श्रृङ्गवेरपुर में ही गङ्गा के तट पर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रातः काल उठे और शत्रुघ्न से इस प्रकार बोले - शत्रुघ्न! उठो, क्या सो रहे हो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुह को शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गा के पार उतारेगा।
उनसे इस प्रकार प्रेरित होने पर शत्रुघ्न ने कहा - भैया! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीराम का चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ।
वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेला में आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला - ककुत्स्थकुलभूषण भरतजी ! इस नदी के तट पर आप रात में सुख से रहे हैं न? सेनासहित आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं हुआ है? आप सर्वथा नीरोग हैं न?
गुह के स्नेहपूर्वक कहे गये इस वचन को सुनकर श्रीराम के अधीन रहने वाले भरत ने यों कहा – बुद्धिमान् निषादराज ! हम सब लोगों की रात बड़े सुख से बीती है। तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया। अब ऐसी व्यवस्था करो, जिससे तुम्हारे मल्लाह बहुत-सी नौकाओं द्वारा हमें गङ्गा के पार उतार दें।
भरत का यह आदेश सुनकर गुह तुरंत अपने नगर में गया और भाई-बन्धुओंसे बोला - उठो, जागो, सदा तुम्हारा कल्याण हो। नौकाओं को खींचकर घाट पर ले आओ। भरत की सेना को गङ्गाजी के पार उतारूँगा।
गुह के इस प्रकार कहने पर अपने राजा की आज्ञा से सभी मल्लाह शीघ्र ही उठ खड़े हुए और चारों ओर से पाँच सौ नौकाएँ एकत्र कर लाये। इन सबके अतिरिक्त कुछ स्वस्तिक नाम से प्रसिद्ध नौकाएँ थीं; जो स्वस्तिक चिह्नों से अलंकृत होने के कारण उन्हीं चिह्नों से पहचानी जाती थीं। उन पर ऐसी पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनमें बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटक रही थीं। स्वर्ण आदि के बने हुए चित्रों से उन नौकाओं की विशेष शोभा हो रही थी। उनमें नौका खेने के लिये बहुत-से डाँड़ लगे हुए थे तथा चतुर नाविक उन्हें चलाने के लिये तैयार बैठे थे। वे सभी नौकाएँ बड़ी मजबूत बनी थीं।
उन्हीं में से एक कल्याणमयी नाव गुह स्वयं लेकर आया, जिसमें श्वेत कालीन बिछे हुए थे तथा उस स्वस्तिक नाम वाली नाव पर माङ्गलिक शब्द हो रहा था। उस पर सबसे पहले पुरोहित, गुरु और ब्राह्मण बैठे। तत्पश्चात् उस पर भरत, महाबली शत्रुघ्न, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा जो अन्य स्त्रियां थीं, वे सब सवार हुईं। तदनन्तर राजपरिवार की दूसरी स्त्रियाँ बैठीं। गाड़ियाँ तथा क्रय-विक्रय की सामग्रियाँ दूसरी दूसरी नावों पर लादी गयीं।
कुछ सैनिक बड़ी-बड़ी मशालें जलाकर - अपने खेमों में छूटी हुई वस्तुओं को सँभालने लगे। कुछ लोग शीघ्रतापूर्वक घाट पर उतरने लगे तथा बहुत-से सैनिक अपने-अपने सामान को 'यह मेरा है, यह मेरा है' इस तरह पहचानकर उठाने लगे। उस समय जो महान् कोलाहल मचा, वह आकाश में गूँज उठा।
उन सभी नावों पर पताकाएँ फहरा रही थीं। सबके ऊपर खेने वाले कई मल्लाह बैठे थे। वे सब नौकाएँ उस समय चढ़े हुए मनुष्यों को तीव्र गति से पार ले जाने लगीं। कितनी ही नौकाएँ केवल स्त्रियों से भरी थीं, कुछ नावों पर घोड़े थे तथा कुछ नौकाएँ गाड़ियों, उनमें जोते जाने वाले घोड़े, खच्चर, बैल आदि वाहनों तथा बहुमूल्य रन्त आदि को ढो रही थीं।
