उन महर्षि के अनुचित वध का स्मरण करके धर्मात्मा रघुकुलनरेश ने अपने पुत्र के लिये विलाप करते हुए ही रानी कौशल्या से इस प्रकार कहा - देवी! अनजान में यह महान् पाप कर डालने के कारण मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं। मैं अकेला ही बुद्धि लगाकर सोचने लगा, अब किस उपाय से मेरा कल्याण हो?
‘तदनन्तर उस घड़े को उठाकर मैंने सरयू के उत्तम जल से भरा और उसे लेकर मुनिकुमार के बताये हुए मार्ग उनके आश्रम पर गया। वहाँ पहुँचकर मैंने उनके दुबले, अन्धे और बूढ़े माता- पिता को देखा, जिनका दूसरा कोई सहायक नहीं था। उनकी अवस्था पंख कटे हुए दो पक्षियों के समान थी। वे अपने पुत्र की ही चर्चा करते हुए उसके आने की आशा लगाये बैठे थे। उस चर्चा के कारण उन्हें कुछ परिश्रम या थकावट का अनुभव नहीं होता था। यद्यपि मेरे कारण उनकी वह आशा धूल में मिल चुकी थी तो भी वे उसी के आसरे बैठे थे। अब वे दोनों सर्वथा अनाथ से हो गये थे। मेरा हृदय पहले से ही शोक के कारण घबराया हुआ था। भय से मेरा होश ठिकाने नहीं था। मुनि के आश्रम पर पहुँचकर मेरा वह शोक और भी अधिक हो गया।'
'मेरे पैरों की आहट सुनकर वे मुनि इस प्रकार बोले - "बेटा! देर क्यों लगा रहे हो ? शीघ्र पानी ले आओ। तात! जिस कारण से तुमने बड़ी देर तक जल में क्रीड़ा की है, उसी कारण को लेकर तुम्हारी यह माता तुम्हारे लिये उत्कण्ठित हो गयी है; अतः शीघ्र ही आश्रम के भीतर प्रवेश करो। बेटा! तात! यदि तुम्हारी माता ने अथवा मैंने तुम्हारा कोई अप्रिय किया हो तो उसे तुम्हें अपने मन में नहीं लाना चाहिये; क्योंकि तुम तपस्वी हो। हम असहाय हैं, तुम्हीं हमारे सहायक हो। हम अन्धे हैं, तुम्हीं हमारे नेत्र हो। हमलोगों के प्राण तुम्हीं में अटके हुए हैं। बताओ, तुम बोलते क्यों नहीं हो?"
'मुनि को देखते ही मेरे मन में भय सा समा गया। मेरी जबान लड़खड़ाने लगी। कितने अक्षरों का उच्चारण नहीं हो पाता था। इस प्रकार अस्पष्ट वाणी में मैंने बोलने का प्रयास किया। मानसिक भय को बाहरी चेष्टाओं से दबाकर मैंने कुछ कहने की क्षमता प्राप्त की और मुनि पर पुत्र की मृत्यु से जो संकट आ पड़ा था, वह उनपर प्रकट करते हुए कहा – महात्मन्! मैं आपका पुत्र नहीं, दशरथ नाम का एक क्षत्रिय हूँ। मैंने अपने कर्मवश यह ऐसा दुःख पाया है, जिसकी सत्पुरुषों ने सदा निन्दा की है।'
'भगवन्! मैं धनुष-बाण लेकर सरयू के तट पर आया था। मेरे आने का उद्देश्य यह था कि कोई जंगली हिंसक पशु अथवा हाथी घाट पर पानी पीने के लिये आवे तो मैं उसे मारूँ। थोड़ी देर बाद मुझे जल में घड़ा भरने का शब्द सुनायी पड़ा। मैंने समझा कोई हाथी आकर पानी पी रहा है, इसलिये उस पर बाण चला दिया। फिर सरयू के तट पर जाकर देखा कि मेरा बाण एक तपस्वी की छाती में लगा है और वे मृतप्राय होकर धरती पर पड़े हैं।'
