मन्थरा के ऐसा कहने पर कैकेयी का मुख क्रोध से तमतमा उठा। वह लंबी और गरम साँस खींचकर उससे इस प्रकार बोली - कुब्जे ! मैं श्रीराम को शीघ्र ही यहाँ से वन में भेजूँगी और तुरंत ही युवराज के पद पर भरत का अभिषेक कराऊँगी। परंतु इस समय यह तो सोचो कि किस उपाय से अपना अभीष्ट साधन करूँ ? भरत को राज्य प्राप्त हो जाये और श्रीराम उसे किसी तरह भी न पा सकें यह काम कैसे बने?
देवी कैकेयी के ऐसा कहने पर पाप का मार्ग दिखाने वाली मन्थरा श्रीराम के स्वार्थ पर कुठाराघात करती हुई वहाँ कैकेयी से इस प्रकार बोली - केकयनन्दिनि! अच्छा, अब देखो कि मैं क्या करती हूँ? तुम मेरी बात सुनो, जिससे केवल तुम्हारे पुत्र भरत ही राज्य प्राप्त करेंगे श्रीराम नहीं। कैकेयि! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है? या स्मरण होनेपर भी मुझसे छिपा रही हो? जिसकी तुम मुझसे अनेक बार चर्चा करती रहती हो, अपने उसी प्रयोजन को तुम मुझसे सुनना चाहती हो? इसका क्या कारण है? विलासिनि! यदि मेरे ही मुँह से सुनने के लिये तुम्हारा आग्रह है तो बताती हूँ, सुनो और सुनकर इसी के अनुसार कार्य करो।'
मन्थरा का यह वचन सुनकर कैकेयी अच्छी तरह से बिछे हुए उस पलंग से कुछ उठकर उससे यों बोली – मन्थरे! मुझसे वह उपाय बताओ। किस उपाय से भरत को तो राज्य मिल जायेगा, किंतु श्रीराम उसे किसी तरह नहीं पा सकेंगे।
देवी कैकेयी के ऐसा कहने पर पाप का मार्ग दिखाने वाली मन्थरा श्रीराम के स्वार्थ पर कुठाराघात करती हुई उस समय कैकेयी से इस प्रकार बोली - देवी! पूर्वकाल की बात है कि देवासुर संग्राम के अवसर पर राजर्षियों के साथ तुम्हारे पतिदेव तुम्हें साथ लेकर देवराज की सहायता करने के लिये गये थे। केकयराजकुमारी! दक्षिण दिशा में दण्डकारण्य के भीतर वैजयन्त नाम से विख्यात एक नगर है, जहाँ शम्बर नाम से प्रसिद्ध एक महान् असुर रहता था। वह अपनी ध्वजा में तिमि (व्हेल मछली) का चिह्न धारण करता था और सैकड़ों मायाओं का जानकार था। देवताओं के समूह भी उसे पराजित नहीं कर पाते थे। एक बार उसने इन्द्र के साथ युद्ध छेड़ दिया। उस महान् संग्राम में क्षत-विक्षत हुए पुरुष जब रात में थककर सो जाते, उस समय राक्षस उन्हें उनके बिस्तर से खींच ले जाते और मार डालते थे।
‘उन दिनों महाबाहु राजा दशरथ ने भी वहाँ असुरों के साथ बड़ा भारी युद्ध किया। उस युद्ध में असुरों ने अपने अस्त्र-शस्त्रों द्वारा उनके शरीर को जर्जर कर दिया। देवी! जब राजा की चेतना लुप्त सी हो गयी, उस समय सारथि का काम करती हुई तुमने अपने पति को रणभूमि से दूर हटाकर उनकी रक्षा की। जब वहाँ भी राक्षसों के शस्त्रों से वे घायल हो गये, तब तुमने पुन: वहाँ से अन्यत्र ले जाकर उनकी रक्षा की।
'शुभदर्शने! इससे संतुष्ट होकर महाराज ने तुम्हें दो वरदान देने को कहा – देवी ! उस समय तुमने अपने पति से कहा - ‘प्राणनाथ! जब मेरी इच्छा होगी, तब मैं इन वरों को माँग लूँगी।' उस समय उन महात्मा नरेश ने 'तथास्तु' कहकर तुम्हारी बात मान ली थी । देवी ! मैं इस कथा को नहीं जानती थी। पूर्वकाल में तुम्हीं ने मुझसे यह वृत्तान्त कहा था। तब से तुम्हारे स्नेहवश मैं इस बात को मन-ही-मन सदा याद रखती आयी हूँ। तुम इन वरों के प्रभाव से स्वामी को वश में करके श्रीराम के अभिषेक के आयोजन को पलट दो।'
