भाग-५०(50) श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़ाकर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपः प्राप्त पुण्यलोकों का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्रपर्वत को लौट जाना


श्री रामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले - हे नाथ! सुनिए, आप तो स्वभाव से ही सुजान हैं। आप बालक के वचन पर कान न दीजिए (उसे सुना-अनसुना कर दीजिए)। बर्रै और बालक का एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने (लक्ष्मण ने) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ! आपका अपराधी तो मैं हूँ। अतः हे स्वामी! कृपा, क्रोध, वध और बंधन, जो कुछ करना हो, दास की तरह (अर्थात दास समझकर) मुझ पर कीजिए। जिस प्रकार से शीघ्र आपका क्रोध दूर हो। हे मुनिराज! बताइए, मैं वही उपाय करूँ। 

मुनि ने कहा- हे राम! क्रोध कैसे जाए, अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है। इसकी गर्दन पर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या? मेरे जिस कुठार की घोर करनी सुनकर राजाओं की स्त्रियों के गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसे के रहते मैं इस शत्रु राजपुत्र को जीवित देख रहा हूँ। हाथ चलता नहीं, क्रोध से छाती जली जाती है। हाय! राजाओं का घातक यह कुठार भी कुण्ठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदय में किसी समय भी कृपा कैसी? आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है। 

यह सुनकर लक्ष्मणजी ने मुस्कुराकर सिर नवाया और कहा - आपकी कृपा रूपी वायु भी आपकी मूर्ति के अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं, मानो फूल झड़ रहे हैं। हे मुनि ! यदि कृपा करने से आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होने पर तो शरीर की रक्षा विधाता ही करेंगे। 

परशुरामजी ने कहा - हे जनक! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरी में घर निवास करना चाहता है। इसको शीघ्र ही आँखों की ओट क्यों नहीं करते? यह राजपुत्र देखने में छोटा है, पर है बड़ा खोटा। 

लक्ष्मणजी ने हँसकर मन ही मन कहा - आँख मूँद लेने पर कहीं कोई नहीं है। 

तब परशुरामजी हृदय में अत्यन्त क्रोध भरकर श्री रामजी से बोले - अरे शठ! तू शिवजी का धनुष तोड़कर उलटा हमीं को ज्ञान सिखाता है। तेरा यह भाई तेरी ही सम्मति से कटु वचन बोलता है और तू छल से हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्ध में मेरा संतोष कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे। अरे शिवद्रोही! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर। नहीं तो भाई सहित तुझे मार डालूँगा। इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाए बक रहे हैं और श्री रामचन्द्रजी सिर झुकाए मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं। 

श्री रामचन्द्रजी ने मन ही मन कहा - दोष तो लक्ष्मण का और क्रोध मुझ पर करते हैं। कहीं-कहीं सीधेपन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सब लोग किसी की भी वंदना करते हैं, टेढ़े चन्द्रमा को राहु भी नहीं ग्रसता। 

श्री रामचन्द्रजी ने (प्रकट) कहा - हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िए। आपके हाथ में कुठार है और मेरा यह सिर आगे है, जिस प्रकार आपका क्रोध जाए, हे स्वामी! वही कीजिए। मुझे अपना अनुचर (दास) जानिए। स्वामी और सेवक में युद्ध कैसा? हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! क्रोध का त्याग कीजिए। आपका वीरों का सा वेष देखकर ही बालक ने कुछ कह डाला था, वास्तव में उसका भी कोई दोष नहीं है। 

'आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किए देखकर और वीर समझकर बालक को क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश (रघुवंश) के स्वभाव के अनुसार उसने उत्तर दिया। यदि आप मुनि की तरह आते, तो हे स्वामी! बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर रखता। अनजाने की भूल को क्षमा कर दीजिए। ब्राह्मणों के हृदय में बहुत अधिक दया होनी चाहिए।'

'हे नाथ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी? कहिए न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राम मात्र छोटा सा नाम और कहाँ आपका परशुसहित बड़ा नाम। हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता ये नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिए।'