'उस बाण से उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी, अतः उस समय उन्हीं के कहने से मैंने सहसा वह बाण उनके मर्म - स्थान से निकाल दिया। बाण निकलने के साथ ही वे तत्काल स्वर्ग सिधार गये। मरते समय उन्होंने आप दोनों पूजनीय अंधे पिता-माता के लिये बड़ा शोक और विलाप किया था। इस प्रकार अनजान में मेरे हाथ से आपके पुत्र का वध हो गया है। ऐसी अवस्था मे मेरे प्रति जो शाप या अनुग्रह शेष हो, उसे देने के लिये आप महर्षि मुझपर प्रसन्न हों।'
‘मैंने अपने मुँह से अपना पाप प्रकट कर दिया था, इसलिये मेरी क्रूरता से भरी हुई वह बात सुनकर भी वे पूज्यपाद महर्षि मुझे कठोर दण्ड-भस्म हो जाने का शाप नहीं दे सके। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली और वे शोक से मूर्च्छित होकर दीर्घ निःश्वास लेने लगे। मैं हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा था।'
'उस समय उन महातेजस्वी मुनि ने मुझसे कहा - “राजन् ! यदि यह अपना पापकर्म तुम स्वयं यहाँ आकर न बताते तो शीघ्र ही तुम्हारे मस्तक के सैकड़ों-हजारों टुकड़े हो जाते। नरेश्वर! यदि क्षत्रिय जान-बूझकर विशेषत: किसी वानप्रस्थी का वध कर डाले तो वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, वह उसे अपने स्थान से भ्रष्ट कर देता है।"
“तपस्या में लगे हुए वैसे ब्रह्मवादी मुनि पर जान-बूझकर शस्त्र का प्रहार करने वाले पुरुष के मस्तक के सात टुकड़े हो जाते हैं। तुमने अनजान में यह पाप किया है, इसीलिये अभी तक जीवित हो। यदि जान-बूझकर किया होता तो समस्त रघुवंशियों का कुल ही नष्ट हो जाता, अकेले तुम्हारी तो बात ही क्या है? "
‘उन्होंने मुझसे यह भी कहा – 'नरेश्वर ! तुम हम दोनों को उस स्थान पर ले चलो, जहाँ हमारा पुत्र मरा पड़ा है। इस समय हम उसे देखना चाहते हैं। यह हमारे लिये उसका अन्तिम दर्शन होगा।'
‘तब मैं अकेला ही अत्यन्त दुःख में पड़े हुए उन दम्पति को उस स्थान पर ले गया, जहाँ उनका पुत्र काल के अधीन होकर पृथ्वी पर अचेत पड़ा था। उसके सारे अङ्ग खून से लथपथ हो रहे थे, मृग चर्म और वस्त्र बिखरे पड़े थे। मैंने पत्नी सहित मुनि को उनके पुत्र के शरीर का स्पर्श कराया। वे दोनों तपस्वी अपने उस पुत्र का स्पर्श करके उसके अत्यन्त निकट जाकर उसके शरीर पर गिर पड़े। फिर पिता ने पुत्र को सम्बोधित करके उससे कहा -
“बेटा! आज तुम मुझे न तो प्रणाम करते हो और न मुझसे बोलते ही हो। तुम धरती पर क्यों सो रहे हो? क्या तुम हमसे रूठ गये हो? बेटा! यदि मैं तुम्हारा प्रिय नहीं हूँ तो तुम अपनी इस धर्मात्मा माता की ओर तो देखो। तुम इसके हृदय से क्यों नहीं लग जाते हो? वत्स! कुछ तो बोलो। अब पिछली रात में मधुर स्वर से शास्त्र या पुराण आदि अन्य किसी ग्रन्थ का विशेष रूप से स्वाध्याय करते हुए किसके मुँह से मैं मनोरम शास्त्र चर्चा सुनूँगा?"
