जब भरत ने उस आश्रम में ही निवास का दृढ़ निश्चय कर लिया, तब मुनि ने कैकेयीकुमार भरत को अपना आतिथ्य ग्रहण करने के लिये न्यौता दिया।
यह सुनकर भरत ने उनसे कहा – मुने! वन में जैसा आतिथ्य सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल- मूल आदि देकर कर ही चुके।
उनके ऐसा कहने पर भरद्वाजजी भरत से हँसते हुए-से बोले – भरत ! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है; अतः मैं तुम्हें जो कुछ दूँगा, उसी से तुम संतुष्ट हो जाओगे। किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेना को भोजन कराना चाहता हूँ। नरश्रेष्ठ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये। पुरुषप्रवर! तुम अपनी सेना को किसलिये इतनी दूर छोड़कर यहाँ आये हो, सेना सहित यहाँ क्यों नहीं आये?
तब भरत ने हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनि को उत्तर दिया - भगवन्! मैं आपके ही भय से सेना के साथ यहाँ नहीं आया। प्रभो! राजा और राजपुत्र को चाहिये कि वे सभी देशों में प्रयत्नपूर्वक तपस्वीजनों को दूर छोड़कर रहें क्योंकि उनके द्वारा उन्हें कष्ट पहुँचने की सम्भावना रहती है। भगवन्! मेरे साथ बहुत-से अच्छे-अच्छे घोड़े, मनुष्य और मतवाले गजराज हैं, जो बहुत बड़े भूभाग को ढककर मेरे पीछे-पीछे चलते हैं। वे आश्रम के वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओं को हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ।
तदनन्तर उन महर्षि ने आज्ञा दी कि 'सेनाको यहीं ले आओ।' तब भरत ने सेना को वहीं बुलवा लिया। इसके बाद मुनिवर भरद्वाज ने अग्निशाला में प्रवेश करके जल का आचमन किया और ओठ पोंछकर भरत के आतिथ्य सत्कार के लिये विश्वकर्मा आदि का आवाहन किया।
वे बोले – मैं विश्वकर्मा त्वष्टा देवता का आवाहन करता हूँ। मेरे मन में सेनासहित भरत का आतिथ्य सत्कार करने की इच्छा हुई है। इसमें मेरे लिये वे आवश्यक प्रबन्ध करें। जिनके अगुआ इन्द्र हैं, उन तीन लोकपालों का (अर्थात् इन्द्रसहित यम, वरुण और कुबेर नामक देवताओं का ) मैं आवाहन करता हूँ। इस समय भरत का आतिथ्य सत्कार करना चाहता हूँ, इसमें मेरे लिये वे लोग आवश्यक प्रबन्ध करें।
'पृथ्वी और आकाश में जो पूर्व एवं पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ हैं, उनका भी मैं आवाहन करता हूँ; वे सब आज यहाँ पधारें। कुछ नदियाँ मैरेय प्रस्तुत करें। दूसरी अच्छी तरह तैयार की हुई सुरा ले आवें तथा अन्य नदियाँ ईंख के पोरुओं में होने वाले रस की भाँति मधुर एवं शीतल जल तैयार करके रखें।'
'मैं विश्वावसु, हाहा और हूहू आदि देव गन्धर्वों का तथा उनके साथ समस्त अप्सराओं का भी आवाहन करता हूँ। घृताची विश्वाची, मिश्रकेशी, अलम्बुषा नागदत्ता, हेमा, सोमा तथा अद्रिकृतस्थली (अथवा पर्वत पर निवास करने वाली सोमा) का भी मैं आवाहन करता हूँ। जो अप्सराएँ इन्द्र की सभा में उपस्थित होती हैं तथा जो देवाङ्गनाएँ ब्रह्माजी की सेवा में जाया करती हैं, उन सबका मैं तुम्बुरु के साथ आवाहन करता हूँ। वे अलङ्कारों तथा नृत्यगीत के लिये अपेक्षित अन्यान्य उपकरणों के साथ यहाँ पधारें।'
