भाग-५(5) श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का तापसों के आश्रम मण्डल में सत्कार, वन के भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता पर विराध का आक्रमण

 


दण्डकारण्य नामक महान् वन में प्रवेश करके मन को वश में रखनेवाले दुर्जय वीर श्रीराम ने तपस्वी मुनियों के बहुत से आश्रम देखे। वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रममण्डल ऋषियों की ब्रह्मविद्या के अभ्यास से प्रकट हुए विलक्षण तेज से व्याप्त था, इसलिये आकाश में प्रकाशित होने वाले दुर्दर्श सूर्य मण्डल की भाँति वह भूतल पर उद्दीप्त हो रहा था। राक्षस आदि के लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था। 

वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियों को शरण देनेवाला था। उसका आँगन सदा झाड़ने- बुहारने से स्वच्छ बना रहता था। वहाँ बहुत से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियों के समुदाय भी उसे सब ओर से घेरे रहते थे। वहाँ का प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं। उस स्थान के प्रति उनके मन में बड़े आदर का भाव था। बड़ी-बड़ी अग्निशालाएँ, स्रुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश, समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल- मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। 

स्वादिष्ट फल देनेवाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षों से वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था। बलिवैश्वदेव और होम से पूजित वह पवित्र आश्रम समूह वेदमन्त्रों के पाठ की ध्वनि से गूँजता रहता था। कमलपुष्पों से सुशोभित पुष्करिणी उस स्थान की शोभा बढ़ाती थी तथा वहाँ और भी बहुत से फूल सब ओर बिखरे हुए थे। उन आश्रमों में चीर और काला मृगचर्म धारण करने वाले तथा फल - मूल का आहार करके रहने वाले, जितेन्द्रिय एवं सूर्य और अग्नि के तुल्य महातेजस्वी, पुरातन मुनि निवास करते थे। 

नियमित आहार करने वाले पवित्र महर्षियों से सुशोभित वह आश्रम समूह ब्रह्माजी के धाम की भाँति तेजस्वी तथा वेदध्वनि से निनादित था। अनेक महाभाग ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण उन आश्रमों की शोभा बढ़ाते थे। महातेजस्वी श्रीराम ने उस आश्रममण्डल को देखकर अपने महान् धनुष की प्रत्यञ्चा उतार दी, फिर वे आश्रम के भीतर गये। श्रीराम तथा यशस्विनी सीता को देखकर वे दिव्य ज्ञान से सम्पन्न महर्षि बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके पास गये। 

दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले वे महर्षि उदयकाल के चन्द्रमा की भाँति मनोहर, धर्मात्मा श्रीराम को, लक्ष्मण को और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता को भी देखकर उन सबके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद देने लगे। उन्होंने उन तीनों को आदरणीय अतिथि के रूप में ग्रहण किया। श्रीराम के रूप, शरीर की गठन, कान्ति, सुकुमारता तथा सुन्दर वेष को उन वनवासी मुनियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा। 

वन में निवास करने वाले वे सभी मुनि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता - तीनों को एकटक नेत्रों से देखने लगे। उनका स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय प्रतीत होता था। समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले उन महाभाग महर्षियों ने वहाँ अपने प्रिय अतिथि इन भगवान् श्रीराम को पर्णशाला में ले जाकर ठहराया। अग्नितुल्य तेजस्वी और धर्मपरायण उन महाभाग मुनियों ने श्रीराम को विधिवत् सत्कार के साथ जल समर्पित किया। फिर बड़ी प्रसन्नता के साथ मङ्गलसूचक आशीर्वाद देते हुए उन महात्मा श्रीराम को उन्होंने फल-मूल और फूल आदि के साथ सारा आश्रम भी समर्पित कर दिया। 

सब कुछ निवेदन करके वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले - रघुनन्दन ! दण्ड धारण करने वाला राजा धर्म का पालक, महायशस्वी, इस जन समुदाय को शरण देने वाला माननीय, पूजनीय और सबका गुरु है। इस भूतल पर इन्द्र (आदि लोकपालों) का ही चौथा अंश होने के कारण वह प्रजा की रक्षा करता है, अतः राजा सबसे वन्दित होता तथा उत्तम एवं रमणीय भोगों का उपभोग करता है। (जब साधारण राजा की यह स्थिति है, तब आपके लिये तो क्या कहना है। आप तो साक्षात् भगवान् हैं )। 

'हम आपके राज्य में निवास करते हैं, अतः आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये। आप नगर में रहें या वन में, हमलोगों के राजा ही हैं। आप समस्त जनसमुदाय के शासक एवं पालक हैं। राजन्! हमने जीवमात्र को दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियों को जीत लिया है। अब तपस्या ही हमारा धन है। जैसे माता गर्भस्थ बालक की रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरह से हमारी रक्षा करनी चाहिये।' 

ऐसा कहकर उन तपस्वी मुनियों ने वन में उत्पन्न होने वाले फल, मूल, फूल तथा अन्य अनेक प्रकार के आहारों से लक्ष्मण और सीता सहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का सत्कार किया। इनके सिवा दूसरे अग्नितुल्य तेजस्वी तथा न्याययुक्त बर्ताव वाले सिद्ध तापसों ने भी सर्वेश्वर भगवान् श्रीराम को यथोचित रूप से तृप्त किया। रात्रि में उन महर्षियों का आतिथ्य ग्रहण करके सवेरे सूर्योदय होने पर समस्त मुनियों से विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुन: वन में ही आगे बढ़ने लगे। जाते-जाते लक्ष्मण सहित श्रीराम ने वन के मध्यभाग में एक ऐसे स्थान को देखा, जो नाना प्रकार के मृगों से व्याप्त था। वहाँ बहुत-से रीछ और बाघ रहा करते थे। वहाँ के वृक्ष, लता और झाड़ियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थीं। उस वनप्रान्त में किसी जलाशय का दर्शन होना कठिन था। वहाँ के पक्षी वहीं चहक रहे थे। झींगुरों की झंकार गूँज रही थी। 

