प्रजाजनों को आनन्द प्रदान करने वाले पुरुषों में श्रेष्ठ धर्मपरायण श्रीराम के वन में चले जाने पर आर्त होकर रोती हुई कौशल्या ने अपने पति से इस प्रकार कहा - महाराज! यद्यपि तीनों लोकों में आपका महान् यश फैला हुआ है, सब लोग यही जानते हैं कि रघुकुलनरेश दशरथ बड़े दयालु, उदार और प्रिय वचन बोलने वाले हैं। नरेशों में श्रेष्ठ आर्यपुत्र! तथापि आपने इस बात का विचार नहीं किया कि सुख में पले हुए आपके वे दोनों पुत्र सीता के साथ वनवास का कष्ट कैसे सहन करेंगे। वह सोलह-अठारह वर्षों की सुकुमारी तरुणी मिथिलेशकुमारी सीता, जो सुख भोगने के ही योग्य है, वन में सर्दी- गरमी का दुःख कैसे सहेगी?
'विशाललोचना सीता सुन्दर व्यञ्जनों से युक्त सुन्दर स्वादिष्ट अन्न भोजन किया करती थी, अब वह जंगल की तिन्नी के चावल का सूखा भात कैसे खायेगी ? जो माङ्गलिक वस्तुओं से सम्पन्न रहकर सदा गीत और वाद्य की मधुर ध्वनि सुना करती थी, वही जंगल में मांसभक्षी सिंहों का अशोभन (अमङ्गलकारी) शब्द कैसे सुन सकेगी? जो इन्द्रध्वज के समान समस्त लोकों के लिये उत्सव प्रदान करनेवाले थे, वे महाबली, महाबाहु श्रीराम अपनी परिघ जैसी मोटी बाँह का तकिया लगाकर कहाँ सोते होंगे?'
'जिसकी कान्ति कमल के समान है, जिसके ऊपर सुन्दर केश शोभा पाते हैं, जिसकी प्रत्येक साँस से कमल की-सी सुगन्ध निकलती है तथा जिसमें विकसित कमल के सदृश सुन्दर नेत्र सुशोभित होते हैं, श्रीराम के उस मनोहर मुख को मैं कब देखूँगी ? मेरा हृदय निश्चय ही लोहे का बना हुआ है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि श्रीराम को न देखने पर भी मेरे इस हृदय के सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते हैं।'
‘आपने यह बड़ा ही निर्दयतापूर्ण कर्म किया है कि बिना कुछ सोच विचार किये मेरे बान्धवों को कैकेयी के कहने से निकाल दिया है, जिसके कारण वे सुख भोगने के योग्य होने पर भी दीन होकर वन में दौड़ रहे हैं। यदि पंद्रहवें वर्ष में श्रीरामचन्द्र पुनः वन से लौटें तो भरत उनके लिये राज्य और खजाना छोड़ देंगे, ऐसी सम्भावना नहीं दिखायी देती।'
‘कहते हैं, कुछ लोग श्राद्ध में पहले अपने बान्धवों (दौहित्र आदि) - को ही भोजन करा देते हैं, उसके बाद कृतकृत्य होकर निमन्त्रित श्रेष्ठ ब्राह्मणों की ओर ध्यान देते हैं। परंतु वहाँ जो गुणवान् एवं विद्वान् देवतुल्य उत्तम ब्राह्मण होते हैं, वे पीछे अमृत भी परोसा गया हो तो उसको स्वीकार नहीं करते हैं। यद्यपि पहली पंक्ति में भी ब्राह्मण ही भोजन करके उठे होते हैं, तथापि जो श्रेष्ठ और विद्वान् ब्राह्मण हैं, वे अपमान के भय से उस भुक्तशेष अन्न को उसी तरह ग्रहण नहीं कर पाते जैसे अच्छे बैल अपने सींग कटाने को नहीं तैयार होते हैं।
‘महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ और श्रेष्ठ भ्राता अपने छोटे भाई के भोगे हुए राज्य को कैसे ग्रहण करेंगे? वे उसका तिरस्कार (त्याग) क्यों नहीं कर देंगे ? जैसे बाघ गीदड़ आदि दूसरे जन्तुओं के लाये या खाये हुए भक्ष्य पदार्थ (शिकार) को खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीराम दूसरों के चाटे या भोगे हुए राज्य भोग को नहीं स्वीकार करेंगे।'
'हविष्य, घृत, पुरोडाश, कुश और खदिर (खैर) - के यूप ये एक यज्ञके उपयोग में आ जाने पर ‘यातयाम' (उपभुक्त) हो जाते हैं; इसलिये विद्वान् इनका फिर दूसरे यज्ञ में उपयोग नहीं करते हैं। इसी प्रकार नि:सार सुरा और भुक्तावशिष्ट यज्ञसम्बन्धी सोमरस की भाँति इस भोगे हुए राज्य को श्रीराम नहीं ग्रहण कर सकते। जैसे बलवान् शेर किसी के द्वारा अपनी पूँछ का पकड़ा जाना नहीं सह सकता, उसी प्रकार श्रीराम ऐसे अपमान को नहीं सह सकेंगे।'