वे दूसरे तट पर पहुँचकर वहाँ लोगों को उतारकर जब लौटीं, उस समय मल्लाहबन्धु जल में उनकी विचित्र गतियों का प्रदर्शन करने लगे। वैजयन्ती पताकाओं से सुशोभित होने वाले हाथी महावतों से प्रेरित होकर स्वयं ही नदी पार करने लगे। उस समय वे पंखधारी पर्वतों के समान प्रतीत होते थे। कितने ही मनुष्य नावों पर बैठे थे और कितने ही बाँस तथा तिनकों से बने हुए बेड़ों पर सवार थे। कुछ लोग बड़े- बड़े कलशों, कुछ छोटे घड़ों और कुछ अपनी बाहुओं से ही तैरकर पार हो रहे थे।
इस प्रकार मल्लाहों की सहायता से वह सारी पवित्र सेना गङ्गा के पार उतारी गयी। प्रेम में उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजी ने तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश किया। फिर वह स्वयं मैत्र- नामक मुहूर्त में उत्तम प्रयागवन की ओर प्रस्थित हो गयी। उनके चरणों में छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आए हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया।
जब भरतजी ने यह पता पा लिया कि सब लोग स्नान कर चुके, तब त्रिवेणी पर आकर उन्हें प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक (गंगा-यमुना के) श्वेत और श्याम जल में स्नान किया और दान देकर ब्राह्मणों का सम्मान किया।
श्याम और सफेद (यमुनाजी और गंगाजी की) लहरों को देखकर भरतजी का शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा - हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। आपका प्रभाव वेदों में प्रसिद्ध और संसार में प्रकट है। मैं अपना धर्म (न माँगने का क्षत्रिय धर्म) त्यागकर आप से भीख माँगता हूँ। आर्त्त मनुष्य कौन सा कुकर्म नहीं करता? ऐसा हृदय में जानकर सुजान उत्तम दानी जगत् में माँगने वाले की वाणी को सफल किया करते हैं (अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं)।
'मुझे न अर्थ की रुचि (इच्छा) है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्म में मेरा श्री रामजी के चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं। स्वयं श्री रामचंद्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामी द्रोही भले ही कहें, पर श्री सीता-रामजी के चरणों में मेरा प्रेम आपकी कृपा से दिन-दिन बढ़ता ही रहे।'
मेघ चाहे जन्मभर चातक की सुध भुला दे और जल माँगने पर वह चाहे वज्र और पत्थर (ओले) ही गिरावे, पर चातक की रटन घटने से तो उसकी बात ही घट जाएगी (प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जाएगी)। उसकी तो प्रेम बढ़ने में ही सब तरह से भलाई है। जैसे तपाने से सोने पर आब (चमक) आ जाती है, वैसे ही प्रियतम के चरणों में प्रेम का नियम निबाहने से प्रेमी सेवक का गौरव बढ़ जाता है।
भरतजी के वचन सुनकर बीच त्रिवेणी में से सुंदर मंगल देने वाली कोमल वाणी हुई - हे तात भरत! तुम सब प्रकार से साधु हो। श्री रामचंद्रजी के चरणों में तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हो। श्री रामचंद्रजी को तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है। त्रिवेणीजी के अनुकूल वचन सुनकर भरतजी का शरीर पुलकित हो गया, हृदय में हर्ष छा गया।
वहाँ पहुँचकर महात्मा भरत सेना को सुखपूर्वक विश्राम की आज्ञा दे उसे प्रयागवन में ठहराकर स्वयं ऋत्विजों तथा राजसभा के सदस्यों के साथ ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाज का दर्शन करने के लिये गये। देवपुरोहित महात्मा ब्राह्मण भरद्वाज मुनि के आश्रम पर पहुँचकर भरत ने उन विप्रशिरोमणि के रमणीय एवं विशाल वन को देखा, जो मनोहर पर्णशालाओं तथा वृक्षावलियों से सुशोभित था।

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