राजसभा से पुरवासियों के चले जाने पर कार्यसिद्धि के योग्य देश - काल के नियम को जानने वाले प्रभावशाली नरेश ने पुन: मन्त्रियों के साथ सलाह करके यह निश्चय किया कि कल ही पुष्य नक्षत्र होगा, अत: कल ही मुझे अपने पुत्र कमलनयन श्रीराम का युवराज के पद पर अभिषेक कर देना चाहिये। तदनन्तर अन्त:पुर में जाकर महाराज दशरथ ने सुमन्त्र को बुलाया और आज्ञा दी - जाओ, श्रीराम को एक बार फिर यहाँ बुला लाओ। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र श्रीराम को शीघ्र बुला लाने के लिये पुन: उनके महल में गये।
द्वारपालों ने श्रीराम को सुमन्त्र के पुनः आगमन की सूचना दी। उनका आगमन सुनते ही श्रीराम के मन में संदेह हो गया। उन्हें भीतर बुलाकर श्रीराम ने उनसे बड़ी उतावली के साथ पूछा - आपको पुन: यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ी? यह पूर्णरूप से बताइये।
तब सुमन्त्र ने उनसे कहा - महाराज आपसे मिलना चाहते हैं। मेरी इस बात को सुनकर वहाँ जाने या न जाने का निर्णय आप स्वयं करें।
सुमन्त्र के यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथ का पुनः दर्शन करने के लिये तुरंत उनके महल की ओर चल दिये। श्रीराम को आया हुआ सुनकर राजा दशरथ ने उनसे प्रिय तथा उत्तम बात कहने के लिये उन्हें महल के भीतर बुला लिया। पिता के भवन में प्रवेश करते ही श्रीमान् रघुनाथजी ने उन्हें देखा और दूर से ही हाथ जोड़कर वे उनके चरणों में पड़ गये।
प्रणाम करते हुए श्रीराम को उठाकर महाराज ने छाती से लगा लिया और उन्हें बैठने के लिये आसन देकर पुनः उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया - श्रीराम! अब मैं बूढ़ा हुआ। मेरी आयु बहुत अधिक हो गयी। मैंने बहुत-से मनोवाञ्छित भोग भोग लिये, अन्न और बहुत-सी दक्षिणाओं से युक्त सैकड़ों यज्ञ भी कर लिये। पुरुषोत्तम! तुम मेरे परम प्रिय अभीष्ट संतान के रूप में प्राप्त हुए जिसकी इस भूमण्डल में कहीं उपमा नहीं है, मैंने दान, यज्ञ और स्वाध्याय भी कर लिये।
‘वीर! मैंने अभीष्ट सुखों का भी अनुभव कर लिया। मैं देवता, ऋषि, पितर और ब्राह्मणों के तथा अपने ऋण से भी उऋण हो गया। अब तुम्हें युवराज-पद पर अभिषिक्त करने के सिवा और कोई कर्तव्य मेरे लिये शेष नहीं रह गया है, अत: मैं तुमसे जो कुछ कहूँ, मेरी उस आज्ञा का तुम्हें पालन करना चाहिये। पुत्र! अब सारी प्रजा तुम्हें अपना राजा बनाना चाहती है, अत: मैं तुम्हें युवराज पद पर अभिषिक्त करूँगा।'
‘रघुकुलनन्दन श्रीराम ! आजकल मुझे बड़े बुरे सपने दिखायी देते हैं। दिन में वज्रपात के साथ-साथ बड़ा भयंकर शब्द करनेवाली उल्काएँ भी गिर रही हैं। श्रीराम! ज्योतिषियों का कहना है कि मेरे जन्म नक्षत्र को सूर्य, मङ्गल और राहु नामक भयंकर ग्रहों ने आक्रान्त कर लिया है। ऐसे अशुभ लक्षणों का प्राकट्य होने पर प्राय: राजा घोर आपत्ति में पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा उसकी मृत्यु भी हो जाती है। अत: रघुनन्दन! जब तक मेरे चित्त में मोह नहीं छा जाता, तब तक ही तुम युवराज-पद पर अपना अभिषेक करा लो; क्योंकि प्राणियों की बुद्धि चञ्चल होती है।'
‘आज चन्द्रमा पुष्य से एक नक्षत्र पहले पुनर्वसु पर विराजमान हैं, अतः निश्चय ही कल वे पुष्यनक्षत्र पर रहेंगे ऐसा ज्योतिषी कहते हैं। इसलिये उस पुष्यनक्षत्र में ही तुम अपना अभिषेक करा लो। शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर ! मेरा मन इस कार्य में बहुत शीघ्रता करने को कहता है। इस कारण कल अवश्य ही मैं तुम्हारा युवराज पद पर अभिषेक कर दूँगा। इसी शीघ्रता के कारण ही मैंने भरत और राजा जनक को इसकी सुचना नहीं दी क्योंकि उन्हें यहाँ आने में बहुत समय लगता।'
‘अत: तुम इस समय से लेकर सारी रात इन्द्रिय संयम पूर्वक रहते हुए वधू सीता के साथ उपवास करो और कुश की शय्या पर सोओ। आज तुम्हारे सुहृद् सावधान रहकर सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें; क्योंकि इस प्रकार के शुभ कार्यों में बहुत-से विघ्न आने की सम्भावना रहती है। जब तक भरत इस नगर से बाहर अपने मामा के यहाँ निवास करते हैं, तब तक ही तुम्हारा अभिषेक हो जाना मुझे उचित प्रतीत होता है।'
