भाग-६६(66) भरत का कैकेयी के भवन में जाकर उसे प्रणाम करना, उसके द्वारा पिता के परलोकवास का समाचार पा दु:खी हो विलाप करना तथा श्रीराम के विषय में पूछने पर कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तान्त से अवगत होना

 


तदनन्तर पिता के घर में पिता को न देखकर भरत माता का दर्शन करने के लिये अपनी माता के महल में गये। अपने परदेश गये हुए पुत्र को घर आया देख उस समय कैकेयी हर्ष से भर गयी और अपने सुवर्णमय आसन को छोड़ उछलकर खड़ी हो गयी। धर्मात्मा भरत ने अपने उस घर में प्रवेश करके देखा कि सारा घर श्रीहीन हो रहा है, फिर उन्होंने माता के शुभ चरणों का स्पर्श किया। 

अपने यशस्वी पुत्र भरत को छाती से लगाकर कैकेयी ने उनका मस्तक सूँघा और उन्हें गोद में बिठाकर पूछना आरम्भ किया - पुत्र! तुम्हें अपने नाना के घर से चले आज कितनी रातें व्यतीत हो गयीं? तुम रथ के द्वारा बड़ी शीघ्रता के साथ आये हो। रास्ते में तुम्हें अधिक थकावट तो नहीं हुई?तुम्हारे नाना सकुशल तो हैं न? तुम्हारे मामा युधाजित् तो कुशल से हैं? बेटा! जब तुम यहाँ से गये थे, तब से लेकर अबतक सुख से रहे हो न? ये सारी बातें मुझे बताओ। 

कैकेयी के इस प्रकार प्रिय वाणी में पूछने पर दशरथनन्दन कमलनयन भरत ने माता को सब बातें बतायीं। वे बोले -  मां! नाना के घर से चले मेरी यह सातवीं रात बीती है। मेरे नानाजी और मामा युधाजित् भी कुशल से हैं। शत्रुओं को संताप देने वाले केकयनरेश ने मुझे जो धन-रत्न प्रदान किये हैं, उनके भार से मार्ग में सब वाहन थक गये थे, इसलिये मैं राजकीय संदेश लेकर गये हुए दूतों के जल्दी मचाने से यहाँ पहले ही चला आया हूँ। अच्छा माँ, अब मैं जो कुछ पूछता हूँ, उसे तुम बताओ। 

‘यह तुम्हारी शय्या सुवर्णभूषित पलंग इस समय सूना है, इसका क्या कारण है ( आज यहाँ महाराज उपस्थित क्यों नहीं हैं)? ये महाराज के परिजन आज प्रसन्न क्यों नहीं जान पड़ते हैं? महाराज (पिताजी ) प्रायः माताजी के ही महल में रहा करते थे, किंतु आज मैं उन्हें यहाँ नहीं देख रहा हूँ। मैं उन्हीं का दर्शन करने की इच्छा से यहाँ आया हूँ। मैं पूछता हूँ, बताओ, पिताजी कहाँ हैं? मैं उनके पैर पकडूंगा। अथवा बड़ी माता कौशल्या के घर में तो वे नहीं हैं?' 

कैकेयी राज्य के लोभ से मोहित हो रही थी। वह राजा का वृत्तान्त न जानने वाले भरत से उस घोर अप्रिय समाचार को प्रिय-सा समझती हुई इस प्रकार बताने लगी – पुत्र ! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ बड़े महात्मा, तेजस्वी, यज्ञशील और सत्पुरुषों के आश्रयदाता थे। एक दिन समस्त प्राणियों की जो गति होती है, उसी गति को वे भी प्राप्त हुए हैं। 

भरत धार्मिक कुल में उत्पन्न हुए थे और उनका हृदय शुद्ध था। माता की बात सुनकर वे पितृशोक से अत्यन्त पीड़ित हो सहसा पृथ्वी पर गिर पड़े और 'हाय, मैं मारा गया!' इस प्रकार अत्यन्त दीन और दुःखमय वचन कहकर रोने लगे। पराक्रमी महाबाहु भरत अपनी भुजाओं को बारम्बार पृथ्वी पर पटककर गिरने और लोटने लगे। उन महातेजस्वी राजकुमार की चेतना भ्रान्त और व्याकुल हो गयी। 

