अयोध्या में लोगों की वह रात रोते- कलपते ही बीती। उसमें आनन्द का नाम भी नहीं था। आँसुओं से सब लोगों के कण्ठ भरे हुए थे। दुःख के कारण वह रात सबको बड़ी लम्बी प्रतीत हुई थी। जब रात बीत गयी और सूर्योदय हुआ, तब राज्य का प्रबन्ध करनेवाले ब्राह्मणलोग एकत्र हो दरबार में आये। मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महायशस्वी जाबालि - ये सभी ब्राह्मणश्रेष्ठ राजपुरोहित वशिष्ठजी के सामने बैठकर मन्त्रियों के साथ अपनी अलग-अलग राय देने लगे।
वे बोले – पुत्रशोक इन महाराज के स्वर्गवासी होने के कारण यह रात बड़े दु:ख से बीती है, जो हमारे लिये सौ वर्षों के समान प्रतीत हुई थी। महाराज दशरथ स्वर्ग सिधारे। श्रीरामचन्द्रजी वन में रहने लगे और तेजस्वी लक्ष्मण भी श्रीराम के साथ ही चले गये। शत्रुओं को संताप देनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न केकयदेश के रमणीय राजगृह में नाना के घर में निवास करते हैं।
‘इक्ष्वाकुवंशी राजकुमारों में से किसी को आज ही यहाँ का राजा बनाया जाये; क्योंकि राजा के बिना हमारे इस राज्य का नाश हो जायेगा। जहाँ कोई राजा नहीं होता, ऐसे जनपद में विद्युन्मालाओं से अलंकृत महान् गर्जन करनेवाला मेघ पृथ्वी पर दिव्य जल की वर्षा नहीं करता है। जिस जनपद में कोई राजा नहीं, वहाँ के खेतों में मुट्ठी - के मुट्ठी बीज नहीं बिखेरे जाते। राजा से रहित देश में पुत्र पिता और स्त्री पति के वश में नहीं रहती।'
‘राजहीन देश में धन अपना नहीं होता है। बिना राजा के राज्य में पत्नी भी अपनी नहीं रह पाती है। राजारहित देश में यह महान् भय बना रहता है। जब वहाँ पति-पत्नी आदि का सत्य सम्बन्ध नहीं रह सकता तब फिर दूसरा कोई सत्य कैसे रह सकता है? बिना राजा के राज्य में मनुष्य कोई पञ्चायत भवन नहीं बनवाते, रमणीय उद्यान का भी निर्माण नहीं करवाते तथा हर्ष और उत्साह के साथ पुण्यगृह (धर्मशाला, मन्दिर आदि) भी नहीं बनवाते हैं।'
'जहाँ कोई राजा नहीं, उस जनपद में स्वभावतः यज्ञ करने वाले द्विज और कठोर व्रत का पालन करने वाले जितेन्द्रिय ब्राह्मण उन बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान नहीं करते, जिनमें सभी ऋत्विज् और सभी यजमान होते हैं। राजारहित जनपद में कदाचित् महायज्ञों का आरम्भ हो भी तो उनमें धनसम्पन्न ब्राह्मण भी ऋत्विजों को पर्याप्त दक्षिणा नहीं देते (उन्हें भय रहता है कि लोग हमें धनी समझकर लूट न लें )।'
'अराजक देश में राष्ट्र को उन्नतिशील बनाने वाले उत्सव, जिनमें नट और नर्तक हर्ष में भरकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, बढ़ने नहीं पाते हैं तथा दूसरे दूसरे राष्ट्रहितकारी संघ भी नहीं पनपने पाते हैं। बिना राजा के राज्य में वादी और प्रतिवादी के विवाद का संतोषजनक निपटारा नहीं हो पाता अथवा व्यापारियों को लाभ नहीं होता। कथा सुनने की इच्छा वाले लोग कथावाचक पौराणिकों की कथाओं से प्रसन्न नहीं होते।'
‘राजारहित जनपद में सोने के आभूषणों से विभूषित हुई कुमारियाँ एक साथ मिलकर संध्या के समय उद्यानों में क्रीड़ा करने के लिये नहीं जाती हैं। बिना राजा के राज्य में धनी लोग सुरक्षित नहीं रह पाते तथा कृषि और गोरक्षा से जीवन-निर्वाह करने वाले वैश्य भी दरवाजा खोलकर नहीं सो पाते हैं। राजा से रहित जनपद में कामी मनुष्य नारियों के साथ शीघ्रगामी वाहनों द्वारा वनविहार के लिये नहीं निकलते हैं। जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपद में साठ वर्ष के दन्तार हाथी घंटे बाँधकर सड़कों पर नहीं घूमते हैं।'