‘इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषों के आचार-व्यवहार में स्थित हैं, अपने बड़े भाई का अनुसरण करनेवाले, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय हैं तथापि मनुष्यों का चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता - ऐसा मेरा मत है। रघुनन्दन! धर्मपरायण सत्पुरुषों का मन भी विभिन्न कारणों से राग-द्वेषादि से संयुक्त हो जाता है।'
राजा के इस प्रकार कहने और कल होने वाले राज्याभिषेक के निमित्त व्रतपालन के लिये जाने की आज्ञा देने पर श्रीरामचन्द्रजी पिता को प्रणाम करके अपने महल में गये। राजा ने राज्याभिषेक के लिये व्रतपालन के निमित्त जो आज्ञा दी थी, उसे सीता को बताने के लिये अपने महल के भीतर प्रवेश करके जब श्रीराम ने वहाँ सीता को नहीं देखा, तब वे तत्काल ही वहाँ से निकलकर माता के अन्तःपुर में चले गये।
वहाँ जाकर उन्होंने देखा माता कौशल्या रेशमी वस्त्र पहने मौन हो देवमन्दिर में बैठकर देवता की आराधना में लगी हैं और पुत्र के लिये राजलक्ष्मी की याचना कर रही हैं। श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रिय समाचार सुनकर सुमित्रा और लक्ष्मण वहाँ पहले से ही आ गये थे तथा बाद में सीता वहीं बुला ली गयी थीं। श्रीरामचन्द्रजी जब वहाँ पहुँचे, उस समय भी कौशल्या नेत्र बंद किये ध्यान लगाये बैठी थीं और सुमित्रा, सीता तथा लक्ष्मण उनकी सेवा में खड़े थे। पुष्यनक्षत्र के योग में पुत्र के युवराज पद पर अभिषिक्त होने की बात सुनकर वे उसकी मङ्गलकामना से प्राणायाम के द्वारा परमपुरुष नारायण का ध्यान कर रही थीं।
इस प्रकार नियम में लगी हुई माता के निकट उसी अवस्था में जाकर श्रीराम ने उनको प्रणाम किया और उन्हें हर्ष प्रदान करते हुए यह श्रेष्ठ बात कही - माँ! पिताजी ने मुझे प्रजापालन के कर्म में नियुक्त किया है। कल मेरा अभिषेक होगा। जैसा कि मेरे लिये पिताजी का आदेश है, उसके अनुसार सीता को भी मेरे साथ इस रात में उपवास करना होगा। उपाध्यायों ने ऐसी ही बात बतायी थी, जिसे पिताजी ने मुझसे कहा है। अत: कल होने वाले अभिषेक के निमित्त से आज मेरे और सीता के लिये जो-जो मङ्गलकार्य आवश्यक हों, वे सब कराओ।
चिरकाल से माता के हृदय में जिस बात की अभिलाषा थी, उसकी पूर्ति को सूचित करनेवाली यह बात सुनकर माता कौशल्या ने आनन्द के आँसू बहाते हुए गदगद कण्ठ से इस प्रकार कहा - वत्स श्रीराम! चिरञ्जीवी होओ। तुम्हारे मार्ग में विघ्न डालने वाले शत्रु नष्ट हो जाये। तुम राजलक्ष्मी से युक्त होकर मेरे और सुमित्रा बन्धु बान्धवों को आनन्दित करो। पुत्र! तुम मेरे द्वारा किसी मङ्गलमय नक्षत्र में उत्पन्न हुए थे, जिससे तुमने अपने गुणों द्वारा पिता दशरथ को प्रसन्न कर लिया। बड़े हर्ष की बात है कि मैंने कमलनयन भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये जो व्रत-उपवास आदि किया था, वह आज सफल हो गया। मेरे लाल! उसी के फल से यह इक्ष्वाकुकुल की राजलक्ष्मी तुम्हें प्राप्त होनेवाली है।
माता के ऐसा कहने पर श्रीराम ने विनीतभाव से हाथ जोड़कर खड़े हुए अपने भाई लक्ष्मण की ओर देखकर मुसकुराते हुए से कहा - लक्ष्मण! तुम मेरे साथ इस पृथ्वी के राज्य का शासन (पालन) करो। तुम मेरे द्वितीय अन्तरात्मा हो। यह राजलक्ष्मी तुम्हीं को प्राप्त हो रही है। सुमित्रानन्दन! तुम अभीष्ट भोगों और राज्य के श्रेष्ठ फलों का उपभोग करो। तुम्हारे लिये ही मैं इस जीवन तथा राज्य की अभिलाषा करता हूँ।
लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीराम ने दोनों माताओं को प्रणाम किया और सीता को भी साथ चलने की आज्ञा दिलाकर वे उनको लिये हुए अपने महल में चले गये।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-४(4) समाप्त !

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