भाग-५(5) राजा दशरथ के अनुरोध से वशिष्ठजी का सीता सहित श्रीराम को उपवास व्रत की दीक्षा देकर आना, सीता सहित श्रीराम का नियम परायण होना और हर्ष में भरे पुरवासियों द्वारा नगर की सजावट


उधर महाराज दशरथ जब श्रीरामचन्द्रजी को दूसरे दिन होने वाले अभिषेक के विषय में आवश्यक संदेश दे चुके, तब अपने पुरोहित वशिष्ठजी को बुलाकर बोले - नियमपूर्वक व्रत का पालन करने वाले तपोधन! आप जाइये और विघ्न निवारण रूप कल्याण की सिद्धि तथा राज्य की प्राप्ति के लिये बहू सहित श्रीराम से उपवास व्रत का पालन कराइये। 

तब राजा से ‘तथास्तु' कहकर वेदवेत्ता विद्वानों में श्रेष्ठ तथा उत्तम व्रतधारी स्वयं भगवान् वशिष्ठ मन्त्रवेत्ता वीर श्रीराम को उपवास व्रत की दीक्षा देने के लिये ब्राह्मण के चढ़ने योग्य जुते-जुताये श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ हो श्रीराम के महल की ओर चल दिये। श्रीराम का भवन श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल था, उसके पास पहुँचकर मुनिवर वशिष्ठ ने उसकी तीन ड्योढ़ियों में रथ के द्वारा ही प्रवेश किया। वहाँ पधारे हुए उन सम्माननीय महर्षि का सम्मान करने के लिये श्रीरामचन्द्रजी बड़ी उतावली के साथ वेगपूर्वक घर से बाहर निकले। उन मनीषी महर्षि के रथ के समीप शीघ्रतापूर्वक जाकर श्रीराम ने स्वयं उनका हाथ पकड़कर उन्हें रथ से नीचे उतारा। श्रीराम प्रिय वचन सुनने के योग्य थे। 

उन्हें इतना विनीत देखकर पुरोहितजी ने 'वत्स!' कहकर पुकारा और उन्हें प्रसन्न करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा - श्रीराम ! तुम्हारे पिता तुम पर बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि तुम्हें उनसे राज्य प्राप्त होगा; अत: आज की रात में तुम वधू सीता के साथ उपवास करो। रघुनन्दन ! जैसे नहुष ने ययाति का अभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता महाराज दशरथ कल प्रातः काल बड़े प्रेम से तुम्हारा युवराज - पद पर अभिषेक करेंगे। 

ऐसा कहकर उन व्रतधारी एवं पवित्र महर्षि ने मन्त्रोच्चारण पूर्वक सीता सहित श्रीराम को उस समय उपवास - व्रत की दीक्षा दी। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने महाराज के भी गुरु वशिष्ठ का यथावत् पूजन किया; फिर वे मुनि श्रीराम की अनुमति ले उनके महल से बाहर निकले। श्रीराम भी वहाँ प्रियवचन बोलने वाले सुहृदों के साथ कुछ देर तक बैठे रहे, फिर उनसे सम्मानित हो उन सबकी अनुमति ले पुनः अपने महल के भीतर चले गये। 

उस समय श्रीराम का भवन हर्षोत्फुल्ल नरनारियों से भरा हुआ था और मतवाले पक्षियों के कलरवों से युक्त खिले हुए कमल वाले तालाब के समान शोभा पा रहा था। राजभवनों में श्रेष्ठ श्रीराम के महल से बाहर आकर वशिष्ठजी ने सारे मार्ग मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए देखे। 

अयोध्या की सड़कों पर सब ओर झुंड के झुंड मनुष्य, जो श्रीराम का राज्याभिषेक देखने के लिये उत्सुक थे, खचाखच भरे हुए थे; सारे राजमार्ग उनसे घिरे हुए थे।

