धर्म के ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरत ने भरद्वाज आश्रम के पास पहुँचकर अपने साथ के सब लोगों को आश्रम से एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्र-शस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहित को आगे किये वे मन्त्रियों के साथ पैदल ही वहाँ गये। आश्रम में प्रवेश करके जहाँ दूर से ही मुनिवर भरद्वाज का दर्शन होने लगा। वहीं उन्होंने उन मन्त्रियों को खड़ा कर दिया और पुरोहित वशिष्ठजी को आगे करके वे पीछे-पीछे ऋषि के पास गये।
महर्षि वशिष्ठ को देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसन से उठ खड़े हुए और शिष्यों से शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आने को कहा। फिर वे वशिष्ठ से मिले। तत्पश्चात् भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज समझ गये कि ये राजा दशरथ के पुत्र हैं। धर्मज्ञ ऋषि ने क्रमशः वशिष्ठ और भरत को अर्घ्य, पाद्य तथा फल आदि निवेदन करके उन दोनों के कुल का कुशल- समाचार पूछा।
इसके बाद अयोध्या, सेना, खजाना, मित्रवर्ग तथा मन्त्रिमण्डल का हाल पूछा। राजा दशरथ की मृत्यु का वृत्तान्त वे जानते थे; इसलिये उनके विषय में उन्होंने कुछ नहीं पूछा। वशिष्ठ और भरत ने भी महर्षि के शरीर, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग, पेड़-पत्ते तथा मृग-पक्षी आदि का कुशल समाचार पूछा।
महायशस्वी भरद्वाज 'सब ठीक है' ऐसा कहकर श्रीराम के प्रति स्नेह होने के कारण भरत से इस प्रकार बोले – तुम तो राज्य कर रहे हो न? तुम्हें यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ गयी? यह सब मुझे बताओ, क्योंकि मेरा मन तुम्हारी ओर से शुद्ध नहीं हो रहा है - मेरा विश्वास तुम पर नहीं जमता है।
'जो शत्रुओं का नाश करने वाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्र को कौशल्या ने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिता ने स्त्री के कारण जिस महायशस्वी पुत्र को चौदह वर्षों तक वन में रहने की आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नी के साथ दीर्घकाल के लिये वन में भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मण का तुम अकण्टक राज्य भोगने की इच्छा से कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो?'
भरद्वाजजी के ऐसा कहने पर दुःख के कारण भरत की आँखें डबडबा आयीं। वे लड़खड़ाती हुई वाणी में उनसे इस प्रकार बोले - भगवन्! यदि आप पूज्यपाद महर्षि भी मुझे ऐसा समझते हैं, तब तो मैं हर तरह से मारा गया। यह मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि श्रीराम के वनवास में मेरी ओर से कोई अपराध नहीं हुआ है, अत: आप मुझसे ऐसी कठोर बात न कहें।
'मेरी आड़ लेकर मेरी माता ने जो कुछ कहा या किया है, यह मुझे अभीष्ट नहीं है। मैं इससे संतुष्ट नहीं हूँ और न माता की उस बात को स्वीकार ही करता हूँ। मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीराम को प्रसन्न करके अयोध्या में लौटा लाने और उनके चरणों की वन्दना करने के लिये जा रहा हूँ। इसी उद्देश्य से मैं यहाँ आया हूँ। ऐसा समझकर आपको मुझ पर कृपा करनी चाहिये। भगवन्! आप मुझे बताइये कि इस समय महाराज श्रीराम कहाँ हैं ?'
इसके बाद वशिष्ठ आदि ऋत्विजों ने भी यह प्रार्थना की कि भरत का कोई अपराध नहीं है। आप इन पर प्रसन्न हों।
तब भगवान् भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा - पुरुषसिंह! तुम रघुकुल में उत्पन्न हुए हो। तुममें गुरुजनों की सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषों के अनुसरण का भाव होना उचित ही है। तुम्हारे मन में जो बात है, उसे मैं जानता हूँ; तथापि मैंने इसलिये पूछा है कि तुम्हारा यह भाव और भी दृढ़ हो जाये तथा तुम्हारी कीर्ति का अधिकाधिक विस्तार हो। मुझे न तो तुम पर पहले ही संदेह था और न ही अभी है। आदरणीय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को देखकर ही मैंने तुम्हारे मनोरथ को भांप लिया था।
‘मैं सीता और लक्ष्मण सहित धर्मज्ञ श्रीराम का पता जानता हूँ। ये तुम्हारे भ्राता श्रीरामचन्द्र महापर्वत चित्रकूट पर निवास करते हैं। ‘अब कल तुम उस स्थान की यात्रा करना। आज अपने मन्त्रियों के साथ इस आश्रम में ही रहो। महाबुद्धिमान् भरत! तुम मेरी इस अभीष्ट वस्तु को देने में समर्थ हो, अत: मेरी यह अभिलाषा पूर्ण करो।'
तब जिनके स्वरूप एवं स्वभाव का परिचय मिल गया था, उन उदार दृष्टिवाले भरत ने 'तथास्तु' कहकर मुनि की आज्ञा शिरोधार्य की तथा उन राजकुमार ने उस समय रात को उस आश्रम में ही निवास करने का विचार किया।

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