रात बीतने और सवेरा होने पर श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर भरद्वाजजी ने कहा - महाबली श्रीराम ! तुम मधुर फल-मूल से सम्पन्न चित्रकूट पर्वत पर जाओ। मैं उसी को तुम्हारे लिये उपयुक्त निवास स्थान मानता हूँ।
उन चारों को प्रस्थान करते देख महर्षि ने उनके लिये उसी प्रकार स्वस्तिवाचन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रों को यात्रा करते देख उनके लिये मंगलसूचक आशीर्वाद देता है।
तदनन्तर महातेजस्वी महामुनि भरद्वाज ने सत्य पराक्रमी श्रीराम से इस प्रकार कहना आरम्भ किया - नरश्रेष्ठ! तुम दोनों भाई गङ्गा, यमुना और सरवती के संगम पर पहुँचकर जिनमें पश्चिममुखी होकर गङ्गा मिली हैं, उन महानदी यमुना के निकट जाना। रघुनन्दन! तदनन्तर गङ्गाजी के जल के वेग से अपने प्रवाह के प्रतिकूल दिशा में मुड़ी हुई यमुना के पास पहुँचकर लोगों के आने-जाने के कारण उनके पदचिह्नों से चिह्नित हुए अवतरण- प्रदेश (पार उतरने के लिये उपयोगी घाट) को अच्छी तरह देख-भालकर वहाँ जाना और एक बेड़ा बनाकर उसी के द्वारा सूर्यकन्या यमुना के उस पार उतर जाना।
'तत्पश्चात् आगे जाने पर एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष मिलेगा, जिसके पत्ते हरे रंग के हैं। वह चारों ओर से बहुसंख्यक दूसरे वृक्षों द्वारा घिरा हुआ है। उस वृक्ष का नाम श्यामवट है। उसकी छाया के नीचे बहुत से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ पहुँचकर सीता दोनों हाथ जोड़कर उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करें। यात्री की इच्छा हो तो उस वृक्ष के पास जाकर कुछ काल तक वहाँ निवास करे अथवा वहाँ से आगे बढ़ जाये।'
'श्यामवट से एक कोस दूर जाने पर तुम्हें नीलवन का दर्शन होगा; वहाँ सल्लकी (चीन) और बेर के भी पेड़ मिले हुए हैं। यमुना के तट पर उत्पन्न हुए बाँसों के कारण वह और भी रमणीय दिखायी देता है। यह वही स्थान है जहाँ से चित्रकूट को रास्ता जाता है। मैं उस मार्ग से कई बार गया हूँ। वहाँ की भूमि कोमल और दृश्य रमणीय है। उधर कभी दावानल का भय नहीं होता है।
फिर उनके साथ के लिए मुनि ने शिष्यों को बुलाया। (साथ जाने की बात) सुनते ही चित्त में हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गए। सभी का श्री रामजी पर अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है। तब मुनि ने (चुनकर) चार ब्रह्मचारियों को साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मों तक सब सुकृत (पुण्य) किए थे। श्री रघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषि की आज्ञा पाकर हृदय में बड़े ही आनंदित होकर चले।
जब वे किसी गाँव के पास होकर निकलते हैं, तब स्त्री-पुरुष दौड़कर उनके रूप को देखने लगते हैं। जन्म का फल पाकर वे (सदा के अनाथ) सनाथ हो जाते हैं और मन को नाथ के साथ भेजकर (शरीर से साथ न रहने के कारण) दुःखी होकर लौट आते हैं।
उन सभी के लौट जाने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - सुमित्रानन्दन ! तुम्हारा कल्याण हो। ये मुनि हमारे ऊपर जो इतनी कृपा रखते हैं, इससे जान पड़ता है कि हम लोगों ने पहले कभी महान् पुण्य किया है।
इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मनस्वी पुरुषसिंह सीता को ही आगे करके गुह सहित यमुना नदी के तटपर गये। वहाँ कालिन्दी का स्रोत बड़ी तीव्रगति से प्रवाहित हो रहा था; वहाँ पहुँचकर वे इस चिन्ता में पड़े कि कैसे नदी को पार किया जाये; क्योंकि वे तुरंत ही यमुनाजी के जल को पार करना चाहते थे।
