भाग-७७(77) भरत की वनयात्रा और श्रृङ्गवेरपुर में रात्रिवास

 


नगर के नर-नारी चकवे-चकवी की भाँति हृदय में अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकाल का होना चाहते हैं। सारी रात जागते-जागते सवेरा हो गया। तदनन्तर प्रात:काल उठकर भरतजी ने तब चतुर मंत्रियों को बुलवाया और कहा- तिलक का सब सामान ले चलो। वन में ही मुनि वशिष्ठजी श्री रामचन्द्रजी को राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मंत्रियों ने वंदना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिए। तब भरतजी ने उत्तम रथ पर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया। 

उनके आगे-आगे सभी मन्त्री और पुरोहित घोड़े जुते हुए रथों पर बैठकर यात्रा कर रहे थे। वे रथ सूर्यदेव के रथ के समान तेजस्वी दिखायी देते थे। यात्रा करते हुए इक्ष्वाकुकुलनन्दन भरत के पीछे-पीछे विधिपूर्वक सजाये गये नौ हजार हाथी चल रहे थे॥ यात्रापरायण यशस्वी राजकुमार भरत के पीछे साठ हजार रथ और नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले धनुर्धर योद्धा भी जा रहे थे। उसी प्रकार एक लाख घुड़सवार भी उन यशस्वी रघुकुलनन्दन राजकुमार भरत की यात्रा के समय उनका अनुसरण कर रहे थे। कैकेयी, सुमित्रा और यशस्विनी कौशल्या देवी भी श्रीरामचन्द्रजी को लौटा लाने के लिये की जाने वाली उस यात्रा से संतुष्ट हो तेजस्वी रथ के द्वारा प्रस्थित हुईं। 

ब्राह्मण आदि आर्यों (त्रैवर्णिकों) के समूह मन में अत्यन्त हर्ष लेकर लक्ष्मण सहित श्रीराम का दर्शन करने के लिये उन्हीं के सम्बन्ध में विचित्र बातें कहते सुनते हुए यात्रा कर रहे थे। 

वे आपस में कहते थे - 'हमलोग दृढ़ता के साथ उत्तम व्रत का पालन करने वाले तथा संसार का दु:ख दूर करनेवाले, स्थितप्रज्ञ, श्यामवर्ण महाबाहु श्रीराम का कब दर्शन करेंगे? जैसे सूर्यदेव उदय लेते ही सारे जगत का अन्धकार हर लेते हैं, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी हमारी आँखों के सामने पड़ते ही हमलोगों का सारा शोक संताप दूर कर देंगे। 

इस प्रकार की बातें कहते और अत्यन्त हर्ष से भरकर एक-दूसरे का आलिङ्गन करते हुए अयोध्या के नागरिक उस समय यात्रा कर रहे थे। उस नगर में जो दूसरे सम्मानित पुरुष थे, वे सब लोग तथा व्यापारी और शुभ विचार वाले प्रजाजन भी बड़े हर्ष के साथ श्रीराम से मिलने के लिये प्रस्थित हुए। 

जो कोई मणिकार (मणियों को सान पर चढ़ाकर चमका देनेवाले), अच्छे कुम्भकार, सूत का ताना-बाना करके बस्त्र बनाने की कला के विशेषज्ञ, शस्त्र निर्माण करके जीविका चलाने वाले, मायूरक (मोर की पाँखों से छत्र - व्यजन आदि बनाने वाले), आरे से चन्दन आदि की लकड़ी चीरने वाले, मणि-मोती आदि में छेद करने वाले, रोचक (दीवारों और वेदी आदि में शोभा का सम्पादन करने वाले), दन्तकार (हाथी के दाँत आदि से नाना प्रकार की वस्तुओं का निर्माण करने वाले), सुधाकार (चूना बनाने वाले), गन्धी, प्रसिद्ध सोनार, कम्बल और कालीन बनाने वाले, गरम जल से नहलाने का काम करनेवाले, वैद्य, धूपक (धूपन-क्रिया द्वारा जीविका चलाने वाले), शौण्डिक (मद्यविक्रेता), धोबी, दर्जी, गाँवों तथा गोशालाओं के महतो, स्त्रियों सहित नट, केवट तथा समाहितचित्त सदाचारी वेदवेत्ता सहस्रों ब्राह्मण बैलगाड़ियों पर चढ़कर वन की यात्रा करने वाले भरत के पीछे-पीछे गये। 

सबके वेश सुन्दर थे। सबने शुद्ध वस्त्र धारण कर रखे थे तथा सबके अगों में ताँबे के समान लाल रंग का अङ्गराग लगा था। वे सब-के-सब नाना प्रकार के वाहनों द्वारा धीरे-धीरे भरत का अनुसरण कर रहे थे। हर्ष और आनन्द में भरी हुई वह सेना भाई को बुलाने के लिये प्रस्थित हुए कैकेयीकुमार भ्रातृवत्सल भरत के पीछे- पीछे चलने लगी। 

इस प्रकार रथ, पालकी, घोड़े और हाथियों के द्वारा बहुत दूर तक का मार्ग तय कर लेने के बाद वे सब लोग श्रृङ्गवेरपुर में गङ्गाजी के तट पर जा पहुँचे। जहाँ श्रीरामचन्द्रजी का सखा वीर निषादराज गुह सावधानी के साथ उस देश की रक्षा करता हुआ अपने भाई-बन्धुओं के साथ निवास करता था। चक्रवाकों से अलंकृत गङ्गातट पर पहुँचकर भरत का अनुसरण करने वाली वह सेना ठहर गयी। 

पुण्यसलिला भागीरथी का दर्शन करके अपनी उस सेना को शिथिल हुई देख बातचीत करने की कला में कुशल भरत ने समस्त सचिवों से कहा - आप लोग मेरे सैनिकों को उनकी इच्छा अनुसार यहाँ सब ओर ठहरा दीजिये। आज रात में विश्राम कर लेने के बाद हम सब लोग कल सवेरे इन सागरगामिनी नदी गंगाजी को पार करेंगे। यहाँ ठहरने का एक ओर प्रयोजन है - मैं चाहता हूँ कि गङ्गाजी में उतरकर स्वर्गीय महाराज के पारलौकिक कल्याण के लिये जलाञ्जलि दे दूँ। 

उनके इस प्रकार कहने पर सभी मन्त्रियों ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और समस्त सैनिकों को उनकी इच्छा के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों पर ठहरा दिया। महानदी गङ्गा के तट पर खेमे आदि से सुशोभित होने वाली उस सेना को व्यवस्था पूर्वक ठहराकर भरत ने महात्मा श्रीराम के लौटने के विषय में विचार करते हुए उस समय वहीं निवास किया। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-७७(77) समाप्त !

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