उसे (निषादराज गुह) आते देख समयोचित कर्तव्य को समझने वाले प्रतापी आर्य सुमन्त्र ने विनीत की भाँति भरत से कहा – ककुत्स्थकुलभूषण ! यह बूढ़ा निषादराज गुह अपने सहस्रों भाई-बन्धुओं के साथ यहाँ निवास करता है। यह तुम्हारे बड़े भाई श्रीराम का सखा है। इसे दण्डकारण्य के मार्ग की विशेष जानकारी है। निश्चय ही इसे पता होगा कि दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं, अतः निषादराज गुह यहाँ आकर तुमसे मिलें, इसके लिये अवसर दो।
सुमन्त्र के मुख से यह शुभ वचन सुनकर भरत ने कहा - निषादराज गुह मुझसे शीघ्र मिलें - इसकी व्यवस्था की जाय।
मिलने की अनुमति पाकर गुह अपने भाई-बन्धुओं के साथ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आया और भरत से मिलकर बड़ी नम्रता के साथ बोला - यह वन- प्रदेश आपके लिये घर में लगे हुए बगीचे के समान है। आपने अपने आगमन की सूचना न देकर हमें धोखे में रख दिया। हम आपके स्वागत की कोई तैयारी न कर सके। हमारे पास जो कुछ है, वह सब आपकी सेवा में अर्पित है। यह निषादों का घर आपका ही है, आप यहाँ सुखपूर्वक निवास करें।
'यह फल-मूल आपकी सेवा में प्रस्तुत है। इसे निषाद लोग स्वयं तोड़कर लाये हैं। इनमें से कुछ फल तो अभी हरे ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं। इनके साथ तैयार किया हुआ फल का गूदा भी है। इन सबके सिवा नाना प्रकार के दूसरे- दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। इन सबको ग्रहण करें। हम आशा करते हैं कि यह सेना आज की रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन स्वीकार करेगी। नाना प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुओं से आज हम सेना सहित आपका सत्कार करेंगे, फिर कल सवेरे आप अपने सैनिकों के साथ यहाँ से अन्यत्र जाइयेगा।
निषादराज गुह के ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान् भरत ने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनों में उसे इस प्रकार उत्तर दिया - भैया! तुम मेरे बड़े भाई श्रीराम के सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेना का सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो - तुम्हारी श्रद्धा से ही हम सब लोगों का सत्कार हो गया।
यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरत ने गन्तव्य मार्ग को हाथ के संकेत से दिखाते हुए पुनः गुह से उत्तम वाणी में पूछा – निषादराज! इन दो मार्गों में से किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनि के आश्रम पर जाना होगा? गङ्गा के किनारे का यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है।
बुद्धिमान् राजकुमार भरत का यह वचन सुनकर वन में विचरनेवाले गुह ने हाथ जोड़कर कहा - महाबली राजकुमार्! आपके साथ बहुत-से मल्लाह जायँगे, जो इस प्रदेश से पूर्ण परिचित तथा भलीभाँति सावधान रहनेवाले हैं। इनके सिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा। परन्तु एक बात बताइये, अनायास ही महान पराक्रम करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के प्रति आप कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं? आपकी यह विशाल सेना मेरे मन में शङ्का-सी उत्पन्न कर रही है।
ऐसी बात कहते हुए गुह से आकाश के समान निर्मल भरत ने मधुर वाणी में कहा - निषादराज! ऐसा समय कभी न आये। तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ। तुम्हें मुझ पर संदेह नहीं करना चाहिये। श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं। मैं उन्हें पिता के समान मानता हूँ। ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम वन में निवास करते हैं, अत: उन्हें लौटा लाने के लिये जा रहा हूँ। गुह! मैं तुमसे सच कहता हूँ। तुम्हें मेरे विषय में कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।
भरत की बात सुनकर निषादराज का मुँह प्रसन्नता से खिल उठा। वह हर्ष से भरकर पुन: भरत से बोला – आप धन्य हैं, जो बिना प्रयत्न के हाथ में आये हुए राज्य को त्याग देना चाहते हैं। आपके समान धर्मात्मा मुझे इस भूमण्डल में कोई नहीं दिखायी देता। कष्टप्रद वन में निवास करने वाले श्रीराम को जो आप लौटा लाना चाहते हैं, इससे समस्त लोकों में आपकी अक्षय कीर्ति का प्रसार होगा।
जब गुह भरत से इस प्रकार की बातें कह रहा था, उसी समय सूर्यदेव की प्रभा अदृश्य हो गयी और रात का अन्धकार सब ओर फैल गया। गुहु के बर्ताव से श्रीमान् भरत को बड़ा संतोष हुआ और वे सेना को विश्राम करने की आज्ञा दे शत्रुघ्न के साथ शयन करने के लिये गये। धर्म पर दृष्टि रखने वाले महात्मा भरत शोक के योग्य नहीं थे तथापि उनके मन में श्रीरामचन्द्रजी के लिये चिन्ता के कारण ऐसा शोक उत्पन्न हुआ, जिसका वर्णन नहीं हो सकता।
जैसे वन में फैले हुए दावानल से संतप्त हुए वृक्ष को उसके खोखले में छिपी हुई आग और भी अधिक जलाती है, उसी प्रकार दशरथ मरणजन्य चिन्ता की आग से संतप्त हुए रघुकुलनन्दन भरत को वह राम वियोग से उत्पन्न हुई शोकानि और भी जलाने लगी। जैसे सूर्य की किरणों से तपा हुआ हिमालय अपनी पिघली हुई बर्फ को बहाने लगता है, उसी प्रकार भरत शोकाग्नि से संतप्त होने के कारण अपने सम्पूर्ण अङ्गों से पसीना बहाने लगे।
उस समय कैकेयीकुमार भरत दुःख के विशाल पर्वत से आक्रान्त हो गये थे। श्रीरामचन्द्रजी का ध्यान ही उसमें छिद्ररहित शिलाओं का समूह था। दुःखपूर्ण उच्छवास ही गैरिक आदि धातु का स्थान ले रहा था । दीनता (इन्द्रियों की अपने विषयों से विमुखता) ही वृक्षसमूहों के रूप में प्रतीत होती थी। शोकजनित आयास ही उस दुःखरूपी पर्वत के ऊँचे शिखर थे। अतिशय मोह ही उसमें अनन्त प्राणी थे। बाहर-भीतर की इन्द्रियों में होनेवाले संताप ही उस पर्वत की ओषधियाँ तथा बाँस के वृक्ष थे।
उनका मन बहुत दु:खी था। वे लंबी साँस खींचते हुए सहसा अपनी सुध-बुध खोकर बड़ी भारी आपत्ति में पड़ गये। मानसिक चिन्ता से पीड़ित होने के कारण नरश्रेष्ठ भरत को शान्ति नहीं मिलती थी। उनकी दशा अपने झुंड से बिछुड़े हुए वृषभ की-सी हो रही थी। परिवार सहित एकाग्रचित्त महानुभाव भरत जब गुह से मिले, उस समय उनके मन में बड़ा दुःख था। वे अपने बड़े भाई के लिये चिन्तित थे, अतः गुह ने उन्हें पुनः आश्वासन दिया।

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