'समस्त लोक एक साथ होकर यदि महासमर में आ जाये तो भी वे श्रीरामचन्द्रजी के मन में भय उत्पन्न नहीं कर सकते, तथापि इस तरह राज्य लेने में अधर्म मानकर उन्होंने इस पर अधिकार नहीं किया। जो धर्मात्मा समस्त जगत को धर्म में लगाते हैं, वे स्वयं अधर्म कैसे कर सकते हैं? वे महापराक्रमी महाबाहु श्रीराम अपने सुवर्णभूषित बाणों द्वारा सारे समुद्रों को भी उसी प्रकार दग्ध कर सकते हैं, जैसे संवर्तक अग्निदेव प्रलयकाल में सम्पूर्ण प्राणियों को भस्म कर डालते हैं।'
‘सिंह के समान बल और बैल के समान बड़े-बड़े नेत्रवाला वैसा नरश्रेष्ठ वीर पुत्र स्वयं अपने पिता के ही हाथों द्वारा मारा गया (राज्य से वञ्चित कर दिया गया)। ठीक उसी तरह, जैसे मत्स्य का बच्चा अपने पिता मत्स्य के द्वारा ही खा लिया जाता है। आपके द्वारा धर्मपरायण पुत्र को देशनिकाला दे दिया गया, अतः यह प्रश्न उठता है कि सनातन ऋषियों ने वेद में जिसका साक्षात्कार किया है तथा श्रेष्ठ द्विज जिसे अपने आचरण में लाये हैं, वह धर्म आपकी दृष्टि में सत्य है या नहीं।'
‘राजन्! नारी के लिये एक सहारा उसका पति है, दूसरा उसका पुत्र है तथा तीसरा सहारा उसके पिताभाई आदि बन्धु बान्धव हैं, चौथा कोई सहारा उसके लिये नहीं है। इन सहारों में से आप तो मेरे हैं ही नहीं क्योंकि आप सौत के अधीन हैं। दूसरा सहारा श्रीराम हैं, जो वन में भेज दिये गये और बन्धु-बान्धव भी दूर हैं। अतः तीसरा सहारा भी नहीं रहा। आपकी सेवा छोड़कर मैं श्रीराम के पास वन में जाना नहीं चाहती हूँ, इसलिये सर्वथा आपके द्वारा मारी ही गयी।'
'आपने श्रीराम को वन में भेजकर इस राष्ट्र का तथा आस-पास के अन्य राज्यों का भी नाश कर डाला, मन्त्रियों सहित सारी प्रजा का वध कर डाला। आपके द्वारा पुत्र सहित मैं भी मारी गयी और इस नगर के निवासी भी नष्टप्राय हो गये। केवल आपके पुत्र भरत और पत्नी कैकेयी दो ही प्रसन्न हुए हैं।'
कौशल्या की यह कठोर शब्दों से युक्त वाणी सुनकर राजा दशरथ को बड़ा दुःख हुआ। वे 'हा राम !' कहकर मूर्च्छित हो गये। राजा शोक में डूब गये। फिर उसी समय उन्हें अपने एक पुराने दुष्कर्म का स्मरण हो आया, जिसके कारण उन्हें यह दु:ख प्राप्त हुआ था।
शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराममाता कौशल्या ने जब राजा दशरथ को इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दुःखित होकर बड़ी चिन्ता में पड़ गये। चिन्तित होने के कारण राजा की सारी इन्द्रियाँ मोह से आच्छन्न हो गयीं। तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् शत्रुओं को संताप देनेवाले राजा दशरथ को चेत हुआ।
होश में आने पर उन्होंने गरम-गरम लंबी साँस ली और कौशल्या को बगल में बैठी हुई देख वे फिर चिन्ता में पड़ गये। चिन्ता में पड़े-पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्म का स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलाने वाले नरेश के द्वारा पहले अनजान में बन गया था। उस शोक से तथा श्रीराम के शोक से भी राजा के मन में बड़ी वेदना हुई। उन दोनों ही शोकों से महाराज संतप्त होने लगे।
उन दोनों शोकों से दग्ध होते हुए दु:खी राजा दशरथ नीचे मुँह किये थर-थर काँपने लगे और कौशल्या को मनाने के लिये हाथ जोड़कर बोले - कौशल्ये! मैं तुमसे निहोरा करता हूँ, तुम प्रसन्न हो जाओ। देखो, मैंने ये दोनों हाथ जोड़ लिये हैं। तुम तो दूसरों पर भी सदा वात्सल्य और दया दिखाने वाली हो फिर मेरे प्रति क्यों कठोर हो गयी?