'बिना राजा के राज्य में धनुर्विद्या के अभ्यास काल में निरन्तर लक्ष्य की ओर बाण चलाने वाले वीरों की प्रत्यञ्चा तथा करतल का शब्द नहीं सुनायी देता है। राजा से रहित जनपद में दूर जाकर व्यापार करने वाले वणिक् बेचने की बहुत-सी वस्तुएँ साथ लेकर कुशलपूर्वक मार्ग तय नहीं कर सकते। जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपद में जहाँ संध्या हो वहीं डेरा डाल देनेवाला, अपने अन्त: करण के द्वारा परमात्मा का ध्यान करने वाला और अकेला ही विचरने वाला जितेन्द्रिय मुनि नहीं घूमता फिरता है क्योंकि उसे कोई भोजन देनेवाला नहीं होता।'
'अराजक देश में लोगों को अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति और प्राप्त वस्तु की रक्षा नहीं हो पाती। राजा के न रहने पर सेना भी युद्ध में शत्रुओं का सामना नहीं करती। बिना राजा के राज्य में लोग वस्त्राभूषणों से विभूषित हो हृष्ट-पुष्ट उत्तम घोड़ों तथा रथों द्वारा सहसा यात्रा नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें लुटेरों का भय बना रहता है।'
‘राजा से रहित राज्य में शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान् मनुष्य वनों और उपवनों में शास्त्रों की व्याख्या करते हुए नहीं ठहर पाते हैं। जहाँ अराजकता फैल जाती है, उस जनपद में मन को वश में रखने वाले लोग देवताओं की पूजा के लिये फूल, मिठाई और दक्षिणा की व्यवस्था नहीं करते हैं। जिस जनपद में कोई राजा नहीं होता है, वहाँ चन्दन और अगुरु का लेप लगाये हुए राजकुमार वसन्त-ऋतु के खिले हुए वृक्षों की भाँति शोभा नहीं पाते हैं।'
'जैसे जल के बिना नदियाँ, घास के बिना वन और ग्वालों के बिना गौओं की शोभा नहीं होती, उसी प्रकार राजा के बिना राज्य शोभा नहीं पाता है। जैसे ध्वज रथ का ज्ञान कराता है और धूम अग्नि का बोधक होता है, उसी प्रकार राजकाज देखने वाले हम लोगों के अधिकार को प्रकाशित करने वाले जो महाराज थे, वे यहाँ से देवलोक को चले गये। राजा के न रहने पर राज्य में किसी भी मनुष्य की कोई भी वस्तु अपनी नहीं रह जाती। जैसे मत्स्य एक-दूसरे को खा जाते हैं, उसी प्रकार अराजक देश के लोग सदा एक-दूसरे को खाते-लूटते-खसोटते रहते हैं।'
'जो वेद-शास्त्रों की तथा अपनी-अपनी जाति के लिये नियत वर्णाश्रम की मर्यादा को भङ्ग करने वाले नास्तिक मनुष्य पहले राजदण्ड से पीड़ित होकर दबे रहते थे, वे भी अब राजा के न रहने से निःशङ्क होकर अपना प्रभुत्व प्रकट करेंगे। जैसे दृष्टि सदा ही शरीर के हित में प्रवृत्त रहती है, उसी प्रकार राजा राज्य के भीतर सत्य और धर्म का प्रवर्त्तक होता है।'
'राजा ही सत्य और धर्म है। राजा ही कुलवानों का कुल है। राजा ही माता और पिता है तथा राजा ही मनुष्यों का हित करनेवाला है। राजा अपने महान् चरित्र के द्वारा यम, कुबेर, इन्द्र और महाबली वरुण से भी बढ़ जाते हैं (यमराज केवल दण्ड देते हैं, कुबेर केवल धन देते हैं, इन्द्र केवल पालन करते हैं और वरुण केवल सदाचार में नियन्त्रित करते हैं; परंतु एक श्रेष्ठ राजा में ये चारों गुण मौजूद होते हैं। अत: वह इनसे बढ़ जाता है)। यदि संसार में भले-बुरे का विभाग करने वाला राजा न हो तो यह सारा जगत् अन्धकार से आच्छन्न-सा हो जाये,कुछ भी सूझ न पड़े।'
‘वशिष्ठजी! जैसे उमड़ता हुआ समुद्र अपनी तटभूमि तक पहुँचकर उससे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार हम सब लोग महाराज के जीवनकाल में भी केवल आपकी ही बात का उल्लङ्घन नहीं करते थे। अत: विप्रवर! इस समय हमारे व्यवहार को देखकर तथा राजा के अभाव में जंगल बने हुए इस देश पर दृष्टिपात करके आप ही किसी इक्ष्वाकुवंशी राजकुमार को अथवा दूसरे किसी योग्य पुरुष को राजा के पद पर अभिषिक्त कीजिये।

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