जनसमुदायरूपी लहरों के परस्पर टकराने से उस समय जो हर्षध्वनि प्रकट होती थी, उससे व्याप्त हुआ राजमार्ग का कोलाहल समुद्र की गर्जना की भाँति सुनायी देता था। उस दिन वन और उपवनों की पंक्तियों से सुशोभित हुई अयोध्यापुरी के घर-घर में ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं, वहाँ की सभी गलियों और सड़कों को झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था। स्त्रियों और बालकों सहित अयोध्या वासी जनसमुदाय श्रीराम के राज्याभिषेक को देखने की इच्छा से उस समय शीघ्र सूर्योदय होने की कामना कर रहा था। अयोध्या का वह महान् उत्सव प्रजाओं के लिये अलंकार रूप और सब लोगों के आनन्द को बढ़ानेवाला था; वहाँ के सभी मनुष्य उसे देखने के लिये उत्कण्ठित हो रहे थे। 

इस प्रकार मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए राजमार्ग पर पहुँचकर पुरोहितजी उस जनसमूह को एक ओर करते हुए-से धीरे-धीरे राजमहल की ओर गये। श्वेत जलद-खण्ड के समान सुशोभित होने वाले महल के ऊपर चढ़कर वशिष्ठजी राजा दशरथ से उसी प्रकार मिले, जैसे बृहस्पति देवराज इन्द्र से मिल रहे हों। 

उन्हें आया देख राजा सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और पूछने लगे – 'मुने! क्या आपने मेरा अभिप्राय सिद्ध किया।' वशिष्ठजी ने उत्तर दिया- 'हाँ! कर दिया। उनके साथ ही उस समय वहाँ बैठे हुए अन्य सभासद् भी पुरोहित का समादर करते हुए अपने-अपने आसनों से उठकर खड़े हो गये। 

तदनन्तर गुरुजी की आज्ञा ले राजा दशरथ ने उस जनसमुदाय को विदा करके पर्वत की कन्दरा में घुसने वाले सिंह के समान अपने अन्तः पुर में प्रवेश किया। सुन्दर वेश-भूषा धारण करने वाली सुन्दरियों से भरे हुए इन्द्रसदन के समान उस मनोहर राजभवन को अपनी शोभा से प्रकाशित करते हुए राजा दशरथ ने उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे चन्द्रमा ताराओं से भरे हुए आकाश में पदार्पण करते हैं। 

पुरोहितजी के चले जाने पर मन को संयम में रखने वाले श्रीराम ने स्नान करके अपनी विशाल लोचना पत्नी के साथ श्रीनारायण की उपासना आरम्भ की। उन्होंने हविष्य-पात्र को सिर झुकाकर नमस्कार किया और प्रज्वलित अग्नि में महान् देवता (शेषशायी नारायण) की प्रसन्नता के लिये विधिपूर्वक उस हविष्य की आहुति दी। तत्पश्चात् अपने प्रिय मनोरथ की सिद्धि का संकल्प लेकर उन्होंने उस यज्ञ शेष हविष्य का भक्षण किया और मन को संयम में रखकर मौन हो वे राजकुमार श्रीराम विदेहूनन्दिनी सीता के साथ भगवान् विष्णु के सुन्दर मन्दिर में श्रीनारायणदेव का ध्यान करते हुए वहाँ अच्छी तरह बिछी हुई कुश की चटाई पर सोये। 

जब तीन पहर बीतकर एक ही पहर रात शेष रह गयी, तब वे शयन से उठ बैठे। उस समय उन्होंने सभामण्डप को सजाने के लिये सेवकों को आज्ञा दी। वहाँ सूत, मागध और बंदियों की श्रवण सुखद वाणी सुनते हुए श्रीराम ने प्रात: कालिक संध्योपासना की; फिर एकाग्रचित्त होकर वे जप करने लगे। तदनन्तर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए श्रीराम ने मस्तक झुकाकर भगवान् मधुसूदन को प्रणाम और उनका स्तवन किया; इसके बाद ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया। 

उन ब्राह्मणों का पुण्याहवाचन सम्बन्धी गम्भीर एवं मधुर घोष नाना प्रकार के वाद्यों की ध्वनि से व्याप्त होकर सारी अयोध्यापुरी में फैल गया। उस समय अयोध्यावासी मनुष्यों ने जब यह सुना कि श्रीरामचन्द्रजी ने सीता के साथ उपवास व्रत आरम्भ कर दिया है, तब उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। सवेरा होने पर श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अयोध्यापुरी को सजाने में लग गये। 