वे पिता की मृत्यु से दु:खी और शोक से व्याकुलचित्त होकर विलाप करने लगे - हाय! मेरे पिताजी की जो यह अत्यन्त सुन्दर शय्या पहले शरत्काल की रात में चन्द्रमा से सुशोभित होने वाले निर्मल आकाश की भाँति शोभा पाती थी, वही यह आज उन्हीं बुद्धिमान् महाराज से रहित होकर चन्द्रमा से हीन आकाश और सूखे हुए समुद्र के समान श्रीहीन प्रतीत होती है। 

विजयी वीरों में श्रेष्ठ भरत अपने सुन्दर मुख वस्त्र से ढककर अपने कण्ठस्वर के साथ आँसू गिराकर मन-ही-मन अत्यन्त पीड़ित हो पृथ्वी पर पड़कर विलाप करने लगे। देवतुल्य भरत शोक से व्याकुल हो वन में फरसे से काटे गये साखू के तने की भाँति पृथ्वी पर पड़े थे, मतवाले हाथी के समान पुष्ट तथा चन्द्रमा या सूर्य के समान तेजस्वी अपने शोकाकुल पुत्र को इस तरह भूमि पर पड़ा देख माता कैकेयी ने उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा - राजन्! उठो! उठो! महायशस्वी कुमार ! तुम इस तरह यहाँ धरती पर क्यों पड़े हो? तुम्हारे जैसे सभाओं में सम्मानित होने वाले सत्पुरुष शोक नहीं किया करते हैं। बुद्धिसम्पन्न पुत्र! जैसे सूर्यमण्डल में प्रभा निश्चलरूप से रहती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि सुस्थिर है। वह दान और यज्ञ में लगने की अधिकारिणी है; क्योंकि सदाचार और वेदवाक्यों का अनुसरण करनेवाली है। 

भरत पृथ्वी पर लोटते-पोटते बहुत देर तक रोते रहे। तत्पश्चात् अधिकाधिक शोक से आकुल होकर वे माता से इस प्रकार बोले – मैंने तो यह सोचा था कि महाराज श्रीराम का राज्याभिषेक करेंगे और स्वयं यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे - यही सोचकर मैंने बड़े हर्ष के साथ वहाँ से यात्रा की थी। किंतु यहाँ आने पर सारी बातें मेरी आशा के विपरीत हो गयीं। मेरा हृदय फटा जा रहा है; क्योंकि सदा अपने प्रिय और हित में लगे रहने वाले पिताजी को मैं नहीं देख रहा हूँ। 

'मां! महाराज को ऐसा कौन सा रोग हो गया था, जिससे वे मेरे आने के पहले ही चल बसे ? श्रीराम आदि सब भाई धन्य हैं, जिन्होंने स्वयं उपस्थित रहकर पिताजी का अन्त्येष्टि-संस्कार किया। निश्चय ही मेरे पूज्य पिता यशस्वी महाराज को मेरे यहाँ आने का कुछ पता नहीं है, अन्यथा वे शीघ्र ही मेरे मस्तक को झुकाकर उसे प्यार से सूँघते। हा! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे पिता का वह कोमल हाथ कहाँ है, जिसका स्पर्श मेरे लिये बहुत ही सुखदायक था? वे उसी हाथ से मेरे धूलिधूसर शरीर को बारंबार पोंछा करते थे। 

'अब जो मेरे भाई, पिता और बन्धु हैं तथा जिनका मैं परम प्रिय दास हूँ, अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले उन श्रीरामचन्द्रजी को तुम शीघ्र ही मेरे आने की सूचना दो। धर्म के ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुष के लिये बड़ा भाई पिता के समान होता है। मैं उनके चरणों में प्रणाम करूँगा। अब वे ही मेरे आश्रय हैं। आर्ये! धर्म का आचरण जिनका स्वभाव बन गया था तथा जो बड़ी दृढता के साथ उत्तम व्रत का पालन करते थे, वे मेरे सत्यपराक्रमी और धर्मज्ञ पिता महाराज दशरथ अन्तिम समय में क्या कह गये थे? मेरे लिये जो उनका अन्तिम संदेश हो उसे मैं सुनना चाहता हूँ। 

पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही हो। (वह बोली-) पुत्र! बुद्धिमानों में श्रेष्ठ तुम्हारे महात्मा पिता महाराज ने 'हा राम ! हा सीते! हा लक्ष्मण !' इस प्रकार विलाप करते हुए परलोक की यात्रा की थी। जैसे पाशों से बँधा हुआ महान् गज विवश हो जाता है, उसी प्रकार कालधर्म के वशीभूत हुए तुम्हारे पिता ने अन्तिम वचन इस प्रकार कहा था - जो लोग सीता के साथ पुन: लौटकर आये हुए महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मण को देखेंगे, वे ही कृतार्थ होंगे। 

माता के द्वारा यह दूसरी अप्रिय बात कही जाने पर भरत और भी दुःखी ही हुए। उनके मुख पर विषाद छा गया और उन्होंने पुनः माता से पूछा  - मां! माता कौशल्या का आनन्द बढ़ानेवाले धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी इस अवसर पर भाई लक्ष्मण और भाभी सीता के साथ कहाँ चले गये हैं?

इस प्रकार पूछने पर उनकी माता कैकेयी ने एक साथ ही प्रिय बुद्धि से वह अप्रिय संवाद यथोचित रीति से सुनाना आरम्भ किया - पुत्र! राजकुमार श्रीराम वल्कल वस्त्र धारण करके सीता के साथ दण्डकवन में चले गये हैं। लक्ष्मण ने भी उन्हीं का अनुसरण किया है। 

यह सुनकर भरत डर गये, उन्हें अपने भाई के चरित्र पर शङ्का हो आयी। (वे सोचने लगे – श्रीराम कहीं धर्म से गिर तो नहीं गये?) अपने वंश की महत्ता (धर्मपरायणता) का स्मरण करके वे कैकेयी से इस प्रकार पूछने लगे – मां! श्रीराम ने किसी कारणवश ब्राह्मण का धन तो नहीं हर लिया था? किसी निष्पाप धनी या दरिद्र की हत्या तो नहीं कर डाली थी? राजकुमार श्रीराम का मन किसी परायी स्त्री की ओर तो नहीं चला गया? किस अपराध के कारण भैया श्रीराम को दण्डकारण्य में जाने के लिये निर्वासित कर दिया गया है? 

पुत्र का वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्म स्थान को पाछकर (चाकू से चीरकर) उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयी ने अपनी सब करनी शुरू से (आखिर तक बड़े) प्रसन्न मन से सुना दी। 

तब चपल स्वभाव वाली भरत की माता कैकेयी ने उस विवेकशून्य चञ्चल नारीस्वभाव के कारण ही अपनी करतूत को ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया। महात्मा भरत के पूर्वोक्त रूप से पूछने पर व्यर्थ ही अपने को बड़ी विदुषी मानने वाली कैकेयी ने बड़े हर्ष में भरकर कहा - पुत्र ! श्रीराम ने किसी कारणवश किञ्चिन्मात्र भी ब्राह्मण के धनका अपहरण नहीं किया है। किसी निरपराध धनी या दरिद्र की हत्या भी उन्होंने नहीं की है। श्रीराम कभी किसी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डालते हैं। 

‘बेटा! (उनके वन में जाने का कारण इस प्रकार है) – मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधाता ने बीच में जरा सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोक को पधार गए। मैंने सुना था कि अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक होने जा रहा है, तब मैंने तुम्हारे पिता से तुम्हारे लिये राज्य और श्रीराम के लिये वनवास की प्रार्थना की। उन्होंने अपने सत्यप्रतिज्ञ स्वभाव के अनुसार मेरी माँग पूरी की। श्रीराम लक्ष्मण और सीता के साथ वन को भेज दिये गये, फिर अपने प्रिय पुत्र श्रीराम को न देखकर वे महायशस्वी महाराज पुत्रशोक से पीड़ित हो परलोकवासी हो गये। 

‘धर्मज्ञ! अब तुम राजपद स्वीकार करो। तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकार से यह सब कुछ किया है। बेटा! शोक और संताप न करो, धैर्य का आश्रय लो। अब यह नगर और निष्कण्टक राज्य तुम्हारे ही अधीन है। अतः वत्स! अब विधि-विधान के ज्ञाता वशिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणों के साथ तुम उदार हृदय वाले महाराज का अन्त्येष्टि-संस्कार करके इस पृथ्वी के राज्य पर अपना अभिषेक कराओ। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-६६(66) समाप्त !

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