पिता के परलोकवास और दोनों भाइयों के वनवास का समाचार सुनकर भरत दु:ख से संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले - हाय! तूने मुझे मार डाला। मैं पिता से सदा के लिये बिछुड़ गया और पितृ तुल्य बड़े भाई से भी विलग हो गया। मुझे सूर्यवंश (सा वंश), दशरथजी (सरीखे) पिता और राम-लक्ष्मण से भाई मिले। पर हे जननी! मुझे जन्म देने वाली माता तू हुई! (क्या किया जाए!) विधाता से कुछ भी वश नहीं चलता। अब तो मैं शोक में डूब रहा हूँ, मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है ? तूने राजा को परलोकवासी तथा श्रीराम को तपस्वी बनाकर मुझे दुःख - पर दुःख दिया है, घाव पर नमक - सा छिड़क दिया है।
'अरी कुमति! जब तूने हृदय में यह बुरा विचार (निश्चय) ठाना, उसी समय तेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े (क्यों) न हो गए? वरदान माँगते समय तेरे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई? तेरी जीभ गल नहीं गई? तेरे मुँह में कीड़े नहीं पड़ गए? राजा ने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? (जान पड़ता है,) विधाता ने मरने के समय उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियों के हृदय की गति (चाल) विधाता भी नहीं जान सके। वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणों की खान है।'
'तू इस कुल का विनाश करने के लिये कालरात्रि बनकर आयी थी। मेरे पिता ने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गार को हृदय से लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझ में नहीं आयी थी। पाप पर ही दृष्टि रखनेवाली ! कुलकलङ्किनी ! तूने मेरे महाराज को काल के गाल में डाल दिया और मोहवश इस कुल का सुख सदा के लिये छीन लिया।'
'तुझे पाकर मेरे सत्यप्रतिज्ञ महायशस्वी पिता महाराज दशरथ इन दिनों दुःसह दु:ख से संतप्त होकर प्राण त्यागने को विवश हुए हैं। बता, तूने मेरे धर्मवत्सल पिता महाराज दशरथ का विनाश क्यों किया? मेरे बड़े भाई श्रीराम को क्यों घर से निकाला और वे भी क्यों (तेरे ही कहने से) वन को चले गये ? कौशल्या और सुमित्रा भी मेरी माता कहलाने वाली तुझ कैकेयी को पाकर पुत्रशोक से पीड़ित हो गयीं। अब उनका जीवित रहना अत्यन्त कठिन है।'
'बड़े भैया श्रीराम धर्मात्मा हैं; गुरुजनों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये – इसे वे अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उनका अपनी माता के प्रति जैसा बर्ताव था, वैसा ही उत्तम व्यवहार वे तेरे साथ भी करते थे। मेरी बड़ी माता कौशल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं। वे धर्म का ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिन का--सा बर्ताव करती ‘पापिनि! उनके महात्मा पुत्र को चीर और वल्कल पहनाकर तूने वन में रहने के लिये भेज दिया। फिर भी तुझे शोक क्यों नहीं हो रहा है।'
'श्रीराम किसी की बुराई नहीं देखते। वे शूरवीर, पवित्रात्मा और यशस्वी हैं। उन्हें चीर पहनाकर वनवास दे देने में तू कौन-सा लाभ देख रही है ? तू लोभिन है। मैं समझता हूँ, इसीलिये तुझे यह पता नहीं है कि मेरा श्रीरामचन्द्रजी के प्रति कैसा भाव है, तभी तूने राज्य के लिये यह महान् अनर्थ कर डाला है। मैं पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण को न देखकर किस शक्ति के प्रभाव से इस राज्य की रक्षा कर सकता हूँ? (मेरे बल तो मेरे भाई ही हैं।)'
'मेरे धर्मात्मा पिता महाराज दशरथ भी सदा उन महातेजस्वी बलवान् श्रीराम का ही आश्रय लेते थे (उन्हीं से अपने लोक-परलोक की सिद्धि की आशा रखते थे), ठीक उसी तरह जैसे मेरुपर्वत अपनी रक्षा के लिये अपने ऊपर उत्पन्न हुए गहन वन का ही आश्रय लेता है (यदि वह दुर्गम वन से घिरा हुआ न हो तो दूसरे लोग निश्चय ही उस पर आक्रमण कर सकते हैं)। यह राज्य का भार, जिसे किसी महाधुरंधर ने धारण किया था, मैं कैसे, किस बल से धारण कर सकता हूँ? जैसे कोई छोटा-सा बछड़ा बड़े-बड़े बैलों द्वारा ढोये जाने योग्य महान् भार को नहीं खींच सकता, उसी प्रकार यह राज्य का महान् भार मेरे लिये असह्य है।'
‘अथवा नाना प्रकार के उपायों तथा बुद्धिबल से मुझमें राज्य के भरण-पोषण की शक्ति हो तो भी केवल अपने बेटे के लिये राज्य चाहने वाली तुझ कैकेयी की मन:कामना पूरी नहीं होने दूँगा। यदि श्रीराम तुझे सदा अपनी माता के समान नहीं देखते होते तो तेरी जैसी पापपूर्ण विचार वाली माता का त्याग करने में मुझे तनिक भी हिचक नहीं होती।'
'उत्तम चरित्र से गिरी हुई पापिनी! मेरे पूर्वजों ने जिसकी सदा निन्दा की है, वह पाप पर ही दृष्टि रखने वाली बुद्धि तुझमें कैसे उत्पन्न हो गयी ? इस कुल में जो सबसे बड़ा होता है, उसी का राज्याभिषेक होता है; दूसरे भाई सावधानी के साथ बड़े की आज्ञा अधीन रहकर कार्य करते हैं। क्रूर स्वभाव वाली कैकेयि! मेरी समझ में तू राजधर्म पर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिलकुल नहीं जानती। राजाओं के बर्ताव का जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है।'
‘राजकुमारों में जो ज्येष्ठ होता है, सदा उसी का राजा के पद पर अभिषेक किया जाता है। सभी राजाओं के यहाँ समान रूप से इस नियम का पालन होता है। इक्ष्वाकुवंशी नरेशों के कुल में इसका विशेष आदर है। जिनकी एकमात्र धर्म से ही रक्षा होती आयी है तथा जो कुलोचित सदाचार के पालन से ही सुशोभित हुए हैं, उनका यह चरित्रविषयक अभियान आज तुझे पाकर – तेरे सम्बन्ध के कारण दूर हो गया।'
‘महाभागे! तेरा जन्म भी तो महाराज केकय के कुल में हुआ है, फिर तेरे हृदय में यह निन्दित बुद्धिमोह कैसे उत्पन्न हो गया? अरी! तेरा विचार बड़ा ही पापपूर्ण है। मैं तेरी इच्छा कदापि नहीं पूर्ण करूँगा। तूने मेरे लिये उस विपत्ति की नींव डाल दी है, जो मेरे प्राण तक ले सकती है। यह ले, मैं अभी तेरा अप्रिय करने के लिये तुल गया हूँ। मैं वन से निष्पाप भ्राता श्रीराम को, जो स्वजनों के प्रिय हैं, लौटा लाऊँगा। श्रीराम को लौटा लाकर उद्दीप्त तेज वाले उन्हीं महापुरुष का दास बनकर स्वस्थचित्त से जीवन व्यतीत करूँगा।
ऐसा कहकर महात्मा भरत शोक से पीड़ित हो पुनः जली-कटी बातों से कैकेयी को व्यथित करते हुए उसे जोर-जोर से फटकारने लगे, मानो मन्दराचल की गुहा में बैठा हुआ सिंह गरज रहा हो।

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