भयंकर जंगली पशुओं से भरे हुए उस दुर्गम वन में सीता के साथ श्रीरामचन्द्रजी ने एक नरभक्षी राक्षस देखा, पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और जो उच्चस्वर से गर्जना कर रहा था। उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट और पेट विकराल था। वह देखने में बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेश से युक्त था। उसने खून से भीगा और चरबी से गीला व्याघ्र चर्म पहन रखा था। समस्त प्राणियों को त्रास पहुँचाने वाला वह राक्षस यमराज के समान मुँह बाये खड़ा था। 

वह एक लोहे के शूल में तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस चितकबरे हिरण और दाँतों सहित एक बहुत बड़ा हाथी का मस्तक, जिसमें चर्बी लिपटी हुई थी, गाँथकर जोर-जोर से दहाड़ रहा था। श्रीराम, लक्ष्मण और मिथिलेशकुमारी सीता को देखते ही वह क्रोध में भरकर भैरव नाद करके पृथ्वी को कम्प करता हुआ उन सबकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे प्राणान्तकारी काल प्रजा की ओर अग्रसर होता है।

वह विदेहनन्दिनी सीता को गोद में ले कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। फिर उन दोनों भाइयों से बोला - तुम दोनों जटा और चीर धारण करके भी स्त्री के साथ रहते हो और हाथ में धनुष-बाण और तलवार लिये दण्डक वन में घुस हुए हो; अत: जान पड़ता है, तुम्हारा जीवन क्षीण हो चला है। तुम दोनों तो तपस्वी जान पड़ते हो, फिर तुम्हारा युवती स्त्री के साथ रहना कैसे सम्भव हुआ? अधर्मपरायण, पापी तथा मुनिसमुदाय को कलङ्कित करने वाले तुम दोनों कौन हो ? मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियों के मांस का भक्षण करता हुआ हाथ में अस्त्र-शस्त्र लिये इस दुर्गम वन में विचरता रहता हूँ। यह स्त्री बड़ी सुन्दरी है, अत: मेरी भार्या बनेगी और तुम दोनों पापियों का मैं युद्धस्थल में रक्त पान करूंगा।'  

दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं। 

शुभलक्षणा सीता को सहसा विराध के चंगुल में फँसी देख श्रीरामचन्द्रजी सूखते हुए मुँह से लक्ष्मण को सम्बोधित करके बोले – सौम्य ! देखो तो सही, महाराज जनक की पुत्री और मेरी सती - साध्वी पत्नी सीता विराध के अङ्क में विवशतापूर्वक जा पहुँची हैं। अत्यन्त सुख में पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीता की यह अवस्था! (हाय ! कितने कष्ट की बात है!) लक्ष्मण! वन में हमारे लिये जिस दुःख की प्राप्ति माता कैकेयी को अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया। 

'तभी तो वह दूरदर्शिनी माता कैकेयी अपने पुत्र के लिये केवल राज्य लेकर नहीं संतुष्ट हुई थी। जिसने समस्त प्राणियों के लिये प्रिय होने पर भी मुझे वन में भेज दिया, वह मेरी मझली माता कैकेयी आज इस समय सफलमनोरथ हुई है। (अर्थात  उन्होंने राक्षसों के अंत के लिए ही यह स्वांग रचा था)। विदेहनन्दिनी का दूसरा कोई स्पर्श कर ले, इससे बढ़कर दुःख की बात मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। सुमित्रानन्दन! पिताजी की मृत्यु तथा अपने राज्य के अपहरण से भी उतना कष्ट मुझे नहीं हुआ था, जितना अब हुआ है।' 

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर शोक के आँसू बहाते हुए लक्ष्मण कुपित हो मन्त्र से अवरुद्ध हुए सर्प की भाँति फुफकारते हुए बोले - ककुत्स्थकुलभूषण! आप इन्द्र के समान समस्त प्राणियों के स्वामी एवं संरक्षक हैं। मुझ दास के रहते हुए आप किसलिये अनाथ की भाँति संतप्त हो रहे हैं ? मैं अभी कुपित होकर अपने बाण से इस राक्षस का वध करता हूँ। आज यह पृथ्वी मेरे द्वारा मारे गये प्राणशून्य विराध का रक्त पीयेगी। राज्य की इच्छा रखने वाले भरत पर मेरा जो क्रोध प्रकट हुआ था, उसे आज मैं विराध पर छोडूंगा। जैसे वज्रधारी इन्द्र पर्वत पर अपना वज्र छोड़ते हैं। मेरी भुजाओं के बल के वेग से वेगवान् होकर छूटा हुआ मेरा महान् बाण आज विराध के विशाल वक्ष:स्थल पर गिरे। इसके शरीर से प्राणों को अलग करे। तत्पश्चात् यह विराध चक्कर खाता हुआ पृथ्वी पर पड़ जाय। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-५(5) समाप्त !

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...