श्री रामचन्द्रजी ने परशुरामजी को बार-बार 'मुनि' और 'विप्रवर' कहा। तब भृगुपति परशुरामजी कुपित होकर (अथवा क्रोध की हँसी हँसकर) बोले - तू भी अपने भाई के समान ही टेढ़ा है। तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुष को सु्रवा, बाण को आहुति और मेरे क्रोध को अत्यन्त भयंकर अग्नि जान। चतुरंगिणी सेना सुंदर समिधाएँ (यज्ञ में जलाई जाने वाली लकड़ियाँ) हैं। बड़े-बड़े राजा उसमें आकर बलि के पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसे से काटकर बलि दिया है। 

'ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किए हैं (अर्थात जैसे मंत्रोच्चारण पूर्वक 'स्वाहा' शब्द के साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार-पुकार कर राजाओं की बलि दी है)। मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसी से तू ब्राह्मण के धोखे मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसार को जीतकर खड़ा है।' 

श्री रामचन्द्रजी ने कहा- हे मुनि! विचारकर बोलिए। आपका क्रोध बहुत बड़ा है और मेरी भूल बहुत छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया। मैं किस कारण अभिमान करूँ? हे भृगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिए, फिर संसार में ऐसा कौन योद्धा है, जिसे हम डर के मारे मस्तक नवाएँ? देवता, दैत्य, राजा या और बहुत से योद्धा, वे चाहे बल में हमारे बराबर हों चाहे अधिक बलवान हों, यदि रण में हमें कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों न हो। 

'क्षत्रिय का शरीर धरकर जो युद्ध में डर गया, उस नीच ने अपने कुल पर कलंक लगा दिया। मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, कुल की प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते। ब्राह्मणवंश की ऐसी ही प्रभुता (महिमा) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है अथवा जो भयरहित होता है, वह भी आपसे डरता है।'  

परशुरामजी ने कहा - राम! ये दो धनुष सबसे श्रेष्ठ और दिव्य थे। सारा संसार इन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता था। साक्षात् विश्वकर्मा ने इन्हें बनाया था। ये बड़े प्रबल और दृढ़ थे। नरश्रेष्ठ! इनमें से एक को देवताओं ने त्रिपुरासुर से युद्ध करने के लिये भगवान् शङ्कर को दे दिया था। ककुत्स्थनन्दन! जिससे त्रिपुर का नाश हुआ था, वह वही धनुष था; जिसे तुमने तोड़ डाला है और दूसरा दुर्धर्ष धनुष यह है, जो मेरे हाथ में है। इसे श्रेष्ठ देवताओं ने भगवान् विष्णु को दिया था। श्रीराम! शत्रुनगरी पर विजय पाने वाला वही यह वैष्णव धनुष है। 

‘ककुत्स्थनन्दन! यह भी शिवजी के धनुष के समान ही प्रबल है। उन दिनों समस्त देवताओं ने भगवान् शिव और विष्णु के बलाबल की परीक्षा के लिये पितामह ब्रह्माजी से पूछा था कि 'इन दोनों देवताओं में कौन अधिक बलशाली है। देवताओं के इस अभिप्राय को जानकर सत्यवादियों में श्रेष्ठ पितामह ब्रह्माजी ने उन दोनों देवताओं (शिव और विष्णु) में विरोध उत्पन्न कर दिया।' 

'विरोध पैदा होने पर एक-दूसरे को जीतने की इच्छा वाले शिव और विष्णु में बड़ा भारी युद्ध हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उस समय भगवान् विष्णु ने हुङ्कारमात्र से शिवजी के भयंकर बलशाली धनुष को शिथिल तथा त्रिनेत्रधारी महादेवजी को भी स्तम्भित कर दिया। तब ऋषि समूहों तथा चारणों सहित देवताओं ने आकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओं से शान्ति के लिये याचना की; फिर वे दोनों वहाँ शान्त हो गये।' 