“अब कौन स्नान, संध्योपासना तथा अग्निहोत्र करके मेरे पास बैठकर पुत्रशोक के भय से पीड़ित हुए मुझ बूढ़े को सान्त्वना देता हुआ मेरी सेवा करेगा? अब कौन ऐसा है, जो कन्द, मूल और फल लाकर मुझ अकर्मण्य, अन्नसंग्रह से रहित और अनाथ को प्रिय अतिथि की भाँति भोजन करायेगा। बेटा! तुम्हारी यह तपस्विनी माता अन्धी, बूढ़ी, दीन तथा पुत्र के लिये उत्कण्ठित रहने वाली है। मैं स्वयं अन्धा होकर इसका भरण-पोषण कैसे करूँगा?"
“पुत्र! ठहरो, आज यमराज के घर न जाओ। कल मेरे और अपनी माता के साथ चलना। हम दोनों शोक से आर्त, अनाथ और दीन हैं। तुम्हारे न रहने पर हम शीघ्र ही यमलोक की राह लेंगे। तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराज का दर्शन करके मैं उनसे यह बात कहूँगा - धर्मराज मेरे अपराध को क्षमा करें और मेरे पुत्र को छोड़ दें, जिससे यह अपने माता-पिता का भरण-पोषण कर सके। ये धर्मात्मा हैं, महायशस्वी लोकपाल हैं। मुझ जैसे अनाथ को वह एक बार अभय दान दे सकते हैं।"
“बेटा! तुम निष्पाप हो, किंतु एक पापकर्मा क्षत्रिय ने तुम्हारा वध किया है, इस कारण मेरे सत्य के प्रभाव से तुम शीघ्र ही उन लोकों में जाओ, जो अस्त्रयोधी शूरवीरों को प्राप्त होते हैं। बेटा! युद्ध में पीठ न दिखाने वाले शूरवीर सम्मुख युद्ध में मारे जाने पर जिस गति को प्राप्त होते हैं, उसी उत्तम गति को तुम भी जाओ।"
"वत्स! राजा सगर, शैब्य, दिलीप, जनमेजय, नहुष और धुन्धुमार जिस गति को प्राप्त हुए हैं, वही तुम्हें भी मिले। स्वाध्याय और तपस्या से समस्त प्राणियों के आश्रयभूत जिस परब्रह्म की प्राप्ति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो। वत्स! भूमिदाता, अग्निहोत्री, एकपत्नीव्रती, एक हजार गौओं का दान करने वाले, गुरु की सेवा करनेवाले तथा महाप्रस्थान आदि के द्वारा देहत्याग करने वाले पुरुषों को जो गति मिलती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो। हम-जैसे तपस्वियों के इस कुल में पैदा हुआ कोई पुरुष बुरी गति को नहीं प्राप्त हो सकता। बुरी गति तो उसकी होगी, जिसने मेरे बान्धवरूप तुम्हें अकारण मारा है?"
'इस प्रकार वे दीनभाव से बारम्बार विलाप करने लगे। तत्पश्चात् अपनी पत्नी के साथ वे पुत्र को जलाञ्जलि देने के कार्य में प्रवृत्त हुए। इसी समय वह धर्मज्ञ मुनिकुमार अपने पुण्य कर्मों के प्रभाव से दिव्य रूप धारण करके शीघ्र ही इन्द्र के साथ स्वर्ग को जाने लगा। इन्द्र सहित उस तपस्वी ने अपने दोनों बूढ़े पिता-माता को एक मुहूर्त तक आश्वासन देते हुए उनसे बातचीत की; फिर वह अपने पिता से बोला – “मैं आप दोनों की सेवा से महान् स्थान को प्राप्त हुआ हूँ, अब आप लोग भी शीघ्र ही मेरे पास आ जाइयेगा।" 'यह कहकर वह जितेन्द्रिय मुनिकुमार उस सुन्दर आकार वाले दिव्य विमान से शीघ्र ही देवलोक को चला गया।'
‘तदनन्तर पत्नीसहित उन महातेजस्वी तपस्वी मुनि ने तुरंत ही पुत्र को जलाञ्जलि देकर हाथ जोड़े खड़े हुए मुझसे कहा – "राजन्! तुम आज ही मुझे भी मार डालो; अब मरने में मुझे कष्ट नहीं होगा। मेरे एक ही बेटा था, जिसे तुमने अपने बाण का निशाना बनाकर मुझे पुत्रहीन कर दिया। तुमने अज्ञानवश जो मेरे बालक की हत्या की है, उसके कारण मैं तुम्हें भी अत्यन्त भयंकर एवं भलीभाँति दु:ख देनेवाला शाप दूँगा।"
