उधर निषादराज गुह ने गङ्गा नदी के तट पर ठहरी हुई भरत की सेना को देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई-बन्धुओं से कहा - भाइयो! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्र के समान अपार दिखायी देती है; मैं मन से बहुत सोचने पर भी इसका पार नहीं पाता हूँ। निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हुआ है; यह कोविदार के चिह्नवाली विशाल ध्वजा उसी के रथ पर फहरा रही है।
‘मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियों द्वारा पहले हम लोगों को पाशों से बँधवायेगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिता ने राज्य से निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीराम को भी मार डालेगा। कैकेयी का पुत्र भरत राजा दशरथ की सम्पन्न एवं सुदुर्लभ राजलक्ष्मी को अकेला ही हड़प लेना चाहता है, इसीलिये वह श्रीरामचन्द्रजी को वन में मार डालने के लिये जा रहा है।'
'समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्री राम को मारकर सुख से निष्कण्टक राज्य करूँगा। भरत ने हृदय में राजनीति को स्थान नहीं दिया (राजनीति का विचार नहीं किया)। तब (पहले) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवन से ही हाथ धोना पड़ेगा। सम्पूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जाएँ, तो भी श्री रामजी को रण में जीतने वाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? विष की बेलें अमृतफल कभी नहीं फलतीं!'
‘परंतु दशरथकुमार श्रीराम मेरे स्वामी और सखा हैं, इसलिये उनके हित की कामना रखकर तुम लोग अस्त्र- शस्त्रों से सुसज्जित हो यहाँ गङ्गा के तट पर मौजूद रहो। सभी मल्लाह सेना के साथ नदी की रक्षा करते हुए गङ्गा के तट पर ही खड़े रहें और नाव पर रखे हुए फल - मूल आदि का आहार करके ही आज की रात बितावें। हमारे पास पाँच सौ नावें हैं, उनमें से एक-एक नाव पर मल्लाहों के सौ-सौ जवान युद्ध सामग्री से परिपूर्ण होकर बैठे रहें।'
'सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने के साज सजा लो (अर्थात भरत से युद्ध में लड़कर मरने के लिए तैयार हो जाओ)। मैं भरत से सामने (मैदान में) लोहा लूँगा (मुठभेड़ करूँगा) और जीते जी उन्हें गंगा पार न उतरने दूँगा। युद्ध में मरण, फिर गंगाजी का तट, श्री रामजी का काम और क्षणभंगुर शरीर (जो चाहे जब नाश हो जाए), भरत श्री रामजी के भाई और राजा (उनके हाथ से मरना) और मैं नीच सेवक- बड़े भाग्य से ऐसी मृत्यु मिलती है।'
'मैं स्वामी के काम के लिए रण में युद्ध करूँगा और चौदहों लोकों को अपने यश से उज्ज्वल कर दूँगा। श्री रघुनाथजी के निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथों में आनंद के लड्डू हैं (अर्थात जीत गया तो राम सेवक का यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्री रामजी की नित्य सेवा प्राप्त करूँगा)। साधुओं के समाज में जिसकी गिनती नहीं और श्री रामजी के भक्तों में जिसका स्थान नहीं, वह जगत में पृथ्वी का भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माता के यौवन रूपी वृक्ष के काटने के लिए कुल्हाड़ा मात्र है।
इस प्रकार श्री रामजी के लिए प्राण समर्पण का निश्चय करके निषादराज विषाद से रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्री रामचन्द्रजी का स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा।
उसने कहा - हे भाइयों! जल्दी करो और सब सामान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मन में कायरता न लावे। सब हर्ष के साथ बोल उठे- हे नाथ! बहुत अच्छा और आपस में एक-दूसरे का जोश बढ़ाने लगे।
निषादराज को जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राम में लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्री रामचन्द्रजी के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण करके उन्होंने भाथियाँ (छोटे-छोटे तरकस) बाँधकर धनुहियों (छोटे-छोटे धनुषों) पर प्रत्यंचा चढ़ाई। कवच पहनकर सिर पर लोहे का टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछों को सीधा कर रहे हैं (सुधार रहे हैं)। कोई तलवार के वार रोकने में अत्यन्त ही कुशल है। वे ऐसे उमंग में भरे हैं, मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद (उछल) रहे हों।
अपना-अपना साज-समाज (युद्ध का सामान और दल) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुह को जोहार की। निषादराज ने सुंदर योद्धाओं को देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया।
उसने कहा - हे भाइयों! धोखा न लाना (अर्थात मरने से न घबराना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोश के साथ बोल उठे- हे वीर! अधीर मत हो ! हे नाथ! श्री रामचन्द्रजी के प्रताप से और आपके बल से हम लोग भरत की सेना को बिना वीर और बिना घोड़े की कर देंगे (एक-एक वीर और एक-एक घोड़े को मार डालेंगे)। जीते जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वी को रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे (सिरों और धड़ों से छा देंगे)।
निषादराज ने वीरों का बढ़िया दल देखकर कहा - जुझारू (संग्राम का) ढोल बजाओ। इतना कहते ही बाईं ओर छींक हुई। शकुन विचारने वालों ने कहा कि खेत सुंदर हैं (जीत होगी)। एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा - भरत से मिल लीजिए, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्री रामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है।
यह सुनकर निषादराज गुहने कहा - बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में (बिना विचारे) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित की बहुत बड़ी हानि है।
उसने फिर कहा - यदि यहाँ भरत का भाव श्रीराम के प्रति संतोषजनक होगा, तभी उनकी यह सेना आज कुशलपूर्वक गङ्गा के पार जा सकेगी। यों कहकर निषादराज गुह मत्स्यण्डी - (मिश्री), फल के गूदे और मधु आदि भेंट की सामग्री लेकर भरत के पास गया।

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