जिनके शिखरों पर श्वेत बादल विश्राम करते हैं, उन पर्वतों के समान गगनचुम्बी देवमन्दिरों, चौराहों, गलियों, देववृक्षों, समस्त सभाओं, अट्टालिकाओं, नाना प्रकार की बेचने योग्य वस्तुओं से भरी हुई व्यापारियों की बड़ी-बड़ी दूकानों तथा कुटुम्बी गृहस्थों के सुन्दर समृद्धिशाली भवनों में और दूर से दिखायी देने वाले वृक्षों पर भी ऊँची ध्वजाएँ लगायी गयीं और उनमें पताकाएँ फहरायी गयीं। 

उस समय वहाँ की जनता सब ओर नटों और नर्तकों के समूहों तथा गाने वाले गायकों की मन और कानों को सुख देने वाली वाणी सुनती थी। श्रीराम के राज्याभिषेक का शुभ अवसर प्राप्त होने पर प्राय: सब लोग चौराहों पर और घरों में भी आपस में श्रीराम के राज्याभिषेक की ही चर्चा करते थे। घरों के दरवाजों पर खेलते हुए झुंड के झुंड बालक भी आपस में श्रीराम के राज्याभिषेक की ही बातें करते थे। 

पुरवासियों ने श्रीराम के राज्याभिषेक के समय राजमार्ग पर फूलों की भेंट चढ़ाकर वहाँ सब ओर धूप की सुगन्ध फैला दी ; ऐसा करके उन्होंने राजमार्ग को बहुत सुन्दर बना दिया। राज्याभिषेक होते-होते रात हो जाने की आशङ्का से प्रकाश की व्यवस्था करने के लिये पुरवासियों ने सब ओर सड़कों के दोनों तरफ वृक्ष की भाँति अनेक शाखाओं से युक्त दीप स्तम्भ खड़े कर दिये। इस प्रकार नगर को सजाकर श्रीराम के युवराज पद पर अभिषेक की अभिलाषा रखने वाले समस्त पुरवासी चौराहों और सभाओं में झुंड के झुंड एकत्र हो वहाँ परस्पर बातें करते हुए महाराज दशरथ की प्रशंसा करने लगे। 

‘अहो! इक्ष्वाकुकुल को आनन्दित करनेवाले ये राजा दशरथ बड़े महात्मा हैं, जो कि अपने-आपको बूढ़ा हुआ जानकर श्रीराम का राज्याभिषेक करने जा रहे हैं। भगवान का हम सब लोगों पर बड़ा अनुग्रह है कि श्रीरामचन्द्रजी हमारे राजा होंगे और चिरकाल तक हमारी रक्षा करते रहेंगे; क्योंकि वे समस्त लोकों के निवासियों में जो भलाई या बुराई है, उसे अच्छी तरह देख चुके हैं।'  

'श्रीराम का मन कभी उद्धत नहीं होता। वे विद्वान्, धर्मात्मा और अपने भाइयों पर स्नेह रखने वाले हैं। उनका अपने भाइयों पर जैसा स्नेह है, वैसा ही हम लोगों पर भी है। धर्मात्मा एवं निष्पाप राजा दशरथ चिरकाल तक जीवित रहें, जिनके प्रसाद से हमें श्रीराम के राज्याभिषेक का दर्शन सुलभ होगा।' 

अभिषेक का वृत्तान्त सुनकर नाना दिशाओं से उस जनपद के लोग भी वहाँ पहुँचे थे, उन्होंने उपर्युक्त बातें कहने वाले पुरवासियों की सभी बातें सुनीं। वे सब-के-सब श्रीराम का राज्याभिषेक देखने के लिये अनेक दिशाओं से अयोध्यापुरी में आये थे। उन जनपद निवासी मनुष्यों ने श्रीरामपुरी को अपनी उपस्थिति से भर दिया था। वहाँ मनुष्यों की भीड़-भाड़ बढ़ने से जो जनरव सुनायी देता था, वह पर्वों के दिन बढ़े हुए वेग वाले महासागर की गर्जना के समान जान पड़ता था। उस समय श्रीराम के अभिषेक का उत्सव देखने के लिये पधारे हुए जनपद वासी मनुष्यों द्वारा सब ओर से भरा हुआ वह इन्द्रपुरी के समान नगर अत्यन्त कोलाहल पूर्ण होने के कारण मकर, नक्र, तिमिङ्गल आदि विशाल जल-जन्तुओं से परिपूर्ण महासागर के समान प्रतीत होता था। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-५(5) समाप्त !

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