तदनन्तर रात बीतने पर दूसरे दिन सवेरे ही वन्दीजन (महाराज की स्तुति करने के लिये) राजमहल में उपस्थित हुए। व्याकरण-ज्ञान से सम्पन्न (अथवा उत्तम अलङ्कारों से विभूषित) सूत उत्तम रूप से वंशपरम्परा का श्रवण कराने वाले मागध और सङ्गीतशास्त्र का अनुशीलन करनेवाले गायक अपने-अपने मार्ग के अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये।
उच्चस्वर से आशीर्वाद देते हुए राजा की स्तुति करने वाले उन सूत मागध आदि का शब्द राजमहलों के भीतरी भाग में फैलकर गूंजने लगा।
सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतने ही में पाणिवादक (हाथों से ताल देकर गाने वाले) वहाँ आये और राजाओं के बीते हुए अद्भुत कर्मों का बखान करते हुए ताल गति के अनुसार तालियाँ बजाने लगे।
उस शब्द से वृक्षों की शाखाओं पर बैठे हुए तथा राजकुल में ही विचरने वाले पिंजड़े में बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे। शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणों के मुख से निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओं के मधुर नाद तथा गाथाओं के आशीर्वाद युक्त गान से वह सारा भवन गूँज उठा
तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्या कुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजों की संख्या अधिक थी, पहले की भाँति उस दिन भी राजभवन में उपस्थित हुए।
स्नानविधि के ज्ञाता भृत्यजन विधिपूर्वक सोने के घड़ों में चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समय पर आये। पवित्र आचार-विचारवाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओं की संख्या अधिक थी, मङ्गल के लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीने योग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण – दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं। प्रात:काल राजाओं के मङ्गल के लिये जो-जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है। वहाँ लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, विधि के अनुरूप, आदर और प्रशंसा के योग्य उत्तम गुण से युक्त तथा शोभायमान थी।
सूर्योदय होने तक राजा की सेवा के लिये उत्सुक हुआ सारा परिजन वर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया। जब उस समय तक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मन में यह शङ्का हो गयी कि महाराज के न आने का क्या कारण हो सकता है? तदनन्तर जो कोशलनरेश दशरथ के समीप रहने वाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्या के पास जाकर अपने स्वामी को जगाने लगीं। वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करने के योग्य थीं; अत: विनीतभाव से युक्तिपूर्वक उन्होंने उनकी शय्या का स्पर्श किया। स्पर्श करके भी वे उनमें जीवन का कोई चिह्न नहीं पा सकीं।
सोये हुए पुरुष की जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अत: उन्होंने हृदय एवं हाथ के मूलभाग में चलने वाली नाड़ियों की भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई। फिर तो वे काँप उठीं। उनके मन में राजा के प्राणों के निकल जाने की आशङ्का हो गयी। वे जल के प्रवाह के सम्मुख पड़े हुए तिनकों के अग्रभाग की भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं। संशय में पड़ी हुई उन स्त्रियों को राजा की ओर देखकर उनकी मृत्यु के विषय में जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया।
पुत्रशोक से आक्रान्त हुई कौशल्या और सुमित्रा उस समय मरी हुई के समान सो गयी थीं और उस समय तक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी। सोयी हुई कौशल्या श्रीहीन हो गयी थीं। उनके शरीर का रंग बदल गया था। वे शोक से पराजित एवं पीड़ित हो अन्धकार से आच्छादित हुई तारिका के समान शोभा नहीं पा रही थीं। राजा के पास कौशल्या थीं और कौशल्या के समीप देवी सुमित्रा थीं। दोनों ही निद्रामग्न हो जाने के कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं। उन दोनों के मुख पर शोक के आँसू फैले हुए थे।
उस समय उन दोनों देवियों को निद्रामग्न देख अन्तःपुर की अन्य स्त्रियों ने यही समझा कि सोते अवस्था में ही महाराज के प्राण निकल गये हैं। फिर तो जैसे जंगल में यूथपति गजराज के अपने वासस्थान से अन्यत्र चले जाने पर हथिनियाँ करुण चीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्त: पुर की सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दुःखी हो उच्चस्वर से आर्तनाद करने लगीं।
उनके रोने की आवाज से कौशल्या और सुमित्रा की भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं। कौशल्या और सुमित्रा ने राजा को देखा, उनके शरीर का स्पर्श किया और 'हा नाथ!' की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वी पर गिर पड़ीं। कोशलराजकुमारी कौशल्या धरती पर लोटने और छटपटाने लगीं। उनका धूलि - धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाश से टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूल में लोट रही हो।
राजा दशरथ के शरीर की उष्णता शान्त हो गयी थी। इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जाने पर भूमि पर अचेत पड़ी हुई कौशल्या को अन्त: पुर की उन सारी स्त्रियों ने मरी हुई नागिन के समान देखा। तदनन्तर पीछे आयी हुई कैकेयी आदि सारी स्त्रियां शोक से संतप्त होकर रोने लगीं और अचेत होकर गिर पड़ीं। उन् क्रन्दन करती हुई रानियों ने वहाँ पहले से होनेवाले प्रबल आर्तनाद को और भी बढ़ा दिया। उस बढ़े हुए आर्तनाद से वह सारा राजमहल पुनः बड़े जोर से गूँज उठा।
कालधर्म को प्राप्त हुए राजा दशरथ का वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्यों से भर गया। सब ओर रोने-चिल्लाने का भयंकर शब्द होने लगा। वहाँ राजा के सभी बन्धु बान्धव शोक संताप से पीड़ित होकर जुट गये। वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दुःखी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा। उन यशस्वी भूपालशिरोमणि को दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर अत्यन्त दु:खी हो जोर-जोर से रोने लगीं और उनकी दोनों बाँहें पकड़कर अनाथ की भाँति करुण - विलाप करने लगीं।

No comments:
Post a Comment