भाग-५४(54) महाराज दशरथ की आज्ञा से सुमंत्र का श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के सन्देश सुनाना


मूर्च्छा दूर होने पर जब राजा को चेत हुआ तब सुस्थिर चित्त होकर उन्होंने श्रीराम का वृत्तान्त सुनने के लिये सारथि सुमन्त्र को सामने बुलाया। 

उस समय सुमन्त्र श्रीराम के ही शोक और चिन्ता में निरन्तर डूबे रहने वाले दु:ख-शोक से व्याकुल महाराज दशरथ के पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये। जैसे जंगल से तुरंत पकड़कर लाया हुआ हाथी अपने यूथपति गजराज का चिन्तन करके लंबी साँस खींचता और अत्यन्त संतप्त तथा अस्वस्थ हो जाता है, उसी प्रकार बूढ़े राजा दशरथ श्रीराम के लिये अत्यन्त संतप्त हो लंबी साँस खींचकर उन्हीं का ध्यान करते हुए अस्वस्थ से हो गये थे। राजा ने देखा, सारथि का सारा शरीर धूल से भर गया है। यह सामने खड़ा है। इसके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और यह अत्यन्त दीन दिखायी देता है। 

उस अवस्था में राजा ने अत्यन्त आर्त होकर राजा ने सुमंत्र को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमी को कुछ सहारा मिल गया हो। मंत्री को स्नेह के साथ पास बैठाकर नेत्रों में जल भरकर राजा पूछने लगे  - हे मेरे प्रेमी सखा! श्री राम की कुशल कहो। बताओ, श्री राम, लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं? उन्हें लौटा लाए हो कि वे वन को चले गए? यह सुनते ही मंत्री के नेत्रों में जल भर आया। 

शोक से व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे- सीता, राम और लक्ष्मण का संदेशा तो कहो। श्री रामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर-करके राजा हृदय में सोच करते हैं और कहते हैं - मैंने राजा होने की बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस (राम) के मन में हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्र के बिछुड़ने पर भी मेरे प्राण नहीं गए, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा ? हे सखा! श्री राम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं, मुझे भी वहीं पहुँचा दो। नहीं तो मैं सत्य भाव से कहता हूँ कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं। 

'आर्य सुमंत्र! धर्मात्मा श्रीराम वृक्ष की जड़ का सहारा ले कहाँ निवास करेंगे? जो अत्यन्त सुख में पले थे, वे मेरे लाड़ले राम वहाँ क्या खायेंगे? सुमन्त्र! जो 'दुःख 'भोगने के योग्य नहीं हैं, उन्हीं श्रीराम को भारी दुःख प्राप्त हुआ है। जो राजोचित शय्या पर शयन करने योग्य हैं, वे राजकुमार श्रीराम अनाथ की भाँति भूमि पर कैसे सोते होंगे?' 

'जिनके यात्रा करते समय पीछे-पीछे पैदलों, रथियों और हाथी सवारों की सेना चलती थी, वे ही श्रीराम निर्जन वन में पहुँचकर वहाँ कैसे निवास करेंगे ? जहाँ अजगर और व्याघ्र - सिंह आदि हिंसक पशु विचरते हैं तथा काले सर्प जिसका सेवन करते हैं, उसी वन का आश्रय लेने वाले मेरे दोनों कुमार सीता के साथ वहाँ कैसे रहेंगे?' 

'सुमन्त्र! परम सुकुमारी तपस्विनी सीता के साथ वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण रथ से उतरकर पैदल कैसे गये होंगे?  सारथे! तुम कृतकृत्य हो गये; क्योंकि जैसे दोनों अश्विनीकुमार मन्दराचल के वन में जाते हैं, उसी प्रकार वन के भीतर प्रवेश करते हुए मेरे दोनों पुत्रों को तुमने अपनी आँखों से देखा है।' 