‘भगवान् विष्णु के पराक्रम से शिवजी के उस धनुष को शिथिल हुआ देख ऋषियों सहित देवताओं ने भगवान् विष्णु को श्रेष्ठ माना। तदनन्तर कुपित हुए महायशस्वी रुद्र ने बाण - सहित अपना धनुष विदेहदेश के राजर्षि देवरात के हाथ में दे दिया। 

'श्रीराम! शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले इस वैष्णवधनुष को भगवान् विष्णु ने भृगुवंशी ऋचीक मुनि को उत्तम धरोहर के रूप में दिया था। फिर महातेजस्वी ऋचीक ने प्रतिशोध की भावना से रहित अपने पुत्र एवं मेरे पिता महात्मा जमदग्नि के अधिकार में यह दिव्य धनुष दे दिया। तपोबल से सम्पन्न मेरे पिता जमदग्नि अस्त्र-शस्त्रों का परित्याग करके जब ध्यानस्थ होकर बैठे थे, उस समय प्राकृत बुद्धि का आश्रय लेने वाले कृतवीर्यकुमार अर्जुन के पुत्रों ने उनको मार डाला। पिता के इस अत्यन्त भयंकर वध का, जो उनके योग्य नहीं था, समाचार सुनकर मैंने रोष पूर्वक बारंबार उत्पन्न 'क्षत्रियों का अनेक बार संहार किया।' 

'श्रीराम! फिर सारी पृथ्वी पर अधिकार करके मैंने एक यज्ञ किया और उस यज्ञ के समाप्त होने पर पुण्यकर्मा महात्मा कश्यप को दक्षिणारूप से यह सारी पृथ्वी दे डाली। पृथ्वी का दान करके मैं महेन्द्रपर्वत पर रहने लगा और वहाँ तपस्या करके तपोबल से सम्पन्न हुआ। वहाँ से शिवजी के धनुष के तोड़े जाने का समाचार सुनकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ।' 

‘श्रीराम! इस प्रकार यह महान् वैष्णव धनुष मेरे पिता - पितामहों के अधिकार में रहता चला आया है; अब तुम क्षत्रियधर्म को सामने रखकर यह उत्तम धनुष हाथ में लो और इस श्रेष्ठ धनुष पर एक ऐसा बाण चढ़ाओ, जो शत्रुनगरी पर विजय पाने में समर्थ हो; यदि तुम ऐसा कर सके तो मैं तुम्हें द्वन्द्व युद्ध का अवसर दूँगा।'

दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने पिता के गौरव का ध्यान रखकर संकोच वश वहाँ कुछ बोल नहीं रहे थे, परंतु जमदग्निकुमार परशुरामजी की उपर्युक्त बात सुनकर उस समय वे मौन न रह सके। उन्होंने परशुरामजी से कहा - भृगुनन्दन ! ब्रह्मन् ! आपने पिता के ऋण से ऊऋण होने की पिता के मारने वाले का वध करके बैर का बदला चुकाने की भावना लेकर जो क्षत्रिय-संहाररूपी कर्म किया है, उसे मैंने सुना है और हमलोग आपके उस कर्म का अनुमोदन भी करते हैं क्योंकि वीर पुरुष वैर का प्रतिशोध लेते ही हैं। 

‘भार्गव! मैं क्षत्रिय धर्म से युक्त हूँ इसीलिये आप ब्राह्मण देवता के समक्ष विनीत रहकर कुछ बोल नहीं रहा हूँ तो भी आप मुझे पराक्रम हीन और असमर्थ सा मानकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। अच्छा, अब मेरा तेज और पराक्रम देखिये। 

ऐसा कहकर शीघ्र पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने कुपित हो परशुरामजी के हाथ से वह उत्तम धनुष और बाण ले लिया (साथ ही उनसे अपनी वैष्णवी शक्ति को भी वापस ले लिया)। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चला गया। तब परशुरामजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ तब उन्होंने श्री रामजी का प्रभाव जाना, जिसके कारण उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया।  