‘उत्तर कुरुवर्ष में जो दिव्य चैत्ररथ नामक वन है, जिसमें दिव्य वस्त्र और आभूषण ही वृक्षों के पत्ते हैं और दिव्य नारियाँ ही फल हैं, कुबेर का वह सनातन दिव्य वन यहीं आ जाये। यहाँ भगवान् सोम मेरे अतिथियों के लिये उत्तम अन्न, नाना प्रकार के भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य की प्रचुर मात्रा में व्यवस्था करें। वृक्षों से तुरंत चुने गये नाना प्रकार के पुष्प, मधु आदि पेय पदार्थ तथा नाना प्रकार के फलों के गूदे भी भगवान् सोम यहाँ प्रस्तुत करें।'
इस प्रकार उत्तम व्रत का पालन करने वाले भरद्वाज मुनि ने एकाग्रचित्त और अनुपम तेज से सम्पन्न हो शिक्षा (शिक्षाशास्त्र में बतायी गयी उच्चारण विधि) और (व्याकरणशास्त्रोक्त प्रकृति - प्रत्यय सम्बन्धी ) स्वर से युक्त वाणी में उन सबका आवाहन किया।
इस तरह आवाहन करके मुनि पूर्वाभिमुख हो हाथ जोड़े मन-ही-मन ध्यान करने लगे। उनके स्मरण करते ही वे सभी देवता एक-एक करके वहाँ आ पहुँचे। फिर तो वहाँ मलय और दर्दुर नामक पर्वतों का स्पर्श करके बहने वाली अत्यन्त प्रिय और सुखदायिनी हवा धीरे- धीरे चलने लगी, जो स्पर्श मात्र से शरीर के पसीने को सुखा देने वाली थी।
तत्पश्चात् मेघगण दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण दिशाओं में देवताओं की दुन्दुभियों का मधुर शब्द सुनायी देने लगा। उत्तम वायु चलने लगी। अप्सराओं के समुदायों का नृत्य होने लगा। देवगन्धर्व गाने लगे और सब ओर वीणाओं की स्वरलहरियाँ फैल गयीं। सङ्गीत का वह शब्द पृथ्वी, आकाश तथा प्राणियों के कर्णकुहरों में प्रविष्ट होकर गूँजने लगा। आरोह-अवरोह से युक्त वह शब्द कोमल एवं मधुर था, समताल से विशिष्ट और लयगुण से सम्पन्न था।
इस प्रकार मनुष्यों के कानों को सुख देनेवाला वह दिव्य शब्द हो ही रहा था कि भरत की सेना को विश्वकर्मा का निर्माण कौशल दिखायी पड़ा। चारों ओर पाँच योजन तक की भूमि समतल हो गयी। उस पर नीलम और वैदूर्य मणि के समान नाना प्रकार की घनी घास छा रही थी। स्थान-स्थान पर बेल, कैथ, कटहल, आँवला, बिजौरा तथा आम के वृक्ष लगे थे, जो फलों से सुशोभित हो रहे थे।
उत्तर कुरुवर्ष से दिव्य भोग- सामग्रियों से सम्पन्न चैत्ररथ नामक वन वहाँ आ गया। साथ ही वहाँ की रमणीय नदियाँ भी आ पहुँचीं, जो बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षों से घिरी हुई थीं। उज्ज्वल, चार-चार कमरों से युक्त गृह (अथवा गृहयुक्त चबूतरे) तैयार हो गये। हाथी और घोड़ों के रहने के लिये शालाएँ बन गयीं। अट्टालिकाओं तथा सतमंजिले महलों से युक्त सुन्दर नगर द्वार भी निर्मित हो गये। राजपरिवार के लिये बना हुआ सुन्दर द्वार से युक्त दिव्य भवन श्वेत बादलों के समान शोभा पा रहा था। उसे सफेद फूलों की मालाओं से सजाया और दिव्य सुगन्धित जल से सींचा गया था।
वह महल चौकोना तथा बहुत बड़ा था - उसमें संकीर्णता का अनुभव नहीं होता था। उसमें सोने, बैठने और सवारियों के रहने के लिये अलग-अलग स्थान थे। वहाँ सब प्रकार के दिव्य रस, दिव्य भोजन और दिव्य वस्त्र प्रस्तुत थे।
