भाग-६(6) विराध और श्रीराम की बातचीत, श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा विराध पर प्रहार तथा श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा विराध का वध

 


तदनन्तर विराध ने उस वन को गुँजाते हुए कहा – अरे! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ। तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे? 

तब महातेजस्वी श्रीराम ने अपना परिचय पूछते हुए प्रज्वलित मुख वाले उस राक्षस से इस प्रकार कहा - तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकु का कुल ही मेरा कुल है। हम दोनों भाई सदाचार का पालन करने वाले क्षत्रिय हैं और कारणवश इस समय वन में निवास करते हैं। अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं। तू कौन है, जो दण्डकवन में स्वेच्छा से विचर रहा है? 

यह सुनकर विराध ने सत्यपराक्रमी श्रीराम से कहा - रघुवंशी नरेश ! मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना परिचय देता हूँ। तुम मेरे विषय में सुनो। मैं ‘जव’' नामक राक्षस का पुत्र हूँ, मेरी माता का नाम 'शतह्रदा' है। भूमण्डल के समस्त राक्षस मुझे विराध के नाम से पुकारते हैं। मैंने तपस्या के द्वारा ब्रह्माजी को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त किया है कि किसी भी शस्त्र से मेरा वध न हो। मैं संसार में अच्छेद्य और अभेद्य होकर रहूँ - कोई भी मेरे शरीर को छिन्न-भिन्न नहीं कर सके। अब तुम दोनों इस युवती स्त्री को यहीं छोड़कर इसे पाने की इच्छा न रखते हुए जैसे आये हो उसी प्रकार तुरंत यहाँ से भाग जाओ। मैं तुम दोनों के प्राण नहीं लूँगा। 

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे पापपूर्ण विचार और विकट आकार वाले उस पापी राक्षस विराध से इस प्रकार बोले -  नीच! तुझे धिक्कार है। तेरा अभिप्राय बड़ा ही खोटा है। निश्चय ही तू अपनी मृत्यु ढूँढ़ रहा है और वह तुझे युद्ध में मिलेगी। ठहर, अब तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा। 

यह कहकर भगवान् श्रीराम ने अपने धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और तुरंत ही तीखे बाणों का अनुसंधान करके उस राक्षस को बींधना आरम्भ किया। उन्होंने प्रत्यञ्चायुक्त धनुष के द्वारा विराध के ऊपर लगातार सात बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायु के समान महान् वेगशाली थे और सोने के पंखों से सुशोभित हो रहे थे। प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और मोर पंख लगे हुए वे बाण विराध के शरीर को छेदकर रक्तरञ्जित हो पृथ्वी पर गिर पड़े। 

घायल हो जाने पर उस राक्षस ने विदेहकुमारी सीता को अलग रख दिया और स्वयं हाथ में शूल लिये अत्यन्त कुपित होकर श्रीराम तथा लक्ष्मण पर तत्काल टूट पड़ा। वह बड़े जोर से गर्जना करके इन्द्रध्वज के समान शूल लेकर उस समय मुँह बाये हुए काल के समान शोभा पा रहा था। तब कालान्तक और यमराज के समान उस भयंकर राक्षस विराध के ऊपर उन दोनों भाइयों ने प्रज्वलित बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। 

यह देख वह महाभयंकर राक्षस अट्टहास करके खड़ा हो गया और जँभाई के साथ अँगड़ाई लेने लगा। उसके वैसा करते ही शीघ्रगामी बाण उसके शरीर से निकलकर पृथ्वी पर गिर पड़े। वरदान के सम्बन्ध से उस राक्षस विराध ने प्राणों को रोक लिया और शूल उठाकर उन दोनों रघुवंशी वीरों पर आक्रमण किया। उसका वह शूल आकाश में वज्र और अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा; परंतु शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने दो बाण मारकर उसे काट डाला। 

