भाग-६९(69) कौशल्या के सामने भरत का शपथ खाना



बहुत देर के बाद होश में आने पर जब पराक्रमी भरत उठे, तब आँसू भरे नेत्रों से दीन बनी बैठी हुई माता की ओर देखकर मन्त्रियों के बीच में उसकी निन्दा करते हुए बोले - मन्त्रिवरो ! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने कभी माता से इसके लिये बातचीत ही की है। महाराज ने जिस अभिषेक का निश्चय किया था, उसका भी मुझे पता नहीं था; क्योंकि उस समय मैं शत्रुघ्न के साथ दूर देश में था। महात्मा श्रीराम के वनवास और भाभी सीता तथा लक्ष्मण के निर्वासन का भी मुझे ज्ञान नहीं है कि वह कब और कैसे हुआ?

महात्मा भरत जब इस प्रकार अपनी माता को कोस रहे थे, उस समय उनकी आवाज को पहचानकर कौशल्या ने सुमित्रा से इस प्रकार कहा - क्रूर कर्म करने वाली कैकेयी के पुत्र भरत आ गये हैं। वे बड़े दूरदर्शी हैं, अत: मैं उन्हें देखना चाहती हूँ।  

सुमित्रा से ऐसा कहकर उदास मुखवाली, दुर्बल और अचेत - सी हुई कौशल्या जहाँ भरत थे, उस स्थान पर जाने के लिये काँपती हुई चलीं। उसी समय उधर से राजकुमार भरत भी शत्रुघ्न को साथ लिये उसी मार्ग से चले आ रहे थे, जिससे कौशल्या के भवन में आना-जाना होता था। तदनन्तर शत्रुघ्न और भरत ने दूर से ही देखा कि माता कौशल्या दुःख से व्याकुल और अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी हैं। यह देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे दौड़कर उनकी गोदी से लग गये तथा फूट-फूटकर रोने लगे। 

आर्या मनस्विनी कौशल्या भी दु:ख से रो पड़ीं और उन्हें छाती से लगाकर अत्यन्त दुःखित हो भरत से इस प्रकार बोलीं - बेटा! तुम राज्य चाहते थे न? सो यह निष्कण्टक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया; किंतु खेद यही है कि कैकेयी ने जल्दी के कारण बड़े क्रूर कर्म के द्वारा इसे पाया है। क्रूरतापूर्ण दृष्टि रखने वाली कैकेयी न जाने इसमें कौन-सा लाभ देखती थी कि उसने मेरे बेटे को चीर-वस्त्र पहनाकर वन में भेज दिया और उसे वनवासी बना दिया। 

‘अब कैकेयी को चाहिये कि मुझे भी शीघ्र ही उसी स्थान पर भेज दे, जहाँ इस समय सुवर्णमयी नाभि से सुशोभित मेरे महायशस्वी पुत्र श्रीराम हैं अथवा सुमित्रा को साथ लेकर और अग्निहोत्र को आगे करके मैं स्वयं ही सुखपूर्वक उस स्थान को प्रस्थान करूँगी, जहाँ श्रीराम निवास करते हैं अथवा तुम स्वयं ही अपनी इच्छा के अनुसार अब मुझे वहीं पहुँचा दो, जहाँ मेरे पुत्र पुरुषसिंह श्रीराम तप करते हैं। यह धन-धान्य से सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े एवं रथों से भरा-पूरा विस्तृत राज्य कैकेयी ने (श्रीराम से छीनकर) तुम्हें दिलाया है। 

इस तरह की बहुत-सी कठोर बातें कहकर जब कौशल्या ने निरपराध भरत की भर्त्सना की, तब उनको बड़ी पीड़ा हुई; मानो किसी ने घाव में सूई चुभो दी हो। वे कौशल्या के चरणों में गिर पड़े, उस समय उनके चित्त में बड़ी घबराहट थी। वे बारम्बार विलाप करके अचेत हो गये। थोड़ी देर बाद उन्हें फिर चेत हुआ। 

तब भरत अनेक प्रकार के शोकों से घिरी हुई और पूर्वोक्त रूप से विलाप करती हुई माता कौशल्या से हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले – बड़ी माँ ! यहाँ जो कुछ हुआ है, इसकी मुझे बिलकुल जानकारी नहीं थी । मैं सर्वथा निरपराध हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दोष दे रही हैं? आप तो जानती हैं कि श्रीरघुनाथजी में मेरा कितना प्रगाढ़ प्रेम है। जिसकी अनुमति से सत्पुरुषों में श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, आर्य श्रीरामजी वन में गये हों, उस पापी की बुद्धि कभी गुरु से सीखे हुए शास्त्रों में बताये गये मार्ग का अनुसरण करनेवाली न हो। 