उस धनुष को चढ़ाकर श्रीराम ने उसकी प्रत्यञ्चा पर बाण रखा, फिर कुपित होकर उन्होंने जमदग्निकुमार परशुरामजी से इस प्रकार कहा - भृगुनन्दन! आप ब्राह्मण होने के नाते मेरे पूज्य हैं तथा विश्वामित्रजी के साथ भी आपका सम्बन्ध है। इन सब कारणों से मैं इस प्राण-संहारक बाण को आपके शरीर पर नहीं छोड़ सकता। मेरा विचार है कि आपको जो सर्वत्र शीघ्रतापूर्वक आने-जाने की शक्ति प्राप्त हुई है उसे अथवा आपने अपने तपोबल से जिन अनुपम पुण्यलोकों को प्राप्त किया है उन्हीं को नष्ट कर डालूँ; क्योंकि अपने पराक्रम से विपक्षी के बल के घमंड को चूर कर देनेवाला यह दिव्य वैष्णव बाण, जो शत्रुओं की नगरी पर विजय दिलाने वाला है, कभी निष्फल नहीं जाता है। 

उस समय उस उत्तम धनुष और बाण को धारण करके खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी को देखने के लिये सम्पूर्ण देवता और ऋषि ब्रह्माजी को आगे करके वहाँ एकत्र हो गये। गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, किन्नर, यक्ष, राक्षस और नाग भी उस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखने के लिये वहाँ आ पहुँचे। जब श्रीरामचन्द्रजी ने वह श्रेष्ठ धनुष हाथ में ले लिया, उस समय सब लोग आश्चर्य से जड़वत् हो गये। 

परशुरामजी का वैष्णव तेज निकलकर श्रीरामचन्द्रजी में मिल गया। इसलिये वीर्यहीन हुए जमदग्निकुमार परशुराम ने दशरथनन्दन श्रीराम की ओर देखा। तेज निकल जाने से वीर्यहीन हो जाने के कारण जडवत् बने हुए जमदग्निकुमार परशुराम ने कमलनयन श्रीराम से धीरे-धीरे कहा - रघुनन्दन! पूर्वकाल में मैंने कश्यपजी को जब यह पृथ्वी दान की थी, तब उन्होंने मुझसे कहा था कि 'तुम्हें मेरे राज्य में नहीं रहना चाहिये।' ककुत्स्थकुलनन्दन! तभी से अपने गुरु कश्यपजी की इस आज्ञा का पालन करता हुआ मैं कभी रात में पृथ्वी पर नहीं निवास करता हूँ; क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि मैंने कश्यप के सामने रात को पृथ्वी पर न रहने की प्रतिज्ञा कर रखी है। 

'इसलिये वीर राघव! आप मेरी इस गमनशक्ति को नष्ट न करें। मैं मन के समान वेग से अभी महेन्द्र नामक श्रेष्ठ पर्वत पर चला जाऊँगा। परंतु श्रीराम ! मैंने अपनी तपस्या से जिन अनुपम लोकों पर विजय पायी है, उन्हीं को आप इस श्रेष्ठ बाण से नष्ट कर दें; अब इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये। शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर ! आपने जो इस धनुष को चढ़ा दिया, इससे मुझे निश्चित रूप से ज्ञात हो गया कि आप मधु दैत्य को मारने वाले अविनाशी देवेश्वर विष्णु हैं। आपका कल्याण हो।' 

‘ये सब देवता एकत्र होकर आपकी ओर देख रहे हैं। आपके कर्म अनुपम हैं; युद्ध में आपका सामना करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। ककुत्स्थ कुलभूषण ! आपके सामने जो मेरी असमर्थता प्रकट हुई यह मेरे लिये लज्जाजनक नहीं हो सकती; क्योंकि आप त्रिलोकीनाथ श्रीहरि ने मुझे पराजित किया है। उत्तम व्रत का पालन करनेवाले श्रीराम ! अब आप अपना अनुपम बाण छोड़िये; इसके छूटने के बाद ही मैं श्रेष्ठ महेन्द्र पर्वत पर जाऊँगा।' 

