भाग-८१(81) भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना और गुह का उन्हें सब बातें बताना

 


गुह का श्रीराम के जटाधारण आदि से सम्बन्ध रखने वाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये। जिन श्रीराम के विषय में उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हीं का वे चिन्तन करने लगे (उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा। श्रीराम ने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें)। 

भरत सुकुमार होने के साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंह के समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमल के सदृश सुन्दर थे। उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखने में बड़े मनोरम थे। उन्होंने गुह की बात सुनकर दो घड़ी तक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मन में बड़ा दुःख हुआ। वे अंकुश से विद्ध हुए हाथी के समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दु:ख से शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये। 

भरत को मूर्च्छित हुआ देख गुह के चेहरे का रंग उड़ गया। वह भूकम्प के समय मथित हुए वृक्ष की भाँति वहाँ व्यथित हो उठा। शत्रुघ्न भरत के पास ही बैठे थे। वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदय से लगाकर जोर-जोर से रोने लगे और शोक से पीड़ित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे। तदनन्तर भरत की सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं। वे पतिवियोग के दुःख से दुःखी, उपवास करने के कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं। 

भूमि पर पड़े हुए भरत को उन्होंने चारों ओर से घेर लिया और सब की सब रोने लगीं। कौशल्या का हृदय तो दु:ख से और भी कातर हो उठा। उन्होंने भरत के पास जाकर उन्हें अपनी गोद में चिपका लिया। 

जैसे वत्सला गौ अपने बछड़े को गले से लगाकर चाटती है, उसी तरह शोक से व्याकुल हुई तपस्विनी कौशल्या ने भरत को गोद में लेकर रोते-रोते पूछा - पुत्र! तुम्हारे शरीर को कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है? अब इस राजवंश का जीवन तुम्हारे ही अधीन है। वत्स! मैं तुम्हीं को देखकर जी रही हूँ। श्रीराम लक्ष्मण के साथ वन में चले गये और महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये; अब एकमात्र तुम्हीं हम लोगों के रक्षक हो। पुत्र! सच बताओ, तुमने लक्ष्मण के सम्बन्ध में अथवा मुझ एक ही पुत्रवाली मां के बेटे वन में सीता सहित गये हुए श्रीराम के विषय में कोई अप्रिय बात तो नहीं सुनी है ? 

दो ही घड़ी में जब महायशस्वी भरत का चित्त स्वस्थ हुआ, तब उन्होंने रोते-रोते ही कौशल्या को सान्त्वना दी और कहा - ‘मां! घबराओ मत, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी है। फिर निषादराज गुह से इस प्रकार पूछा - गुह! उस दिन रात में मेरे भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे? सीता कहाँ थीं? और लक्ष्मण कहाँ रहे? उन्होंने क्या भोजन करके कैसे बिछौने पर शयन किया था? ये सब बातें मुझे बताओ। 

ये प्रश्न सुनकर निषादराज गुह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने प्रिय एवं हितकारी अतिथि श्रीराम के आने पर उनके प्रति जैसा बर्ताव किया था, वह सब बताते हुए भरत से कहा - मैंने भाँति-भाँति के अन्न, अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ और कई तरह के फल श्रीरामचन्द्रजी के पास भोजन के लिये प्रचुर मात्रा में पहुँचाये। सत्यपराक्रमी श्रीराम ने मेरी दी हुई सब वस्तुएँ स्वीकार तो कीं; किंतु क्षत्रियधर्म का स्मरण करते हुए उनको ग्रहण नहीं किया - मुझे आदरपूर्वक लौटा दिया। 

‘फिर उन महात्मा ने हम सब लोगों को समझाते हुए कहा – "सखे! हम जैसे क्षत्रियों को किसी से कुछ लेना नहीं चाहिये; अपितु सदा देना ही चाहिये। सीता सहित श्रीराम ने उस रात में उपवास ही किया। लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उसी को उन महात्मा ने पीया। उनके पीने से बचा हुआ जल लक्ष्मण ने ग्रहण किया। (जलपान के पहले) उन तीनों ने मौन एवं एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना की थी।' 

‘तदनन्तर लक्ष्मण ने स्वयं कुश लाकर श्रीरामचन्द्रजी के लिये शीघ्र ही सुन्दर बिछौना बिछाया। उस सुन्दर बिस्तर पर जब सीता के साथ श्रीराम विराजमान हुए, तब लक्ष्मण उन दोनों के चरण पखारकर वहाँ से दूर हट आये। यही वह इङ्गुदी वृक्ष की जड़ है और यही वह तृण है, जहाँ श्रीराम और सीता - दोनों ने रात्रि में शयन किया था।' 

'शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठ पर बाणों से भरे दो तरकस बाँधे, दोनों हाथों की अंगुलियों में दस्ताने पहने और महान् धनुष चढ़ाये श्रीराम के चारों ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रात भर खड़े रहे। तदनन्तर मैं भी उत्तम बाण और धनुष लेकर वहीं आ खड़ा हुआ, जहाँ लक्ष्मण थे। उस समय अपने बन्धु- बान्धवों के साथ, जो निद्रा और आलस्य का त्याग करके धनुष-बाण लिये सदा सावधान रहे, मैं देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराम की रक्षा करता रहा। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-८१(81) समाप्त !

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