड़ों और दिव्य रथों को, जो सुवर्ण से विभूषित थे, जोतकर यात्रा के लिये उन पर सवार हुए। बहुत-सी हथिनियाँ और हाथी, जो सुनहरे रस्सों से कसे गये थे और जिनके ऊपर पताकाएँ फहरा रही थीं, वर्षा - काल के गरजते हुए मेघों के समान घण्टानाद करते हुए वहाँ से प्रस्थित हुए। नाना प्रकार के छोटे-बड़े बहुमूल्य वाहनों पर सवार हो उनके अधिकारी चले और पैदल सैनिक अपने पैरों से ही यात्रा करने लगे।
तत्पश्चात् कौशल्या आदि रानियाँ उत्तम सवारियों पर बैठकर श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की अभिलाषा से प्रसन्नतापूर्वक चलीं। इसी प्रकार श्रीमान् भरत नवोदित चन्द्रमा और सूर्य के समान कान्तिमती शिविकामें बैठकर आवश्यक सामग्रियों के साथ प्रस्थित हुए। उस शिविका को कहाँरों ने अपने कंधों पर उठा रखा था। हाथी-घोड़ों से भरी हुई वह विशाल वाहिनी दक्षिण दिशा को घेरकर उमड़ी हुई महामेघों की घटा के समान चल पड़ी।
गङ्गा के उस पार पर्वतों तथा नदियों के निकटवर्ती वनों को, जो मृगों और पक्षियों से सेवित थे, लाँघकर वह आगे बढ़ गयी। उस सेना के हाथी और घोड़ों के समुदाय बड़े प्रसन्न थे। जंगल के मृगों और पक्षिसमूहों को भयभीत करती हुई भरत की वह सेना उस विशाल वन में प्रवेश करके वहाँ बड़ी शोभा पा रही थी।

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