‘तुम उन दोनों वरों को अपने स्वामी से माँगो। एक वर के द्वारा भरत का राज्याभिषेक और दूसरे के द्वारा श्रीराम का चौदह वर्ष तक का वनवास माँग लो। जब श्रीराम चौदह वर्षों के लिये वन में चले जायेंगे। तब उतने समय में तुम्हारे पुत्र भरत समस्त प्रजा के हृदय में अपने लिये स्नेह पैदा कर लेंगे और इस राज्य पर स्थिर हो जायेंगे। अश्वपतिकुमारी! तुम इस समय मैले वस्त्र पहन लो और कोपभवन में प्रवेश करके कुपित-सी होकर बिना बिस्तर के ही भूमि पर लेट जाओ।'
'राजा आवें तो उनकी ओर आँखें उठाकर न देखो और न उनसे कोई बात ही करो। महाराज को देखते ही रोती हुई शोकमग्न हो धरती पर लोटने लगो। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि तुम अपने पति को सदा ही बड़ी प्यारी रही हो। तुम्हारे लिये महाराज आग में भी प्रवेश कर सकते हैं। वे न तो तुम्हें कुपित कर सकते हैं और न कुपित अवस्था में तुम्हें देख ही सकते हैं। राजा दशरथ तुम्हारा प्रिय करने के लिये अपने प्राणों का भी त्याग कर सकते हैं।'
‘महाराज तुम्हारी बात किसी तरह टाल नहीं सकते। मुग्धे! तुम अपने सौभाग्य के बल का स्मरण करो। राजा दशरथ तुम्हें भुलावे में डालने के लिये मणि, मोती, सुवर्ण तथा भाँति-भाँति के रत्न देने की चेष्टा करेंगे; किंतु तुम उनकी ओर मन न चलाना। महाभागे! देवासुर-संग्राम के अवसर पर राजा दशरथ ने वे जो दो वर दिये थे, उनका उन्हें स्मरण दिलाना। वरदान के रूप में माँगा गया वह तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ सिद्ध हुए बिना नहीं रह सकता।'
'रघुकुलनन्दन राजा दशरथ जब स्वयं तुम्हें धरती से उठाकर वर देने को उद्यत हो जाये, तब उन महाराज को सत्य की शपथ दिलाकर खूब पक्का करके उनसे वर माँगना। वर माँगते समय कहना कि नृपश्रेष्ठ! आप श्रीराम को चौदह वर्षों के लिये बहुत दूर वन में भेज दीजिये और भरत को भूमण्डल का राजा बनाइये। श्रीराम के चौदह वर्षों के लिये वन में चले जाने पर तुम्हारे पुत्र भरत का राज्य सुदृढ़ हो जायेगा और प्रजा आदि को वश में कर लेने से यहाँ उनकी जड़ जम जाएगी। फिर चौदह वर्षों के बाद भी वे आजीवन स्थिर बने रहेंगे।'
'देवी ! तुम राजा से श्रीराम के वनवास का वर अवश्य माँगो। पुत्र के लिये राज्य की कामना करनेवाली रानी! ऐसा करने से तुम्हारे पुत्र के सभी मनोरथ सिद्ध हो जायेंगे। इस प्रकार वनवास मिल जाने पर ये राम राम नहीं रह जायेंगे इनका आज जो प्रभाव है वह भविष्य में नहीं रह सकेगा और तुम्हारे भरत भी शत्रुहीन राजा होंगे। जिस समय श्रीराम वन से लौंटेंगे, उस समय तक तुम्हारे पुत्र भरत भीतर और बाहर से भी दृढ़मूल हो जायेंगे। उनके पास सैनिक-बल का भी संग्रह हो जायेगा; जितेन्द्रिय तो वे हैं ही; अपने सुहृदों के साथ रहकर दृढमूल हो जायेंगे। इस समय मेरी मान्यता के अनुसार राजा को श्रीराम के राज्याभिषेक के संकल्प से हटा देने का समय आ गया है; अत: तुम निर्भय होकर राजा को अपने वचनों में बाँध लो और उन्हें श्रीराम के अभिषेक के संकल्प से हटा दो।'