‘देवी! पति गुणवान् हो या गुणहीन, धर्म का विचार करनेवाली सती नारियों के लिये वह प्रत्यक्ष देवता है। तुम तो सदा धर्म में तत्पर रहने वाली और लोक में भले-बुरे को समझनेवाली हो। यद्यपि तुम भी दुःखित हो तथापि मैं भी महान् दु:ख में पड़ा हुआ हूँ, अत: तुम्हें मुझसे कठोर वचन नहीं कहना चाहिये।'
दु:खी हुए राजा दशरथ के मुख से कहे गये उस करुणा जनक वचन को सुनकर कौशल्या अपने नेत्रों से आँसू बहाने लगीं, मानो छत की नाली से नूतन वर्षा का जल गिर रहा हो।
वे अधर्म के भय से रो पड़ीं और राजा के जुड़े हुए कमलसदृश हाथों को अपने सिर से सटाकर घबराहट के कारण शीघ्रतापूर्वक एक-एक अक्षर का उच्चारण करती हुई बोलीं - देव! मैं आपके सामने पृथ्वी पर पड़ी हूँ। आपके चरणों में मस्तक रखकर याचना करती हूँ, आप प्रसन्न हों। यदि आपने उलटे मुझसे ही याचना की, तब तो मैं मारी गयी। मुझसे अपराध हुआ हो तो भी मैं आपसे क्षमा पाने के योग्य हूँ, प्रहार पाने के नहीं। पति अपनी स्त्री के लिये इहलोक और परलोक में भी स्पृहणीय है। इस जगत में जो स्त्री अपने बुद्धिमान् पति के द्वारा मनायी जाती है, वह कुल - स्त्री कहलाने के योग्य नहीं है।
‘धर्मज्ञ महाराज! मैं स्त्री-धर्म को जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि आप सत्यवादी हैं। इस समय मैंने जो कुछ भी न कहने योग्य बात कह दी है, वह पुत्रशोक से पीड़ित होने के कारण मेरे मुख से निकल गयी है। शोक धैर्य का नाश कर देता है। शोक शास्त्रज्ञान को भी लुप्त कर देता है तथा शोक सब कुछ नष्ट कर देता है; अत: शोक के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है। शत्रु के हाथ से अपने ऊपर पड़ा हुआ शस्त्रों का प्रहार सह लिया जा सकता है; परंतु दैववश प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी शोक नहीं सहा जा सकता।'
‘श्रीराम को वन में गये आज पाँच रातें बीत गयीं। मैं यही गिनती रहती हूँ। शोक ने मेरे हर्ष को नष्ट कर दिया है, अतः ये पाँच रात मेरे लिये पाँच वर्षों के समान प्रतीत हुई हैं। श्रीराम का ही चिन्तन करने के कारण मेरे हृदय का यह शोक बढ़ता जा रहा है, जैसे नदियों के वेग से समुद्र का जल बहुत बढ़ जाता है।'
कौशल्या इस प्रकार शुभ वचन कह ही रही थीं कि सूर्य की किरणें मन्द पड़ गयीं और रात्रिकाल आ पहुँचा। देवी कौशल्या की इन बातों से राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही वे श्रीराम के शोक से भी पीड़ित थे। इस हर्ष और शोक की अवस्था में उन्हें नींद आ गयी।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-५७(57) समाप्त !

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