'जिसकी सलाह से बड़े भाई श्रीराम को वन में जाना पड़ा हो, वह अत्यन्त पापियों-हीन जातियों का सेवक हो । सूर्य की ओर मुँह करके मल-मूत्र का त्याग करे और सोयी हुई गौओं को लात से मारे (अर्थात् वह इन पापकर्मों के दुष्परिणामका भागी हो)। जिसकी सम्मति से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया हो, उसको वही पाप लगे, जो सेवक से भारी काम कराकर उसे समुचित वेतन न देने वाले स्वामी को लगता है।' 

‘जिसके कहने से आर्य श्रीराम को वन में भेजा गया हो, उसको वही पाप लगे, जो समस्त प्राणियों का पुत्र की भाँति पालन करने वाले राजा से द्रोह करने वाले लोगों को लगता है। जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह उसी अधर्म का भागी हो, जो प्रजा से उसकी आय का छठा भाग लेकर भी प्रजावर्ग की रक्षा न करने वाले राजा को प्राप्त होता है।' 

‘जिसकी सलाह से भैया श्रीराम को वन में जाना पड़ा हो, उसे वही पाप लगे, जो यज्ञ में कष्ट सहने वाले ऋत्विजों को दक्षिणा देने की प्रतिज्ञा करके पीछे इनकार कर देनेवाले लोगों को लगता है। हाथी, घोड़े और रथों से भरे एवं अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से व्याप्त संग्राम में सत्पुरुषों के धर्म का पालन न करने वाले योद्धाओं को जो पाप लगता है, वही उस मनुष्य को भी प्राप्त हो, जिसकी सम्मति से आर्य श्रीरामजी को वन में भेजा गया हो।' 

‘जिसकी सलाह से आर्य श्रीराम को वन में प्रस्थान करना पड़ा है, वह दुष्टात्मा बुद्धिमान् गुरु के द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त हुआ शास्त्र के सूक्ष्म विषय का उपदेश भुला दे। जिसकी सलाह से बड़े भैया श्रीराम को वन में भेजा गया हो, वह चन्द्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी तथा विशाल भुजाओं और कंधों से सुशोभित श्रीरामचन्द्रजी को राज्यसिंहासन पर विराजमान न देख सके वह राजा श्रीराम के दर्शन से वञ्चित रह जाय।' 

‘जिसकी सलाह से आर्य श्रीरामचन्द्रजी वन में गये हों, वह निर्दय मनुष्य खीर, खिचड़ी और बकरी के दूध को देवताओं, पितरों एवं भगवान को निवेदन किये बिना व्यर्थ करके खाये। जिसकी सम्मति से श्रीरामचन्द्रजी को वन में जाना पड़ा हो, वह पापी मनुष्य गौओं के शरीर का पैर से स्पर्श, गुरुजनों की निन्दा तथा मित्र के प्रति अत्यन्त द्रोह करे।' 

‘जिसके कहने से बड़े भैया श्रीराम वन में गये हों, वह दुष्टात्मा गुप्त रखने के विश्वास पर एकान्त में कहे हुए किसी के दोष को दूसरों पर प्रकट कर दे (अर्थात् उसे विश्वासघात करने का पाप लगे)। जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह मनुष्य उपकार न करनेवाला, कृतघ्न, सत्पुरुषों द्वारा परित्यक्त, निर्लज्ज और जगत में सबके द्वेष का पात्र हो।' 

‘जिसकी सलाह से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह अपने घर में पुत्रों, दासों और भृत्यों से घिरा रहकर भी अकेले ही मिष्टान्न भोजन करने के पाप का भागी हो। जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम का वनगमन हुआ हो, वह अपने अनुरूप पत्नी को न पाकर अग्निहोत्र आदि धार्मिक कर्मों का अनुष्ठान किये बिना संतानहीन अवस्था में ही मर जाय। जिसकी सम्मति से मेरे बड़े भाई श्रीराम वन में गये हों, वह सदा दुःखी रहकर अपनी धर्मपत्नी से होने वाली संतान का मुँह न देखे तथा सम्पूर्ण आयु का उपभोग किये बिना ही मर जाय। राजा, स्त्री, बालक और वृद्धों का वध करने तथा भृत्यों को त्याग देने में जो पाप होता है, वही पाप उसे भी लगे।' 