ऐसी बातें कहकर मन्थरा ने कैकेयी की बुद्धि में अनर्थ को ही अर्थरूप में जँचा दिया। कैकेयी को उसकी बात पर विश्वास हो गया और वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। यद्यपि वह बहुत समझदार थी, तो भी कुबरी के कहने से नादान बालिका की तरह कुमार्ग पर चली गयी – अनुचित काम करने को तैयार हो गयी।
उसे मन्थरा की बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह उससे इस प्रकार बोली - हित की बात बताने में कुशल कुब्जे ! तू एक श्रेष्ठ स्त्री है; मैं तेरी बुद्धि की अवहेलना नहीं करूँगी। बुद्धि के द्वारा किसी कार्य का निश्चय करने में तू इस पृथ्वी पर सभी कुब्जाओं में उत्तम है। केवल तू ही मेरी हितैषिणी है और सदा सावधान रहकर मेरा कार्य सिद्ध करने में लगी रहती है।
‘कुब्जे! यदि तू न होती तो राजा जो षड्यन्त्र रचना चाहते हैं, वह कदापि मेरी समझ में नहीं आता। तेरे सिवा जितनी कुब्जाएँ हैं, वे बेडौल शरीर वाली, टेढ़ी-मेढ़ी और बड़ी पापिनी होती हैं। तू तो वायु के द्वारा झुकायी हुई कमलिनी की भाँति कुछ झुकी हुई होने पर भी देखने में प्रिय (सुन्दर) है। तेरा वक्ष:स्थल कुब्जता के दोष से व्याप्त है, अतएव कंधों तक ऊँचा दिखायी देता है।'
‘वक्ष:स्थल से नीचे सुन्दर नाभि से युक्त जो उदर है, वह मानो वक्षःस्थल की ऊँचाई देखकर लज्जित-सा हो गया है, इसीलिये शान्त-कृश प्रतीत होता है। तेरा जघन विस्तृत है और दोनों स्तन सुन्दर एवं स्थूल हैं। मन्थरे! तेरा मुख निर्मल चन्द्रमा के समान अद्भुत शोभा पा रहा है। करधनी की लड़ियों से विभूषित तेरी कटि का अग्रभाग बहुत ही स्वच्छ – रोमादि से रहित है।'
'मन्थरे! तेरी पिण्डलियाँ परस्पर अधिक सटी हुई हैं और दोनों पैर बड़े-बड़े हैं। तू विशाल ऊरुओं (जाँघों) से सुशोभित होती है। शोभने ! जब तू रेशमी साड़ी पहनकर मेरे आगे-आगे चलती है, तब तेरी बड़ी शोभा होती है। असुर राज शम्बर को जिन सहस्रों मायाओं का ज्ञान है, वे सब तेरे हृदय में स्थित हैं; इनके अलावा भी तू हजारों प्रकार की मायाएँ जानती है। इन मायाओं का समुदाय ही तेरा यह बड़ा-सा कुब्बड़ है, जो रथ के नकुए (अग्रभाग) के समान बड़ा है। इसी में तेरी मति, स्मृति और बुद्धि, क्षत्रविद्या (राजनीति) तथा नाना प्रकार की मायाएँ निवास करती हैं।'
'सुन्दरी कुब्जे! यदि भरत का राज्याभिषेक हुआ और श्रीराम वन को चले गये तो मैं सफल मनोरथ एवं संतुष्ट होकर अच्छी जाति के खूब तपाये हुए सोने की बनी हुई सुन्दर स्वर्ण माला तेरे इस कुब्बड़ को पहनाऊँगी और इस पर चन्दन का लेप लगवाऊँगी। कुब्जे! तेरे मुख (ललाट) पर सुन्दर और विचित्र सोने का टीका लगवा दूँगी और तू बहुत-से सुन्दर आभूषण एवं दो उत्तम वस्त्र (लहँगा और दुपट्टा) धारण करके देवाङ्गना के समान विचरण करेगी।'
‘चन्द्रमा से होड़ लगाने वाले अपने मनोहर मुख द्वारा तू ऐसी सुन्दर लगेगी कि तेरे मुख की कहीं समता नहीं रह जायेगी तथा शत्रुओं के बीच में अपने सौभाग्य पर गर्व प्रकट करती हुई तू सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लेगी। जैसे तू सदा मेरे चरणों की सेवा किया करती है, उसी प्रकार समस्त आभूषणों से विभूषित बहुत-सी कुब्जाएँ तुझ कुब्जा के भी चरणों की सदा परिचर्या किया करेंगी।'