सब तरह के अन्न और धुले हुए स्वच्छ पात्र रखे गये थे। उस सुन्दर भवन में कहीं बैठने के लिये सब प्रकार के आसन उपस्थित थे और कहीं सोने के लिये सुन्दर शय्याएँ बिछी थीं। महर्षि भरद्वाज की आज्ञा से कैकेयीपुत्र महाबाहु भरत ने नाना प्रकार के रत्नों से भरे हुए उस महल में प्रवेश किया। उनके साथ-साथ पुरोहित और मन्त्री भी उसमें गये। उस भवन का निर्माणकौशल देखकर उन सब लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुई। उस भवन में भरत ने दिव्य राजसिंहासन, चेंबर और छत्र भी देखे तथा वहाँ राजा श्रीराम की भावना करके मन्त्रियों के साथ उन समस्त राजभोग्य वस्तुओं की प्रदक्षिणा की।
सिंहासन पर श्रीरामचन्द्रजी महाराज विराजमान हैं, ऐसी धारणा बनाकर उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया और उस सिंहासन की भी पूजा की। फिर अपने हाथ में चँवर ले, वे मन्त्री के आसन पर जा बैठे। तत्पश्चात् पुरोहित और मन्त्री भी क्रमश: अपने योग्य आसनों पर बैठे; फिर सेनापति और प्रशास्ता (छावनी की रक्षा करने वाले) भी बैठ गये। तदनन्तर वहाँ दो ही घड़ी में भरद्वाज मुनि की आज्ञा से भरत की सेवा में नदियाँ उपस्थित हुईं, जिनमें कीच के स्थान में खीर भरी थी। उन नदियों के दोनों तटों पर ब्रह्मर्षि भरद्वाज की कृपा से दिव्य एवं रमणीय भवन प्रकट हो गये थे, जो चूने से पुते हुए थे।
उसी मुहूर्त में ब्रह्माजी की भेजी हुई दिव्य आभूषणों से विभूषित बीस हजार दिव्याङ्गनाएँ वहाँ आयीं। इसी तरह सुवर्ण, मणि, मुक्ता और मूँगों के आभूषणों से सुशोभित, कुबेर की भेजी हुई बीस हजार दिव्य महिलाएँ भी वहाँ उपस्थित हुईं, जिनका स्पर्श पाकर पुरुष उन्मादग्रस्त-सा दिखायी देता है। इनके सिवा नन्दनवन से बीस हजार अप्सराएँ भी आयीं। नारद, तुम्बुरु और गोप अपनी कान्ति से सूर्य के समान प्रकाशित होते थे। ये तीनों गन्धर्वराज भरत के सामने गीत गाने लगे।
अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका और वामना – ये चार अप्सराएँ भरद्वाज मुनि की आज्ञा से भरत के समीप नृत्य करने लगीं। जो फूल देवताओं के उद्यानों में और जो चैत्ररथ वन में हुआ करते हैं, वे महर्षि भरद्वाज के प्रताप से प्रयाग में दिखायी देने लगे। भरद्वाज मुनि के तेज से बेल के वृक्ष मृदङ्ग बजाते, बहेड़े के पेड़ शम्या नामक ताल देते और पीपल के वृक्ष वहाँ नृत्य करते थे।
तदनन्तर देवदारु, ताल, तिलक और तमाल नामक वृक्ष कुबड़े और बौने बनकर बड़े हर्ष के साथ भरत की सेवा में उपस्थित हुए। शिंशपा, आमल की और जम्बू आदि स्त्रीलिङ्ग वृक्ष तथा मालती, मल्लिका और जाति आदि वन की लताएँ नारी का रूप धारण करके भरद्वाज मुनि के आश्रम में आ बसीं। (वे भरत के सैनिकों को पुकार पुकारकर कहती थीं - मधु का पान करने वाले लोगो! लो, यहु मधु पान कर लो। तुममें से जिन्हें भूख लगी हो, वे सब लोग यह खीर खाओ और परम पवित्र फलों के गूदे भी प्रस्तुत हैं, इनका आस्वादन करो। जिसकी जो इच्छा हो, वही भोजन करो।
सात-आठ तरुणी स्त्रियाँ मिलकर एक-एक पुरुष को नदी के मनोहर तटों पर उबटन लगा-लगाकर नहलाती थीं। बड़े-बड़े नेत्रों वाली सुन्दरी रमणियाँ अतिथियों का पैर दबाने के लिये आयी थीं। वे उनके भीगे हुए अङ्गों को वस्त्रों से पोंछकर शुद्ध वस्त्र धारण कराकर उन्हें स्वादिष्ट पेय (दूध आदि) पिलाती थीं।