"राजन्! इस समय पुत्र के वियोग से मुझे जैसा कष्ट हो रहा है, ऐसा ही तुम्हें भी होगा। तुम भी पुत्रशोक से ही काल के गाल में जाओगे। नरेश्वर! क्षत्रिय होकर अनजान में तुमने वैश्यजातीय मुनि का वध किया है, इसलिये शीघ्र ही तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप तो नहीं लगेगा तथापि जल्दी ही तुम्हें भी ऐसी ही भयानक और प्राण लेने वाली अवस्था प्राप्त होगी। ठीक उसी तरह, जैसे दक्षिणा देनेवाले दाता को उसके अनुरूप फल प्राप्त होता है। "
'इस प्रकार मुझे शाप देकर वे बहुत देर तक करुणाजनक विलाप करते रहे ; फिर वे दोनों पति-पत्नी अपने शरीरों को जलती हुई चिता में डालकर स्वर्ग को चले गये। देवी! इस प्रकार बालस्वभाव के कारण मैंने पहले शब्दवेधी बाण मारकर और फिर उस मुनि के शरीर से बाण को खींचकर जो उनका वधरूपी पाप किया था, वह आज इस पुत्रवियोग की चिन्ता में पड़े हुए मुझे स्वयं ही स्मरण हो आया है।
'देवी! अपथ्य वस्तुओं के साथ अन्नरस ग्रहण कर लेने पर जैसे शरीर में रोग पैदा हो जाता है, उसी प्रकार यह उस पापकर्म का फल उपस्थित हुआ है। अतः कल्याणि ! उन उदार महात्मा का शापरूपी वचन इस समय मेरे पास फल देने के लिये आ गया है।'
ऐसा कहकर वे भूपाल मृत्यु के भय से त्रस्त हो अपनी पत्नी से रोते हुए बोले - 'कौशल्ये! अब मैं पुत्रशोक से अपने प्राणों का त्याग करूँगा। इस समय मैं तुम्हें अपनी आँखों से देख नहीं पाता हूँ; तुम मेरा स्पर्श करो। जो मनुष्य यमलोक जानेवाले (मरणासन्न ) होते हैं, वे अपने बान्धवजनों को नहीं देख पाते हैं। यदि श्रीराम आकर एक बार मेरा स्पर्श करें अथवा यह धनवैभव और युवराज पद स्वीकार कर लें तो मेरा विश्वास है कि मैं जी सकता हूँ।'
'देवी! मैंने श्रीराम के साथ जो बर्ताव किया है, वह मेरे योग्य नहीं था; परंतु श्रीराम ने मेरे साथ जो व्यवहार किया है, वह सर्वथा उन्हीं के योग्य है। कौन बुद्धिमान् पुरुष इस भूतल पर अपने दुराचारी पुत्र का भी परित्याग कर सकता है? एक मैं हूँ, जिसने अपने धर्मात्मा पुत्र को त्याग दिया तथा कौन ऐसा पुत्र है, जिसे घर से निकाल दिया जाये और वह पिता को कोसे तक नहीं? परंतु श्रीराम चुपचाप चले गये। उन्होंने मेरे विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा।'
‘कौशल्ये! अब मेरी आँखें तुम्हें नहीं देख पाती हैं, स्मरण शक्ति भी लुप्त होती जा रही है। उधर देखो, ये यमराज के दूत मुझे यहाँ से ले जाने के लिये उतावले हो उठे हैं। इससे बढ़कर दु:ख मेरे लिये और क्या हो सकता है कि मैं प्राणान्त के समय सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ राम का दर्शन नहीं पा रहा हूँ। जिनकी समता करनेवाला संसार में दूसरा कोई नहीं है, उन प्रिय पुत्र श्रीराम के न देखने का शोक मेरे प्राणों को उसी तरह सुखाये डालता है, जैसे धूप थोड़े-से जल को शीघ्र सुखा देती है।'