‘सुमन्त्र! वन में पहुँचकर श्रीराम ने तुमसे क्या कहा? लक्ष्मण ने भी क्या कहा ? तथा मिथिलेशकुमारी सीता ने क्या संदेश दिया? तुम श्रीराम के बैठने, सोने और खाने-पीने से सम्बन्ध रखने वाली बातें बताओ। जैसे स्वर्ग से गिरे हुए राजा ययाति सत्पुरुषों के बीच में उपस्थित होने पर सत्संग के प्रभाव से पुन: सुखी हो गये थे, उसी प्रकार तुम जैसे साधुपुरुष के मुख से पुत्र का वृत्तान्त सुनने से मैं सुखपूर्वक जीवन धारण कर सकूँगा।' 

मंत्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले - महाराज! आप पंडित और ज्ञानी हैं। हे देव! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। आपने सदा साधुओं के समाज की सेवा की है। जन्म-मरण, सुख-दुःख के भोग, हानि-लाभ, प्यारों का मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी! काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह बरबस होते रहते हैं। मूर्ख लोग सुख में हर्षित होते और दुःख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। हे सबके हितकारी (रक्षक)! आप विवेक विचारकर धीरज धरिए और शोक का परित्याग कीजिए। 

राजा बार-बार मंत्री से पूछते हैं - मेरे प्रियतम पुत्रों का संदेशा सुनाओ। हे सखा! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्री राम, लक्ष्मण और सीता को मुझे आँखों दिखा दो। 

महाराज के इस प्रकार पूछने पर सारथि सुमन्त्र ने आँसुओं से रुँधी हुई गद्गद वाणी द्वारा उनसे कहा – महाराज! श्री रामजी का पहला निवास (मुकाम) तमसा के तट पर हुआ, दूसरा गंगातीर पर। सीताजी सहित दोनों भाई उस दिन स्नान करके जल पीकर ही रहे। निषादराज ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर (श्रृंगवेरपुर) में ही बिताई। दूसरे दिन सवेरा होते ही बड़ का दूध मँगवाया और उससे श्री राम-लक्ष्मण ने अपने सिरों पर जटाओं के मुकुट बनाए। 

'तब श्री रामचन्द्रजी के सखा निषादराज ने नाव मँगवाई। पहले प्रिया सीताजी को उस पर चढ़ाकर फिर श्री रघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजी ने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु श्री रामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े। 

मुझे व्याकुल देखकर श्री रामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले- हे तात! पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओर से बार-बार उनके चरण कमल पकड़ना। महाराज! श्रीरामचन्द्रजी ने धर्म का ही निरन्तर पालन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर कहा है - 'सुमंत्र! तुम मेरी ओर से आत्मज्ञानी तथा वन्दनीय मेरे महात्मा पिता के दोनों चरणों में प्रणाम कहना तथा अन्त:पुर में सभी माताओं को मेरे आरोग्य का समाचार देते हुए उनसे विशेष रूप से मेरा यथोचित प्रणाम निवेदन करना।

‘इसके बाद मेरी माता कौशल्या से मेरा प्रणाम करके बताना कि 'मैं कुशल से हूँ और धर्मपालन में सावधान रहता हूँ। फिर उनको मेरा यह संदेश सुनाना कि 'माँ! तुम सदा धर्म में तत्पर रहकर यथासमय अग्निशाला के सेवन (अग्निहोत्र-कार्य) में संलग्न रहना। देवी! महाराज को देवता के समान मानकर उनके चरणों की सेवा करना।' 

'अभिमान' और मान को त्यागकर सभी माताओं के प्रति समान बर्ताव करना — उनके साथ हिल - मिलकर रहना। अम्बे! जिसमें राजा का अनुराग है, उस माता कैकेयी को भी श्रेष्ठ मानकर उसका सत्कार करना। कुमार भरत के प्रति राजोचित बर्ताव करना। राजा छोटी उम्र के हों तो भी वे आदरणीय ही होते हैं - इस राजधर्म को याद रखना।' 