फिर निषादराज गुह ने प्रभु सेवा का अवसर जानकर अपने को बड़ा सौभाग्यवान मानते हुए लक्ष्मण के साथ मिलकर जंगल के सूखे काठ बटोरकर उन्हीं के द्वारा एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार किया। वह बेड़ा सूखे बाँसों से व्याप्त था और उसके ऊपर खस बिछाया गया था । तदनन्तर पराक्रमी लक्ष्मण और गुह ने बेंत और जामुन की टहनियों को काटकर सीता के बैठने के लिये एक सुखद आसन तैयार किया। तब श्री रामचन्द्रजी ने सखा गुह को अनेकों तरह से (घर लौट जाने के लिए) समझाया। श्री रामचन्द्रजी की आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसने अपने घर को गमन किया।
दशरथनन्दन श्रीराम ने लक्ष्मी के समान अचिन्त्य ऐश्वर्यवाली अपनी प्रिया सीता को जो कुछ लज्जित सी हो रही थीं, उस बेड़े पर चढ़ा दिया और उनके बगल में वस्त्र एवं आभूषण रख दिये; फिर श्रीराम ने बड़ी सावधानी के साथ खन्ती (कुदारी) और पिटारी को भी बेड़े पर ही रखा। इस प्रकार पहले सीता को चढ़ाकर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उस बेड़े को पकड़कर खेने लगे। उन्होंने बड़े प्रयत्न और प्रसन्नता के साथ नदी को पार करना आरम्भ किया।
यमुना की बीच धारा में आने पर सीता ने उन्हें प्रणाम किया और कहा – देवी! इस बेड़े द्वारा मैं आपके पार जा रही हूँ। आप ऐसी कृपा करें, जिससे हम लोग सकुशल पार हो जायें और मेरे पतिदेव अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञा को निर्विघ्न पूर्ण करें। इक्ष्वाकुवंशी वीरों द्वारा पालित अयोध्यापुरी में श्रीरघुनाथजी के सकुशल लौट आने पर मैं आपके किनारे एक सहस्र गौओं का दान करूंगी और सैकड़ों देवदुर्लभ पदार्थ अर्पित करके आपकी पूजा सम्पन्न करूँगी।
इस प्रकार सुन्दरी सीता हाथ जोड़कर यमुनाजी से प्रार्थना कर रही थीं, इतने ही में वे दक्षिण तट पर जा पहुँचीं। इस तरह उन तीनों ने उसी बेड़े द्वारा बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षों से सुशोभित और तरङ्गमालाओं से अलंकृत शीघ्रगामिनी सूर्य कन्या यमुना नदी को पार किया। पार उतरकर उन्होंने बेड़े को तो वहीं तट पर छोड़ दिया और यमुना तटवर्ती वन से प्रस्थान करके वे हरे-हरे पत्तों से सुशोभित शीतल छाया वाले श्यामवट के पास जा पहुँचे।
बट के समीप पहुँचकर विदेहनन्दिनी सीता ने उसे मस्तक झुकाया और इस प्रकार कहा - महावृक्ष! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पतिदेव अपने वनवास-विषयक व्रत को पूर्ण करें तथा हम लोग वन से सकुशल लौटकर माता कौशल्या तथा यशस्विनी सुमित्रादेवी का दर्शन कर सकें।
इस प्रकार कहकर मनस्विनी सीता ने हाथ जोड़े हुए उस वृक्ष की परिक्रमा की।
सदा अपनी आज्ञा के अधीन रहनेवाली प्राणप्यारी सती-साध्वी सीता को श्यामवट से आशीर्वाद की याचना करती देख श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - भरत के छोटे भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम सीता को साथ लेकर आगे-आगे चलो और मैं धनुष धारण किये पीछे से तुमलोगों की रक्षा करता हुआ चलूँगा। विदेहकुलनन्दिनी जनकदुलारी सीता जो-जो फल या फूल माँगें अथवा जिस वस्तु को पाकर इनका मन प्रसन्न रहे, वह सब इन्हें देते रहो।
अबला सीता एक-एक वृक्ष, झाड़ी अथवा पहले की न देखी हुई पुष्पशोभित लता को देखकर उसके विषय में श्रीरामचन्द्रजी से पूछती थीं तथा लक्ष्मण सीता के कथनानुसार तुरंत ही भाँतिभाँति के वृक्षों की मनोहर शाखाएँ और फूलों के गुच्छे ला- लाकर उन्हें देते थे।
उस समय जनकराजकिशोरी सीता विचित्र वालुका और जलराशि से सुशोभित तथा हंस और सारसों के कलनाद से मुखरित यमुना नदी को देखकर बहुत प्रसन्न होती थीं।
इस तरह एक कोस की यात्रा करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण यमुना तटवर्ती वन में विचरने लगे। उदार दृष्टिवाले वे सीता, लक्ष्मण और श्रीराम मोरों के झुंडों की मीठी बोली से गूँजते तथा हाथियों और वानरों से भरे हुए उस सुन्दर वन में घूम-फिरकर शीघ्र ही यमुनानदी के समतल तट पर आ गये और रात में उन्होंने वहीं निवास किया।

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