तदनन्तर दशाह व्यतीत हो जाने पर राजकुमार भरत ने ग्यारहवें दिन आत्मशुद्धि के लिये स्नान और एकादशाह श्राद्ध का अनुष्ठान किया, फिर बारहवाँ दिन आने पर उन्होंने अन्य श्राद्ध कर्म (मासिक और सपिण्डीकरण श्राद्ध) किये। उसमें भरत ने ब्राह्मणों को धन, रत्न, प्रचुर अन्न, बहुमूल्य वस्त्र, नाना प्रकार के रत्न, बहुत-से बकरे, चाँदी और बहुतेरी गौएँ दान कीं।
राजपुत्र भरत ने राजा के पारलौकिक हित के लिये बहुत से दास, दासियाँ, सवारियाँ तथा बड़े-बड़े घर भी ब्राह्मणों को दिये। तदनन्तर तेरहवें दिन प्रातः काल महाबाहु भरत शोक से मूर्च्छित होकर विलाप करने लगे।
उस समय रोने से उनका गला भर आया था, वे पिता के चितास्थान पर अस्थिसंचय के लिये आये और अत्यन्त दु:खी होकर इस प्रकार कहने लगे - तात! आपने मुझे जिन ज्येष्ठ भ्राता श्रीरघुनाथजी के हाथ में सौंपा था, उनके वन में चले जाने पर आपने मुझे सूने में ही छोड़ दिया (इस समय मेरा कोई सहारा नहीं)। तात! नरेश्वर! जिन अनाथ हुई देवी के एकमात्र आधार पुत्र को आपने वन में भेज दिया, उन माता कौशल्या को छोड़कर आप कहाँ चले गये?
पिता की चिता का वह स्थानमण्डल भस्म से भरा हुआ था, अत्यन्त दाह के कारण कुछ लाल दिखायी देता था । वहाँ पिता की जली हुई हड्डियाँ बिखरी हुई थीं। पिता के शरीर के निर्वाण का वह स्थान देखकर भरत अत्यन्त विलाप करते हुए शोक में डूब गये। उस स्थान को देखते ही वे दीनभाव से रोकर पृथ्वी पर गिर पड़े। जैसे इन्द्र का यन्त्रबद्ध ऊँचा ध्वज ऊपर को उठाये जाते समय खिसककर गिर पड़ा हो।
तब उनके सारे मन्त्री उन पवित्र व्रत वाले भरत के पास आ पहुँचे, जैसे पुण्यों का अन्त होने पर स्वर्ग से गिरे हुए राजा ययाति के पास अष्टक आदि राजर्षि आ गये थे। भरत को शोक में डूबा हुआ देख शत्रुघ्न भी अपने पिता महाराज दशरथ का बारंबार स्मरण करते हुए अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
वे समय-समय पर अनुभव में आये हुए पिता के लालन-पालन सम्बन्धी उन उन गुणों का स्मरण करके अत्यन्त दुःखी हो सुध-बुध खोकर उन्मत्त के समान विलाप करने लगे - हाय! मन्थरा से जिसका प्राकट्य हुआ है, कैकेयीरूपी ग्राह से जो व्याप्त है तथा जो किसी प्रकार भी मिटाया नहीं जा सकता, उस वरदानमय शोकरूपी उग्र समुद्र ने हम सब लोगों को अपने भीतर निमग्न कर दिया है। तात! आपने जिनका सदा लाड़-प्यार किया है तथा जो सुकुमार और बालक हैं, उन रोते-बिलखते हुए भरत को छोड़कर आप कहाँ चले गये ?
‘भोजन, पान, वस्त्र और आभूषण – इन सबको अधिक संख्या में एकत्र करके आप हम सब लोगों से अपनी रुचि की वस्तुएँ ग्रहण करने को कहते थे। अब कौन हमारे लिये ऐसी व्यवस्था करेगा? आप जैसे धर्मज्ञ महात्मा राजा से रहित होने पर पृथ्वी को फट जाना चाहिये। इस फटने के अवसर पर भी जो यह फट नहीं रही है, यह आश्चर्य की बात है।'
‘पिता स्वर्गवासी हो गये और श्रीराम वन में चले गये। अब मुझमें जीवित रहने की क्या शक्ति है? अब तो मैं अग्नि में ही प्रवेश करूँगा। बड़े भाई और पिता से हीन होकर इक्ष्वाकुवंशी नरेशों द्वारा पालित इस सूनी अयोध्या में मैं प्रवेश नहीं करूँगा; तपोवन को ही चला जाऊँगा।'
उन दोनों का विलाप सुनकर और उस संकट को देखकर समस्त अनुचर-वर्ग के लोग पुन: अत्यन्त शोक से व्याकुल हो उठे। उस समय भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई विषादग्रस्त और थकित होकर टूटे सींगों वाले दो बैलों के समान पृथ्वी पर लोट रहे थे।
तदनन्तर दैवी प्रकृति से युक्त और सर्वज्ञ वशिष्ठजी, जो इन श्रीराम आदि के पिता के पुरोहित थे, भरत को उठाकर उनसे इस प्रकार बोले – प्रभो! तुम्हारे पिता के दाहसंस्कार हुए यह तेरहवाँ दिन है; अब अस्थिसंचय का जो शेष कार्य है, उसके करने में तुम यहाँ विलम्ब क्यों लगा रहे हो? भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मृत्यु - ये तीन द्वन्द्व सभी प्राणियों में समानरूप से उपलब्ध होते हैं। इन्हें रोकना सर्वथा असम्भव है - ऐसी स्थिति में तुम्हें इस तरह शोकाकुल नहीं होना चाहिये।
तत्त्वज्ञ सुमन्त्र ने भी शत्रुघ्न को उठाकर उनके चित्त को शान्त किया तथा समस्त प्राणियों के जन्म और मरण की अनिवार्यता का उपदेश सुनाया। उस समय उठे हुए वे दोनों यशस्वी नरश्रेष्ठ वर्षा और धूप से मलिन हुए दो अलग-अलग इन्द्रध्वजों के समान प्रकाशित हो रहे थे। वे आँसू पोंछते हुए दीनतापूर्ण वाणी में बोलते थे। उन दोनों की आँखें लाल हो गयी थीं तथा मन्त्रीलोग उन दोनों राजकुमारों को दूसरी दूसरी क्रियाएँ शीघ्र करने के लिये प्रेरित कर रहे थे।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-७१(71) समाप्त !

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