श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से कटा हुआ विराध का वह शूल वज्र से छिन्न-भिन्न हुए मेरु के शिलाखण्ड की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर तो वे दोनों भाई शीघ्र ही काले सर्पों के समान दो तलवारें लेकर तुरंत उस पर टूट पड़े और तत्काल बलपूर्वक प्रहार करने लगे। उनके आघात से अत्यन्त घायल हुए उस भयंकर राक्षस ने अपनी दोनों भुजाओं से उन अकम्प्य पुरुषसिंह वीरों को पकड़कर अन्यत्र जाने की इच्छा की। 

उसके अभिप्राय को जानकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - सुमित्रानन्दन ! यह राक्षस अपनी इच्छा के अनुसार हम लोगों को इस मार्ग से ढोकर ले चले। यह जैसा चाहता है, उसी तरह हमारा वाहन बनकर हमें ले चले (इसमें बाधा डालने की आवश्यकता नहीं है)। जिस मार्ग से यह निशाचर चल रहा है, यही हमलोगों के लिये आगे जाने का मार्ग है। 

अत्यन्त बल से उद्दण्ड बने हुए निशाचर विराध ने अपने बल पराक्रम से उन दोनों भाइयों को बालकों की तरह उठाकर अपने दोनों कंधों पर बिठा लिया। उन दोनों रघुवंशी वीरों को कंधे पर चढ़ा लेने के बाद राक्षस विराध भयंकर गर्जना करता हुआ वन की ओर चल दिया। 

तदनन्तर उसने एक ऐसे वन में प्रवेश किया, जो महान् मेघों की घटा के समान घना और नीला था। नाना प्रकार के बड़े-बड़े वृक्ष वहाँ भरे हुए थे। भाँति-भाँति के पक्षियों के समुदाय उसे विचित्र शोभा से सम्पन्न बना रहे थे तथा बहुत-से गीदड़ और हिंसक पशु उसमें सब ओर फैले हुए थे। 

रघुकुल के श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण को राक्षस लिये जा रहा है - यह देखकर सीता अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगीं। 

‘हाय! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार विचार वाले दशरथनन्दन आर्य (श्रीराम) और लक्ष्मण को यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है। राक्षसशिरोमणे! तुम्हें नमस्कार है। इस वन में रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरों को छोड़ दो।' 

विदेह्नन्दिनी सीता की यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षस का वध करने में शीघ्रता करने लगे। सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उस राक्षस की बायीं और श्रीराम ने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेग से तोड़ डाली। भुजाओं के टूट जाने पर वह मेघ के समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूर्च्छित होकर वज्र के द्वारा टूटे हुए पर्वतशिखर की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब श्रीराम और लक्ष्मण विराध को भुजाओं, मुक्कों और लातों से मारने लगे तथा उसे उठा-उठाकर पटकने और पृथ्वी पर रगड़ने लगे। बहुसंख्यक बाणों से घायल और तलवारों से क्षतविक्षत होने पर तथा पृथ्वी पर बार-बार रगड़ा जाने पर भी वह राक्षस मरा नहीं। 

अवध्य तथा पर्वत के समान अचल विराध को बारंबार देखकर भय के अवसरों पर अभय देनेवाले श्रीमान् राम ने लक्ष्मण से यह बात कही - पुरुषसिंह! यह राक्षस तपस्या से (वर पाकर) अवध्य हो गया है। इसे शस्त्र के द्वारा युद्ध में नहीं जीता जा सकता। इसलिये हम लोग निशाचर विराध को पराजित करने के लिये अब गड्ढा खोदकर गाड़ दें। लक्ष्मण! हाथी के समान भयंकर तथा रौद्र तेज वाले इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्ढा खोदो। 

इस प्रकार लक्ष्मण को गड्ढा खोदने की आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैर से विराध का गला दबाकर खड़े हो गये। 