‘कुमार भरत से भी मेरा कुशल- समाचार बताकर उनसे मेरी ओर से कहना - भैया! तुम सभी माताओं के प्रति न्यायोचित बर्ताव करते रहना।  इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले महाबाहु भरत से यह भी कहना चाहिये कि युवराजपद पर अभिषिक्त होने के बाद भी तुम राज्यसिंहासन पर विराजमान पिताजी की रक्षा एवं सेवा में संलग्न रहना। राजा बहुत बूढ़े हो गये हैं - ऐसा मानकर तुम उनका विरोध न करना। उन्हें राजसिंहासन से न उतारना। युवराजपद पर ही प्रतिष्ठित रहकर उनकी आज्ञा का पालन करते हुए ही जीवन-निर्वाह करना।' 

‘फिर उन्होंने नेत्रों से बहुत आँसू बहाते हुए मुझसे भरत से कहने के लिये ही यह संदेश दिया - 'भरत ! मेरी पुत्रवत्सला माता को अपनी ही माता के समान समझना। मुझसे इतना ही कहकर महाबाहु महायशस्वी कमलनयन श्रीराम बड़े वेग से आँसुओं की वर्षा करने लगे। लक्ष्मणजी ने कुछ कठोर वचन कहे, किन्तु श्री रामजी ने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया - हे तात! लक्ष्मण का लड़कपन वहाँ न कहना परंतु लक्ष्मण उस समय अत्यन्त कुपित हो लंबी साँस खींचते हुए बोले - 'सुमन्त्रजी ! किस अपराध के कारण महाराज ने इन राजकुमार श्रीराम को देशनिकाला दे दिया है? राजा ने कैकेयी का आदेश सुनकर झट से उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली। उनका यह कार्य उचित हो या अनुचित, परंतु हम लोगों को उसके कारण कष्ट भोगना ही पड़ता है।' 

‘श्रीराम को वनवास देना कैकेयी के लोभ के कारण हुआ हो अथवा राजा के दिये हुए वरदान के कारण, मेरी दृष्टि में यह सर्वथा पाप ही किया गया है। यह श्रीराम को वनवास देने का कार्य राजा की स्वेच्छाचारिता के कारण किया गया हो अथवा ईश्वर की प्रेरणा से, परंतु मुझे श्रीराम के परित्याग का कोई समुचित कारण नहीं दिखायी देता है।' 

'बुद्धि की कमी अथवा तुच्छता के कारण उचित - अनुचित का विचार किये बिना ही जो यह राम वनवास रूपी शास्त्र विरुद्ध कार्य आरम्भ किया गया है, यह अवश्य ही निन्दा और दुःख का जनक होगा। मुझे इस समय महाराज में पिता का भाव नहीं दिखायी देता। अब तो रघुकुलनन्दन श्रीराम ही मेरे भाई, स्वामी, बन्धु-बान्धव तथा पिता हैं।' 

‘जो सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर होने के कारण सब लोगों के प्रिय हैं, उन श्रीराम का परित्याग करके राजा ने जो यह क्रूरतापूर्ण पापकृत्य किया है, इसके कारण अब सारा संसार उनमें कैसे अनुरक्त रह सकता है? (अब उनमें राजोचित गुण कहाँ रह गया है ?) जिनमें समस्त प्रजा का मन रमता है, उन धर्मात्मा श्रीराम को देशनिकाला देकर समस्त लोकों का विरोध करने के कारण अब वे कैसे राजा हो सकेंगे ?

‘महाराज! तपस्विनी जनकनन्दिनी सीता तो लंबी साँस खींचती हुई इस प्रकार निश्चेष्ट खड़ी थीं, मानो उन में भूतका 'आवेश हो गया हो। वे भूली सी जान पड़ती थीं। उन यशस्विनी राजकुमारी ने पहले कभी ऐसा संकट नहीं देखा था। वे पति के ही दुःख से दुःखी होकर रो रही थीं। उन्होंने मुझ से कुछ भी नहीं कहा।' 

‘मुझे इधर आने के लिये उद्यत देख वे सूखे मुँह से पति की ओर देखती हुई सहसा आँसू बहाने लगी थीं। इसी प्रकार लक्ष्मण की भुजाओं से सुरक्षित श्रीराम उस समय हाथ जोड़े खड़े थे। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी। मनस्विनी सीता भी रोती हुई कभी आपके इस रथ की ओर देखती थीं और कभी मेरी ओर।'  

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-५४(54) समाप्त !

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