जमदग्निनन्दन परशुरामजी के ऐसा कहने पर प्रतापी दशरथनन्दन श्रीमान् रामचन्द्रजी ने वह उत्तम बाण छोड़ दिया। श्री रघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर और उनके पराक्रम को देखकर परशुरामजी की बुद्धि के परदे खुल गए। 

वे हाथ जोड़कर वचन बोले - प्रेम उनके हृदय में समाता न था - हे रघुकुल रूपी कमल वन के सूर्य! हे राक्षसों के कुल रूपी घने जंगल को जलाने वाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गो का हित करने वाले! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरने वाले! आपकी जय हो। हे विनय, शील, कृपा आदि गुणों के समुद्र और वचनों की रचना में अत्यन्त चतुर! आपकी जय हो। हे सेवकों को सुख देने वाले, सब अंगों से सुंदर और शरीर में करोड़ों कामदेवों की छवि धारण करने वाले! आपकी जय हो।' 

'मैं एक मुख से आपकी क्या प्रशंसा करूँ? हे महादेवजी के मन रूपी मानसरोवर के हंस! आपकी जय हो। मैंने अनजाने में आपको बहुत से अनुचित वचन कहे। हे क्षमा के मंदिर दोनों भाई! मुझे क्षमा कीजिए। हे रघुकुल के पताका स्वरूप श्री रामचन्द्रजी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो।' 

ऐसा कहकर परशुरामजी तप के लिए महेन्द्रपर्वत को चले गए। यह देखकर दुष्ट राजा लोग बिना ही कारण के मनः कल्पित डर से (रामचन्द्रजी से तो परशुरामजी भी हार गए, हमने इनका अपमान किया था, अब कहीं ये उसका बदला न लें, इस व्यर्थ के डर से डर गए) वे कायर चुपके से जहाँ-तहाँ भाग गए। देवताओं ने नगाड़े बजाए, वे प्रभु के ऊपर फूल बरसाने लगे। जनकपुर के स्त्री-पुरुष सब हर्षित हो गए। उनका मोहमय (अज्ञान से उत्पन्न) शूल मिट गया। 

खूब जोर से बाजे बजने लगे। सभी ने मनोहर मंगल साज साजे। सुंदर मुख और सुंदर नेत्रों वाली तथा कोयल के समान मधुर बोलने वाली स्त्रियाँ झुंड की झुंड मिलकर सुंदरगान करने लगीं। जनकजी के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता, मानो जन्म का दरिद्री धन का खजाना पा गया हो! सीताजी का भय जाता रहा, वे ऐसी सुखी हुईं जैसे चन्द्रमा के उदय होने से चकोर की कन्या सुखी होती है। 

जनकजी ने विश्वामित्रजी को प्रणाम किया और कहा - प्रभु ही की कृपा से श्री रामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयों ने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिए। 

मुनि ने कहा- हे चतुर नरेश ! सुनो यों तो विवाह धनुष के अधीन था, धनुष के टूटते ही विवाह हो गया। देवता, मनुष्य और नाग सब किसी को यह मालूम है। तथापि तुम जाकर अपने कुल का जैसा व्यवहार हो, ब्राह्मणों, कुल के बूढ़ों और गुरुओं से पूछकर और वेदों में वर्णित जैसा आचार हो वैसा करो। जाकर अयोध्या को दूत भेजो, जो राजा दशरथ को बुला लावें। 

राजा ने प्रसन्न होकर कहा - हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय दूतों को बुलाकर भेज दिया। 

फिर सब महाजनों को बुलाया और सबने आकर राजा को आदरपूर्वक सिर नवाया। राजा ने कहा - बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगर को चारों ओर से सजाओ।                                                                                                                                                                                                              इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-५०(50) समाप्त !                                    

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