भाग-८२(82) श्रीराम की कुश-शय्या देखकर भरत का शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना

 


निषादराज की सारी बातें ध्यान से सुनकर मन्त्रियों सहित भरत ने इंगुदी - वृक्ष की जड़ के पास आकर श्रीरामचन्द्रजी की शय्या का निरीक्षण किया । फिर उन्होंने समस्त माताओं से कहा - यहीं महात्मा श्रीराम ने भूमि पर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गों से विमर्दित हुआ था। महाराजों के कुल में उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथ ने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमि पर शयन करने के योग्य नहीं हैं। 

‘जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्मकी विशेष चादरसे ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनोंके समूहसे सजे हुए पलंगपर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वी पर कैसे शयन करते होंगे ? जो सदा विमाना कार प्रासादों के श्रेष्ठ भवनों और अट्टालिकाओं में सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदी की बनी हुई है, जो अच्छे बिछौनों से सुशोभित हैं, पुष्पराशि से विभूषित होने के कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरु की सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहों का कलरव होता रहता है, जो शीतल हैं एवं कपूर आदि की सुगन्ध से व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारों पर सुवर्ण का काम किया गया है तथा जो ऊँचाई में मेरु पर्वत के समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलों में जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वन में पृथ्वी पर कैसे सोते होंगे?' 

‘जो गीतों और वाद्यों की ध्वनियों से, श्रेष्ठ आभूषणों की झनकारों से तथा मृदङ्गों के उत्तम शब्दों से सदा जगाये जाते थे, बहुत-से वन्दीगण समय-समय पर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियों से जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमि पर कैसे शयन करते होंगे?' 

‘यह बात जगत में विश्वास के योग्य नहीं है। मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती । मेरा अन्तःकरण अवश्य ही मोहित हो रहा है। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है। निश्चय ही काल के समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभाव से दशरथनन्दन श्रीराम को भी इस प्रकार भूमि पर सोना पड़ा।' 

‘उस काल के ही प्रभाव से विदेहराज की परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथ की प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वी पर शयन करती हैं। यही मेरे बड़े भाई की शय्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं। इस कठोर वेदी पर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गों से कुचला गया सारा तृण अभी तक पड़ा है। जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्या पर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र-तत्र सुवर्ण के कण स दिखायी देते हैं। यहाँ उस समय भाभी सीता की चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशम धागे चमक रहे हैं। 

'मैं समझता हूँ कि पति की शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियों के लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दुःख का अनुभव नहीं कर रही हैं। हाय! मैं मर गया - मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीता सहित श्रीराम को अनाथ की भाँति ऐसी शय्या पर सोना पड़ता है।' 

'जो चक्रवर्ती सम्राट के कुल में उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकों को सुख देनेवाले हैं तथा सबका प्रिय करने में तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कमल के समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय लगने वाला है तथा जो सुख भोगने के ही योग्य हैं, दु:ख भोगने के कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथजी परम उत्तम प्रिय राज्य का परित्याग करके इस समय पृथ्वी पर शयन करते हैं।' 

'उत्तम लक्षणों वाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़भागी हैं, जो संकट के समय बड़े भाई श्रीराम के साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं। निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पति के साथ वन का अनुसरण किया है। हम सब लोग उन महात्मा श्रीराम से बिछुड़कर संशय में पड़ गये हैं (हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं)।'  

‘महाराज दशरथ स्वर्गलोक को गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशा में यह पृथ्वी बिना नाविक की नौका समान मुझे सूनी-सी प्रतीत हो रही है। वन में निवास करने पर भी उन्हीं श्रीराम के बाहुबल से सुरक्षित हुई इस वसुन्धरा को कोई शत्रु मन से भी नहीं लेना चाहता है। इस समय अयोध्या की चहारदीवारी की सब ओर से रक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं - खुले विचरते हैं, नगरद्वार का फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेना में हर्ष और उत्साह का अभाव है, समस्त नगरी रक्षकों से सूनी-सी जान पड़ती है, सङ्कट में पड़ी हुई है, रक्षकों के अभाव से आवरणरहित हो गयी है, तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजन की भाँति इसे ग्रहण करने की इच्छा नहीं करते हैं। श्रीराम के बाहुबल से ही इसकी रक्षा हो रही है।' 

‘आज से मैं भी पृथ्वी पर अथवा तिनकों पर ही सोऊँगा, फल- मूल का ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा। वनवास के जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनों तक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होने से आर्य श्रीराम की की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी। भाई के लिये वन में निवास करते समय शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मण को साथ लेकर अयोध्या का पालन करेंगे। 

‘अयोध्या में ब्राह्मण लोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम का अभिषेक करेंगे। क्या देवता मेरे इस मनोरथ को सत्य ( सफल) करेंगे? मैं उनके चरणों पर मस्तक रखकर उन्हें मनाने की चेष्टा करूँगा। यदि मेरे बहुत कहने पर भी वे लौटने को राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीराम के साथ मैं भी दीर्घकाल तक वहीं निवास करूँगा। वे मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे।' 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-८२(82) समाप्त !

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