जब इस प्रकार कुब्जा की प्रशंसा की गयी, तब उसने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि-शिखा के समान शुभ्र शय्या पर शयन करनेवाली कैकेयी से इस प्रकार कहा - कल्याणि ! नदी का पानी निकल जाने पर उसके लिये बाँध नहीं बाँधा जाता, यदि राम का अभिषेक हो गया तो तुम्हारा वर माँगना व्यर्थ होगा; अत: बातों में समय न बिताओ जल्दी उठो और अपना कल्याण करो। कोपभवन में जाकर राजा को अपनी अवस्था का परिचय दो।
मन्थरा के इस प्रकार प्रोत्साहन देने पर सौभाग्य के मद से गर्व करनेवाली विशाल लोचना सुन्दरी कैकेयी देवी उसके साथ ही कोपभवन में जाकर लाखों की लागत के मोतियों के हार तथा दूसरे-दूसरे सुन्दर बहुमूल्य आभूषणों को अपने शरीर से उतार उतारकर फेंकने लगी।
सोने के समान सुन्दर कान्तिवाली कैकेयी कुब्जा की बातों के वशीभूत हो गयी थी, अतः वह धरती पर लेटकर मन्थरा से इस प्रकार बोली - कुब्जे! मुझे न तो सुवर्ण से, न रत्नों से और न भाँति-भाँति के भोजनों से ही कोई प्रयोजन है; यदि श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तो यह मेरे जीवन का अन्त होगा। अब या तो श्रीराम के वन में चले जाने पर भरत को इस भूतल का राज्य प्राप्त होगा अथवा तू यहाँ महाराज को मेरी मृत्यु का समाचार सुनायेगी।
तदनन्तर कुब्जा महाराज दशरथ की रानी और भरत की माता कैकेयी से अत्यन्त क्रूर वचनों द्वारा पुनः ऐसी बात कहने लगी, जो लौकिक दृष्टि से भरत के लिये हितकर और श्रीराम के लिये अहितकर थी - कल्याणि! यदि श्रीराम इस राज्य को प्राप्त कर लेंगे तो निश्चय ही अपने पुत्र भरत सहित तुम भारी संताप में पड़ जाओगी, अत: ऐसा प्रयत्न करो, जिससे तुम्हारे पुत्र भरत का राज्याभिषेक हो जाये।
इस प्रकार कुब्जा ने अपने वचनरूपी बाणों का बारंबार प्रहार करके जब रानी कैकेयी को अत्यन्त घायल कर दिया, तब वह अत्यन्त विस्मित और कुपित हो अपने हृदय पर दोनों हाथ रखकर कुब्जा से बारंबार इस प्रकार कहने लगी - कुब्जे! अब या तो रामचन्द्र के अधिक काल के लिये वन में चले जाने पर भरत का मनोरथ सफल होगा या तू मुझे यहाँ से यमलोक में चली गयी सुनकर महाराज से यह समाचार निवेदन करेगी। यदि राम यहाँ से वन को नहीं गये तो मैं न तो भाँति-भाँति के बिछौने, न फूलों के हार, न चन्दन, न अञ्जन, न पान, न भोजन और न दूसरी ही कोई वस्तु लेना चाहूँगी। उस दशा में तो मैं यहाँ इस जीवन को भी नहीं रखना चाहूँगी।
ऐसे अत्यन्त कठोर वचन कहकर कैकेयी ने सारे आभूषण उतार दिये और बिना बिस्तर के ही वह खाली जमीन पर लेट गयी। उस समय वह स्वर्ग से भूतल पर गिरी हुई किसी किन्नरी के समान जान पड़ती थी। उसका मुख बढ़े हुए अमर्षरूपी अन्धकार से आच्छादित हो रहा था। उसके अगों से उत्तम पुष्पहार और आभूषण उतर चुके थे। उस दशा में उदास मन वाली राजरानी कैकेयी जिसके तारे डूब गये हों, उस अन्धकाराच्छन्न आकाश के समान प्रतीत होती थी।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-७(7) समाप्त !

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