श्रीरामचन्द्रजी की कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराध ने पुरुषप्रवर श्रीराम से यह विनययुक्त बात कही - पुरुषसिंह! नरश्रेष्ठ! आपका बल देवराज इन्द्र के समान है। मैं आपके हाथ से मारा गया। मोहवश पहले मैं आपको पहचान न सका। तात! आपके द्वारा माता कौशल्या उत्तम संतान वाली हुई हैं। मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं। यह महाभागा विदेहनन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महायशस्वी लक्ष्मण हैं। 

‘मुझे शाप के कारण इस भयंकर राक्षस शरीर में आना पड़ा था। मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ। कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था। जब मैंने उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा की, तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले - ''गन्धर्व ! जब दशरथनन्दन श्रीराम युद्ध में तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूप को प्राप्त होकर स्वर्गलोक को जाओगे।" 

'मैं रम्भा नामक अप्सरा में आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समय से उनकी सेवा में उपस्थित न हो सका। इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण (कुबेर) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटने की अवधि बतायी थी। शत्रुओं को संताप देने वाले रघुवीर ! आज आपकी कृपा से मुझे उस भयंकर शाप से छुटकारा मिल गया। आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोक को जाऊँगा।' 

‘तात! यहाँ से डेढ़ योजन की दूरी पर सूर्य के समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं। उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याण की बात बतायेंगे। श्रीराम ! आप मेरे शरीर को गड्डे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइये । मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना (कब्र खोदकर उसमें दफना देना) यह उनके लिये सनातन (परम्पराप्राप्त) धर्म है। जो राक्षस गड्ढे में गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।' 

श्रीराम से ऐसा कहकर बाणों से पीड़ित हुआ महाबली विराध (जब उसका शरीर गड्ढे में डाला गया, तब ) उस शरीर को छोड़कर स्वर्गलोक को चला गया। वह किस तरह गड्ढे में डाला गया? – यह बात अब बतायी जाती है)। 

उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मण को आज्ञा दी - लक्ष्मण ! भयंकर कर्म करने वाले तथा हाथी के समान भयानक इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्ढा खोदो। इस प्रकार लक्ष्मण को गड्ढा खोदने का आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैर से विराध का गला दबाकर खड़े हो गये। तब लक्ष्मण ने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराध के पास ही एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर तैयार किया। 

तब श्रीराम ने उसके गले को छोड़ दिया और लक्ष्मण ने खूंटे-जैसे कान वाले उस विराध को उठाकर उस गड्ढे में डाल दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में जोर-जोर से गर्जना कर रहा था। युद्ध में स्थिर रहकर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ने रणभूमि में क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाले उस भयंकर राक्षस विराध को बलपूर्वक उठाकर गड्ढे में फेंक दिया। उस समय वह जोर- जोर से चिल्ला रहा था। उसे गड्ढे में डालकर वे दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए। 

महान् असुर विराध का तीखे शस्त्र से वध होने वाला नहीं है, यह देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण ने उस समय गड्ढा खोदकर उस गड्ढे में उसे डाल दिया और उसे मिट्टी से पाटकर उस राक्षस का वध कर डाला। वास्तव में श्रीराम के हाथ से ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था। उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्यु की प्राप्ति के उद्देश्य से स्वयं वनचारी विराध ने ही श्रीराम को यह बता दिया था कि शस्त्र द्वारा मेरा वध नहीं हो सकता। 

उसकी कही हुई उसी बात को सुनकर श्रीराम ने उसे गड्ढे में गाड़ देने का विचार किया था। जब वह गड्ढे में डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षस ने अपनी चिल्लाहट से सारे वनप्रान्त को गुँजा दिया। राक्षस विराध को पृथ्वी के अंदर गड्ढे में गिराकर श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उसे ऊपर से बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया। फिर वे निर्भय हो उस महान् वन में सानन्द विचरने लगे। इस प्रकार उस राक्षस का वध करके मिथिलेश कुमारी सीता को साथ ले सोने के विचित्र धनुषों से सुशोभित हो दोनों भाई आकाश में स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्य की भाँति उस महान् वन में आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे।  

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-६(6) समाप्त !

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