‘जिसकी सम्मति से श्रीराम का वनगमन हुआ हो, वह सदैव लाह, मधु, मांस, लोहा और विष आदि निषिद्ध वस्तुओं को बेचकर कमाये हुए धन से अपने भरण-पोषण के योग्य कुटुम्बीजनों का पालन करे। जिसकी राय से श्रीराम वन में जाने को विवश हुए हों, वह शत्रुपक्ष को भय देनेवाले युद्ध के प्राप्त होने पर उसमें पीठ दिखाकर भागता हुआ मारा जाय। जिसकी सम्मति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्र से अपने शरीर को ढककर हाथ में खप्पर ले भीख माँगता हुआ उन्मत्त की भाँति पृथ्वी पर घूमता फिरे।  

'जिसकी सलाह से श्रीरामचन्द्रजी को वन में जाना पड़ा हो, स्त्रीसमागम और द्यूतक्रीड़ा में आसक्त रहे। वह काम-क्रोध के वशीभूत होकर सदा ही मद्यपान का ही सेवन करे। जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, उसका मन कभी धर्म में न लगे, वह अधर्म का ही सेवन करे और अपात्र को धन दान करे।' 

'जिसकी सलाह से आर्य श्रीराम का वन-गमन हुआ हो, उसके द्वारा सहस्रों की संख्या में संचित किये गये नाना प्रकार के धन-वैभवों को लुटेरे लूट ले जायें। जिसके कहने से भैया श्रीराम को वन में भेजा गया हो, उसे वही पाप लगे, जो दोनों संध्याओं के समय सोये हुए पुरुष को प्राप्त होता है। आग लगाने वाले मनुष्य को जो पाप लगता है, गुरुपत्नीगामी को जिस पाप की प्राप्ति होती है तथा मित्रद्रोह करने से जो पाप प्राप्त होता है, वही पाप उसे भी लगे।' 

'जिसकी सम्मति से आर्य श्रीराम को वन में जाना पड़ा है, वह देवताओं, पितरों और माता-पिता की सेवा कभी न करे (अर्थात् उनकी सेवा के पुण्य से वञ्चित रह जाय)। जिसकी अनुमति से विवश होकर भैया श्रीराम ने वन में पदार्पण किया है, वह पापी आज ही सत्पुरुषों के लोक से, सत्पुरुषों की कीर्ति से तथा सत्पुरुषों द्वारा सेवित कर्म से शीघ्र भ्रष्ट हो जाय।' 

‘जिसकी सम्मति से बड़ी-बड़ी बाँह और विशाल वक्षवाले आर्य श्रीराम को वन में जाना पड़ा है, वह माता की सेवा छोड़कर अनर्थ के पथ में स्थित रहे। जिसकी सलाह से श्रीराम का वनगमन हुआ हो, वह दरिद्र हो, उसके यहाँ भरण-पोषण पाने के योग्य पुत्र आदि की संख्या बहुत अधिक हो तथा वह ज्वर रोग से पीड़ित होकर सदा क्लेश भोगता रहे।' 

'जिसकी अनुमति पाकर आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह आशा लगाये ऊपर की ओर आँख उठाकर दाता के मुँह की ओर देखने वाले दीन याचकों की आशा को निष्फल कर दे। जिसके कहने से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया हो, वह पापात्मा पुरुष चुगला, अपवित्र तथा राजा से भयभीत रहकर सदा छल-कपट में ही रचा-पचा रहे।' 

‘जिसके परामर्श से आर्य का वनमगन हुआ हो, वह दुष्टात्मा ऋतु स्नानकाल प्राप्त होने के कारण अपने पास आयी हुई सती-साध्वी ऋतुस्नाता पत्नी को ठुकरा दे (उसकी इच्छा न पूर्ण करने के पाप का भागी हो)। जिसकी सलाह से मेरे बड़े भाई को वन में जाना पड़ा हो, उसको वही पाप लगे, जो (अन्न आदि का दान न करने अथवा स्त्री से द्वेष रखने के कारण) नष्ट हुई संतान वाले ब्राह्मण को प्राप्त होता है।' 