तत्पश्चात् भिन्न-भिन्न वाहनों की रक्षा में नियुक्त मनुष्यों ने हाथी, घोड़े, गधे, ऊँट और बैलों को भलीभाँति दाना- घास आदि का भोजन कराया। इक्ष्वाकु कुल के श्रेष्ठ योद्धाओं की सवारी में आने वाले वाहनों को वे महाबली वाहन रक्षक (जिन्हें महर्षि ने सेवा के लिये नियुक्त किया था) प्रेरणा दे-देकर गन्ने के टुकड़े और मधुमिश्रित लावे खिलाते थे। घोड़े बाँधने वाले सईस को अपने घोड़े का और हाथीवान को अपने हाथी का कुछ पता नहीं था। सारी सेना वहाँ मत्त-प्रमत्त और आनन्दमग्न प्रतीत होती थी।
सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थों से तृप्त होकर लाल चन्दन से चर्चित हुए सैनिक अप्सराओं का संयोग पाकर निम्नाङ्कित बातें कहने लगे - अब हम अयोध्या नहीं जायँगे, दण्डकारण्य में भी नहीं जायँगे। भरत सकुशल रहें (जिनके कारण हमें इस भूतल पर स्वर्ग का सुख मिला) तथा श्रीरामचन्द्रजी भी सुखी रहें (जिनके दर्शन के लिये आने पर हमें इस दिव्य सुख की प्राप्ति हुई)।
इस प्रकार पैदल सैनिक तथा हाथीसवार, घुड़सवार, सईस और महावत आदि उस सत्कार को पाकर स्वच्छन्द हो उपर्युक्त बातें कहने लगे। भरत के साथ आये हुए हजारों मनुष्य वहाँ का वैभव देखकर हर्ष के मारे फूले नहीं समाते थे और जोर-जोर से कहते थे - यह स्थान स्वर्ग है। सहस्रों सैनिक फूलों के हार पहनकर नाचते, हँसते और गाते हुए सब ओर दौड़ते फिरते थे।
उस अमृत के समान स्वादिष्ट अन्न का भोजन कर चुकने पर भी उन दिव्य भक्ष्य पदार्थों को देखकर उन्हें पुनः भोजन करने की इच्छा हो जाती थी। दास-दासियाँ, सैनिकों की स्त्रियाँ और सैनिक सब-के-सब नूतन वस्त्र धारण करके सब प्रकार से अत्यन्त प्रसन्न हो गये थे। हाथी, घोड़े, गदहे, ऊँट, बैल, मृग तथा पक्षी भी वहाँ पूर्ण तृप्त हो गये थे; अत: कोई दूसरी किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता था। उस समय वहाँ कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखायी देता था, जिसके कपड़े सफेद न हों, जो भूखा या मलिन रह गया हो, अथवा जिसके केश धूल से धूसरित हो गये हों।
अजवाइन मिलाकर बनाये गये, वराही कन्द से तैयार किये गये तथा आम आदि फलों के गरम किये हुए रस में पकाये गये उत्तमोत्तम व्यञ्जनों के संग्रहों, सुगन्धयुक्त रसवाली दालों तथा श्वेत रंग के भातों से भरे हुए सहस्रों सुवर्ण आदि के पात्र वहाँ सब ओर रखे हुए थे, जिन्हें फूलों की ध्वजाओं से सजाया गया था। भरत के साथ आये हुए सब लोगों ने उन पात्रों को आश्चर्यचकित होकर देखा। वन के आस-पास जितने कुएँ थे, उन सबमें गाढ़ी स्वादिष्ट खीर भरी हुई थी। वहाँ की गौएँ कामधेनु (सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करनेवाली) हो गयी थीं और उस दिव्य वन के वृक्ष मधु की वर्षा करते थे।
भरत की सेना में आये हुए निषाद आदि निम्नवर्ग के लोगों की तृप्ति के लिये वहाँ मधु से भरी हुई बावड़ियाँ प्रकट हो गयी थीं तथा उनके तटों पर तपे हुए पिठर (कुण्ड) में पकाये गये मृग, मोर और मुर्गों के स्वच्छ मांस भी ढेर -के-ढेर रख दिये गये थे। वहाँ सहस्रों सोने के अन्नपात्र, लाखों व्यञ्जन पात्र और लगभग एक अरब थालियाँ संगृहीत थीं।
