भाग-७०(70) राजा दशरथ का अन्त्येष्टि संस्कार

 


इस प्रकार शोक से संतप्त हुए केकयीकुमार भरत से वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि वशिष्ठ ने उत्तम वाणी में कहा - महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने जानेवाला नहीं है। अब समयोचित कर्तव्य पर ध्यान दो। राजा दशरथ के शव को दाहसंस्कार के लिये ले चलने का उत्तम प्रबन्ध करो।  

वशिष्ठजी का वचन सुनकर धर्मज्ञ भरत ने पृथ्वी पर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियों द्वारा पिता के सम्पूर्ण प्रेतकर्म का प्रबन्ध करवाया। राजा दशरथ का शव तेल के कड़ाह से निकालकर भूमि पर रखा गया। अधिक समय तक तेल में पड़े रहने से उनका मुख कुछ पीला हो गया। उसे देखने से ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों। 

तदनन्तर मृत राजा दशरथ को धो-पोंछकर नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित उत्तम शय्या (विमान) पर सुलाकर उनके पुत्र भरत अत्यन्त दुःखी हो विलाप करने लगे - राजन्! मैं परदेश में था और आपके पास पहुँचने भी नहीं पाया था, तब तक ही धर्मज्ञ श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर आपने इस तरह स्वर्ग में जाने का निश्चय कैसे कर लिया? महाराज ! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम से हीन इस दुःखी सेवक को छोड़ आप कहाँ चले जायँगे? 

‘तात! आप स्वर्ग को चल दिये और श्रीराम ने वनका आश्रय लिया - ऐसी दशा में आपके इस नगर में निश्चिन्ततापूर्वक प्रजा के योगक्षेम की व्यवस्था कौन करेगा? राजन्! आपके बिना यह पृथ्वी विधवा के समान हो गयी है, अत: इसकी शोभा नहीं हो रही है। यह पुरी भी मुझे चन्द्रहीन रात्रि के समान श्रीहीन प्रतीत होती है।' 

इस प्रकार दीनचित्त होकर विलाप करते हुए भरत से महामुनि वशिष्ठ ने फिर कहा – महाबाहो! इन महाराज के लिये जो कुछ भी प्रेतकर्म करने हैं, उन्हें बिना विचारे शान्तचित्त होकर करो। 

तब 'बहुत अच्छा' कहकर भरत ने वशिष्ठजी की आज्ञा शिरोधार्य की तथा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य- सबको इस कार्य के लिये जल्दी करने को कहा। 

राजा की अग्निशाला से जो अग्नियाँ बाहर निकाली गयी थीं, उनमें ऋत्विजों और याजकों द्वारा विधिपूर्वक हवन किया गया। तत्पश्चात् महाराज दशरथ के प्राणहीन शरीर को पालकी में बिठाकर परिचारकगण उन्हें श्मशानभूमि को ले चले। उस समय आँसुओं से उनका गला रुँध गया था और मन-ही-मन उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था। 

मार्ग में राजकीय पुरुष राजा के शव के आगे-आगे सोने, चाँदी तथा भाँति-भाँति के वस्त्र लुटाते चलते थे। श्मशानभूमि में पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसी ने चन्दन लाकर रखा तो किसी ने अगर, कोई-कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारु की लकड़ियाँ ला- लाकर चिता में डालने लगे। कुछ लोगों ने तरह-तरह के सुगन्धित पदार्थ लाकर छोड़े। इसके बाद ऋत्विजों ने राजा के शव को चिता पर रखा।

उस समय अग्नि में आहुति देकर उनके ऋत्विजों ने वेदोक्त मन्त्रों का जप किया। सामगान करने वाले विद्वान् शास्त्रीय पद्धति के अनुसार साम-श्रुतियों का गायन करने लगे। (इसके बाद चिता में आग लगायी गयी) तदनन्तर राजा दशरथ की कौशल्या आदि रानियाँ बूढ़े रक्षकों से घिरी हुई यथायोग्य शिबिकाओं तथा रथों पर आरूढ़ होकर नगर से निकलीं तथा शोक से संतप्त हो श्मशानभूमि में आकर अश्वमेधान्त यज्ञों के अनुष्ठाता राजा दशरथ के शव की परिक्रमा करने लगीं। साथ ही ऋत्विजों ने भी उस शव की परिक्रमा की। 

उस समय वहाँ करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों शोकार्त रानियों का आर्तनाद कुररियों के चीत्कार के समान सुनायी देता था। दाहकर्म के पश्चात् विवश होकर रोती हुई वे राजरानियाँ बारंबार विलाप करके सवारियों से ही सरयू के तट पर जाकर उतरीं। भरत के साथ रानियों, मन्त्रियों और पुरोहितों ने भी राजा के लिये जलाञ्जलि दी, फिर सब-के-सब नेत्रों से आँसू बहाते हुए नगर में आये और दस दिनों तक भूमि पर शयन करते हुए उन्होंने बड़े दुःख से अपना समय व्यतीत किया।

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-७०(70) समाप्त !

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