'वे मनुष्य नहीं देवता हैं, जो आपके पंद्रहवें वर्ष वन से लौटने पर श्रीराम का सुन्दर मनोहर कुण्डलों से अलंकृत मुख देखेंगे। जो कमल के समान नेत्र, सुन्दर भौंहें, स्वच्छ दाँत और मनोहर नासिका से सुशोभित श्रीराम के चन्द्रोपम मुख का दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं। जो मेरे श्रीराम के शरच्चन्द्रसदृश मनोहर और प्रफुल्ल कमल के समान सुवासित मुख का दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं। जैसे मूढ़ता आदि अवस्थाओं को त्यागकर अपने उच्च मार्ग में स्थित शुक्र का दर्शन करके लोग सुखी होते हैं, उसी प्रकार वनवास की अवधि पूरी करके पुनः अयोध्या में लौटकर आये हुए श्रीराम को जो लोग देखेंगे वे ही सुखी होंगे।'
कौशल्याजी ने राजा को बहुत दुःखी देखकर अपने हृदय में जान लिया कि अब सूर्यकुल का सूर्य अस्त हो चला! तब श्री रामचन्द्रजी की माता कौशल्या हृदय में धीरज धरकर समय के अनुकूल वचन बोलीं - हे नाथ! आप मन में समझ कर विचार कीजिए कि श्री रामचन्द्र का वियोग अपार समुद्र है। अयोध्या जहाज है और आप उसके कर्णधार (खेने वाले) हैं। सब प्रियजन (कुटुम्बी और प्रजा) ही यात्रियों का समाज है, जो इस जहाज पर चढ़ा हुआ है। आप धीरज धरिएगा, तो सब पार पहुँच जाएँगे। नहीं तो सारा परिवार डूब जाएगा। हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदय में धारण कीजिएगा तो श्री राम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे।
प्रिय पत्नी कौशल्या के कोमल वचन सुनते हुए राजा ने दीन अवस्था में कहा - कौशल्ये! मेरे चित्त पर मोह छा रहा है, हृदय विदीर्ण-सा हो रहा है, इन्द्रियों से संयोग होने पर भी मुझे शब्द, स्पर्श और रस आदि विषयों का अनुभव नहीं हो रहा है। जैसे तेल समाप्त हो जाने पर दीपक की अरुण प्रभा विलीन हो जाती है, उसी प्रकार चेतना के नष्ट होने से मेरी सारी इन्द्रियाँ ही नष्ट हो चली हैं। जिस प्रकार नदी का वेग अपने ही किनारे को काट गिराता है, उसी प्रकार मेरा अपना ही उत्पन्न किया हुआ शोक मुझे वेगपूर्वक अनाथ और अचेत किये दे रहा है।
'हा महाबाहु रघुनन्दन ! हा मेरे कष्टों को दूर करने वाले श्रीराम ! हा पिता के प्रिय पुत्र ! हा मेरे नाथ! हा मेरे बेटे ! तुम कहाँ चले गये ? हा कौशल्ये! अब मुझे कुछ नहीं दिखायी देता। हा तपस्विनि सुमित्रे ! अब मैं इस लोक से जा रहा हूँ। हा मेरी शत्रु, क्रूर, कुलाङ्गार कैकेयी ! तेरी कुटिल इच्छा पूरी हुई।
(स्रोत : श्रीरामचरितमानस) चौपाई
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥
अर्थ: राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्री राम के विरह में शरीर त्याग कर सुरलोक को सिधार गए।
इस प्रकार श्रीराम-माता कौशल्या और सुमित्रा के निकट शोकपूर्ण विलाप करते हुए राजा दशरथ के जीवन का अन्त हो गया। अपने प्रिय पुत्र के वनवास से शोकाकुल हुए राजा दशरथ इस प्रकार दीनतापूर्ण वचन कहते हुए आधी रात बीतते-बीतते अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो गये और उसी समय उन उदारदर्शी नरेश ने अपने प्राणों को त्याग दिया।

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