‘जिसकी राय से आर्य ने वन में पदार्पण किया हो, वह मलिन इन्द्रियवाला पुरुष ब्राह्मण के लिये की जाती हुई पूजा में विघ्न डाल दे और छोटे बछड़े वाली (दस दिन के भीतरकी ब्यायी हुई) गाय का दूध दुहे। जिसने आर्य श्रीराम के वनमगन की अनुमति दी हो, वह मूल धर्मपत्नी को छोड़कर परस्त्री का सेवन करे तथा धर्मविषयक अनुराग को त्याग दे।' 

‘पानी को गन्दा करने वाले तथा दूसरों को जहर देने वाले मनुष्य को जो पाप लगता है, वह सारा पाप अकेला वही प्राप्त करे, जिसकी अनुमति से विवश होकर आर्य श्रीराम को वन में जाना पड़ा है। जिसकी सम्मति से आर्य का वनगमन हुआ हो, उसे वही पाप प्राप्त हो, जो पानी होते हुए भी प्यासे को उससे चित कर देने वाले मनुष्य को लगता है।' 

‘जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह उस पाप का भागी हो, जो परस्पर झगड़ते हुए मनुष्यों में से किसी एक के प्रति पक्षपात रखकर मार्ग में खड़ा हो उनका झगड़ा देखने वाले कलहप्रिय मनुष्य को प्राप्त होता है।'

दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुंदर वाणी बोले - हे बड़ी माँ ! मैं सत्य कहता हूँ। जो पाप माता-पिता और पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने से होते हैं, जो पाप स्त्री और बालक की हत्या करने से होते हैं और जो मित्र और राजा को जहर देने से होते हैं, कर्म, वचन और मन से होने वाले जितने पातक एवं उपपातक (बड़े-छोटे पाप) हैं, जिनको ज्ञानी लोग कहते हैं, हे विधाता! यदि इस काम में मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगें। 

'जो लोग श्री हरि और श्री शंकरजी के चरणों को छोड़कर भयानक भूत-प्रेतों को भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे। जो लोग वेदों को बेचते हैं, धर्म को दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरों के पापों को कह देते हैं, जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं तथा जो वेदों की निंदा करने वाले और विश्वभर के विरोधी हैं, जो लोभी, लम्पट और लालचियों का आचरण करने वाले हैं, जो पराए धन और पराई स्त्री की ताक में रहते हैं, हे जननी! यदि इस काम में मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गति को पाऊँ।'

'जिनका सत्संग में प्रेम नहीं है, जो अभागे परमार्थ के मार्ग से विमुख हैं, जो मनुष्य शरीर पाकर श्री हरि का भजन नहीं करते, जिनको हरि-हर (भगवान विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता, जो वेद मार्ग को छोड़कर वाम (वेद प्रतिकूल) मार्ग पर चलते हैं, जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत को छलते हैं, हे माता! यदि मैं इस भेद को जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगों की गति दें।'  

इस प्रकार पति और पुत्र से बिछुड़ी हुई कौशल्या को शपथ के द्वारा आश्वासन देते हुए ही राजकुमार भरत दु:ख से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। 

उस समय दुष्कर शपथों द्वारा अपनी सफाई देते हुए शोकसंतप्त एवं अचेत भरत से कौशल्या ने इस प्रकार कहा - पुत्र! तुम 'अनेकानेक शपथ खाकर जो मेरे प्राणों को पीड़ा दे रहे हो, इससे मेरा यह दुःख और भी बढ़ता जा रहा है। वत्स! सौभाग्य की बात है कि शुभ लक्षणों से सम्पन्न तुम्हारा चित्त धर्म से विचलित नहीं हुआ है। तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, इसलिये तुम्हें सत्पुरुषों के लोक प्राप्त होंगे।  

ऐसा कहकर कौशल्या ने भ्रातृभक्त महाबाहु भरत को गोद में खींच लिया और अत्यन्त दु:खी हो उन्हें गले से लगाकर वे फूट-फूटकर रोने लगीं। महात्मा भरत भी दु:ख से आर्त होकर विलाप कर रहे थे। उनका मन मोह और शोक के वेग से व्याकुल हो गया था। पृथ्वी पर पड़े हुए भरत की बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो गयी थी। वे अचेत-से होकर विलाप करते और बारंबार लंबी साँस खींचते थे। इस तरह शोक में ही उनकी वह रात बीत गयी। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-६९(69) समाप्त !


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