पिठर, छोटे-छोटे घड़े तथा मटके दही से भरे हुए थे और उनमें दही को सुस्वादु बनाने वाले सोंठ आदि मसाले पड़े हुए थे। एक पहर पहले के तैयार किये हुए केसरमिश्रित पीतवर्ण वाले सुगन्धित तक्र के कई तालाब भरे हुए थे। जीरा आदि मिलाये हुए तक्र (रसाल), सफेद दही तथा दूध के भी कई कुण्ड पृथक्-पृथक् भरे हुए थे। शक्करों के कई ढेर लगे थे। स्नान करनेवाले मनुष्यों को नदी के घाटों पर भिन्नभिन्न पात्रों में पीसे हुए आँवले, सुगन्धित चूर्ण तथा और भी नाना प्रकार के स्नानोपयोगी पदार्थ दिखायी देते थे। साथ ही ढेर-के-ढेर दाँतन, जो सफेद कुरुचेवाले थे, वहाँ रखे हुए थे। सम्पुटों में घिसे हुए सफेद चन्दन विद्यमान थे। इन सब वस्तुओं को लोगों ने देखा।
इतना ही नहीं, वहाँ बहुत से स्वच्छ दर्पण, ढेर के ढेर वस्त्र और हजारों जोड़े खड़ाऊँ और जूते भी दिखायी देते थे। काजलों सहित कजरौटे, कंघे, कूर्च (थकरी या ब्रश), छत्र, धनुष, मर्मस्थानों की रक्षा करनेवाले कवच आदि तथा विचित्र शय्या और आसन भी वहाँ दृष्टिगोचर होते थे। गधे, ऊँट, हाथी और घोड़ों के पानी पीने के लिये कई जलाशय भरे थे, जिनके घाट बड़े सुन्दर और सुखपूर्वक उतरने योग्य थे। उन जलाशयों में कमल और उत्पल शोभा पा रहे थे। उनका जल आकाश के समान स्वच्छ था तथा उनमें सुखपूर्वक तैरा जा सकता था।
पशुओं के खाने के लिये वहाँ सब ओर नील वैदूर्यमणि के समान रंगवाली हरी एवं कोमल घास की ढेरियाँ लगी थीं। उन सब लोगों ने वे सारी वस्तुएँ देखीं। महर्षि भरद्वाज के द्वारा सेना सहित भरत का किया हुआ वह अनिर्वचनीय आतिथ्य सत्कार अद्भुत और स्वप्न के समान था। उसे देखकर वे सब मनुष्य आश्चर्यचकित हो उठे। जैसे देवता नन्दनवन में विहार करते हैं, उसी प्रकार भरद्वाज मुनि के रमणीय आश्रम में यथेष्ट क्रीडा - विहार करते हुए उन लोगों की वह रात्रि बड़े सुख से बीती।
तत्पश्चात् वे नदियाँ, गन्धर्व और समस्त सुन्दरी अप्सराएँ भरद्वाजजी की आज्ञा ले जैसे आयी थीं, उसी प्रकार लौट गयीं। सबेरा हो जाने पर भी लोग उसी प्रकार मधुपान से मत्त एवं उन्मत्त दिखायी देते थे। उनके अङ्गों पर दिव्य अगुरुयुक्त चन्दन का लेप ज्यों-का-त्यों दृष्टिगोचर हो रहा था। मनुष्यों के उपभोग में लाये गये नाना प्रकार के दिव्य उत्तम पुष्पहार भी उसी अवस्था में पृथक्-पृथक् बिखरे पड़े थे।
जब भरतजी ने मुनि के प्रभाव को देखा, तो उसके सामने उन्हें (इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि) सभी लोकपालों के लोक तुच्छ जान पड़े। सुख की सामग्री का वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानी लोग भी वैराग्य भूल जाते हैं। सम्पत्ति (भोग-विलास की सामग्री) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनि की आज्ञा खेल है, जिसने उस रात को आश्रम रूपी पिंजड़े में दोनों को बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया। (जैसे किसी बहेलिए के द्वारा एक पिंजड़े में रखे जाने पर भी चकवी-चकवे का रात को संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजी की आज्ञा से रात भर भोग सामग्रियों के साथ रहने पर भी भरतजी ने मन से भी उनका स्पर्श तक नहीं किया।)

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