भाग-७२(72) शत्रुघ्न का रोष, उनका कुब्जा को घसीटना और भरतजी के कहने से उसे मूर्च्छित अवस्था में छोड़ देना

 


तेरहवें दिन का कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी के पास जाने का विचार करते हुए शोकसंतप्त भरत से लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्र ने इस प्रकार कहा - भैया! जो दु:ख के समय अपने तथा आत्मीयजनों के लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियों को भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्री के द्वारा वन में भेज दिये गये (यह कितने खेद की बात है) तथा वे जो बल और पराक्रम से सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिता को कैद करके भी श्रीराम को इस संकट से क्यों नहीं छुड़ाया ? जब राजा एक नारी के वश में होकर बुरे मार्ग पर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्याय का विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था। 

लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोष में भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणों से विभूषित हो उस राजभवन के पूर्वद्वार पर आकर खड़ी हो गयी। उसके अङ्गों में उत्तमोत्तम चन्दन का लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियों के पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँति के आभूषणों से सज-धजकर वहाँ आयी थी। करधनी की विचित्र लड़ियों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियों में बँधी हुई वानरी समान जान पड़ती थी। 

वही सारी बुराइयों की जड़ थी। वही श्रीराम के वनवासरूपी पाप का मूल कारण थी । उस पर दृष्टि पड़ते ही द्वारपाल ने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयता के साथ घसीट लाकर शत्रुघ्न के हाथ में देते हुए कहा – राजकुमार ! जिसके कारण श्रीराम को वन में निवास करना पड़ा है और आप लोगों के पिता ने शरीर का परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करनेवाली पापिनी यही है। आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें करें। 

द्वारपाल की बात पर विचार करके शत्रुघ्न का दुःख और बढ़ गया। उन्होंने अपने कर्तव्य का निश्चय किया और अन्त:पुर में रहने वाले सब लोगों को सुनाकर इस प्रकार कहा - इस पापिनी ने मेरे भाइयों तथा पिता को जैसा दुःसह दुःख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्म का वैसा ही फल यह भी भोगे। 

ऐसा कहकर शत्रुघ्न ने सखियों से घिरी हुई कुब्जा को तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया। वह डर के मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूँज उठा। फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्न को कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं। उसकी सम्पूर्ण सखियों ने एक जगह एकत्र होकर आपस में सलाह की कि 'जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जा को पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हम लोगों में से किसी को जीवित नहीं छोड़ेंगे। अतः हम लोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौशल्या की शरण में चलें। इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं। 

शत्रुओं का दमन करने वाले शत्रुघ्न रोष में भरकर कुब्जा को जमीन पर घसीटने लगे। उस समय वह जोर-जोर से चीत्कार कर रही थी। जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकार के विचित्र आभूषण टूट-टूट कर पृथ्वी पर इधर- उधर बिखरे जाते थे। आभूषणों के उन टुकड़ों से वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओं से अलंकृत शरत्काल के आकाश की भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था। 

बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थरा को जोर से पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ाने के लिये कैकेयी उनके पास आयी। तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं - उसे रोषपूर्वक फटकारा। शत्रुघ्न के वे कठोर वचन बड़े ही दुःखदायी थे। उन्हें सुनकर कैकेयी को बहुत दु:ख हुआ। वह शत्रुघ्न के भय से थर्रा उठी और अपने पुत्र की शरण में आयी। 

शत्रुघ्न को क्रोध में भरा हुआ देख भरत ने उनसे कहा – सुमित्राकुमार ! क्षमा करो। स्त्रियाँ सभी प्राणियों के लिये अवध्य होती हैं। यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करनेवाली पापिनी कैकेयी को मार डालता। धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जा के भी मारे जाने का समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे। 

भरतजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थरा के वधरूपी दोष से निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्था में ही छोड़ दिया। 

मन्थरा कैकेयी के चरणों में गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दु:ख से आर्त हो करुण विलाप करने लगी। 

शत्रुघ्न के पटकने और घसीटने से आर्त एवं अचेत हुई कुब्जा को देखकर भरत की माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने–होश में लाने की चेष्टा करने लगी। उस समय कुब्जा पिंजड़े में बँधी हुई क्रौञ्ची की भाँति कातर दृष्टि से उसकी ओर देख रही थी। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-७२(72) समाप्त !

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