भाग-४८(48) गुह, लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का प्रयाग में गङ्गा-यमुना-सरस्वती के त्रिवेणी संगम के समीप भरद्वाज आश्रम में जाना, मुनि के द्वारा उनका अतिथि सत्कार


उस महान् वृक्ष के नीचे वह सुन्दर रात बिताकर वे सब लोग निर्मल सूर्योदय काल में उस स्थान से आगे को प्रस्थित हुए। जहाँ भागीरथी गङ्गा से यमुना मिलती हैं, तीर्थों के राजा प्रयाग के दर्शन किए। उस स्थान पर जाने के लिये वे महान् वन के भीतर से होकर यात्रा करने लगे। उस राजा का सत्य मंत्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्री वेणीमाधवजी सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) से भंडार भरा है और वह पुण्यमय प्रांत ही उस राजा का सुंदर देश है। प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुंदर गढ़ (किला) है, जिसको स्वप्न में भी (पाप रूपी) शत्रु नहीं पा सके हैं। संपूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल डालने वाले और बड़े रणधीर हैं। 

गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियों के भी मन को मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गंगाजी की तरंगें उसके (श्याम और श्वेत) चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है। पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणों के समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुणगणों का बखान करते हैं। पापों के समूह रूपी हाथी के मारने के लिए सिंह रूप प्रयागराज का प्रभाव (महत्व-माहात्म्य) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराज का दर्शन कर सुख के समुद्र रघुकुल श्रेष्ठ श्री रामजी ने भी सुख पाया। 

उन्होंने अपने श्रीमुख से सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुह को तीर्थराज की महिमा कहकर सुनाई। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचों को देखते हुए और बड़े प्रेम से माहात्म्य कहते हुए-इस प्रकार श्री राम ने आकर त्रिवेणी का दर्शन किया, जो स्मरण करने से ही सब सुंदर मंगलों को देने वाली है। फिर आनंदपूर्वक (त्रिवेणी में) स्नान करके शिवजी की सेवा (पूजा) की और विधिपूर्वक तीर्थ देवताओं का पूजन किया। 

वे चारों यशस्वी यात्री मार्गमें जहाँ-तहाँ जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, ऐसे अनेक प्रकारके भू-भाग तथा मनोहर प्रदेश देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। सुखपूर्वक आराम से उठते-बैठते यात्रा करते हुए उन चारों ने फूलों से सुशोभित भाँति-भाँति के वृक्षों का दर्शन किया। 

इस प्रकार जब दिन प्रायः समाप्त हो चला, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा – सुमित्रानन्दन! वह देखो, प्रयाग के पास भगवान् अग्निदेव की ध्वजा रूप उत्तम धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं। वन में उत्पन्न हुए फल मूल और काष्ठ आदि से जीविका चलाने वाले लोगों ने जो लकड़ियाँ काटी हैं, वे दिखायी देती हैं तथा जिनकी लकड़ियाँ काटी गयी हैं, वे नाना प्रकार के वृक्ष भी आश्रम के समीप दृष्टिगोचर हो रहे हैं। 

इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर श्रीराम और लक्ष्मण सूर्यास्त होते-होते गङ्गा-यमुना-सरस्वती के सङ्गम के समीप मुनिवर भरद्वाज के आश्रम पर जा पहुँचे। श्रीरामचन्द्रजी आश्रम की सीमा में पहुँचकर अपने धनुर्धर वेश के द्वारा वहाँ के पशु-पक्षियोंको डराते हुए दो ही घड़ी में तय करने योग्य मार्ग से चलकर भरद्वाज मुनि के समीप जा पहुँचे। 

आश्रम में पहुँचकर महर्षि के दर्शन की इच्छा वाले निषादराज गुह और सीता सहित वे दोनों वीर कुछ दूरपर ही खड़े हो गये। दूर खड़े हो महर्षि के शिष्य से अपने आगमन की सूचना दिलवाकर भीतर आने की अनुमति प्राप्त कर लेने के बाद पर्णशालामें प्रवेश करके उन्होंने तपस्या के प्रभाव से तीनों कालों की सारी बातें देखने की दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेने वाले एकाग्रचित्त तथा तीक्ष्ण व्रतधारी महात्मा भरद्वाज ऋषि का दर्शन किया, जो अग्निहोत्र करके शिष्यों से घिरे हुए आसन पर विराजमान थे। महर्षि को देखते ही लक्ष्मण, गुह और सीता सहित महाभाग श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनके चरणों में प्रणाम किया। 

तत्पश्चात् लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीरघुनाथजी ने उनसे इस प्रकार अपना परिचय दिया - भगवन् ! हम दोनों राजा दशरथ के पुत्र हैं। मेरा नाम राम और इनका लक्ष्मण है तथा ये विदेहराज जनककी पुत्री और मेरी कल्याणमयी पत्नी सती साध्वी सीता हैं, जो निर्जन तपोवन में भी मेरा साथ देने के लिये आयी हैं। ये हमारे साथ श्रंगवेरपुर के शासक निषादराज गुह मेरे सखा हैं, जो हमे कुछ दूर तक पहुँचाने आये हैं।  

‘पिता की आज्ञा से मुझे वन की ओर आते देख ये मेरे प्रिय अनुज भाई सुमित्रा कुमार लक्ष्मण भी वन में ही रहने का व्रत लेकर मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं। भगवन्! इस प्रकार पिता की आज्ञा से हम तीनों तपोवन में जायेंगे और वहाँ फल- मूल का आहार करते हुए धर्म का ही आचरण करेंगे।' 

परम बुद्धिमान् राजकुमार श्रीराम का वह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज मुनि ने उनके लिये आतिथ्य सत्कार के रूप में एक गौ तथा अर्घ्य - जल समर्पित किये। उन तपस्वी महात्मा ने उन सबको नाना प्रकार के अन्न, रस और जंगली फल - मूल प्रदान किये। साथ ही उनके ठहरने के लिये स्थान की भी व्यवस्था की। महर्षि के चारों ओर मृग, पक्षी और ऋषि-मुनि बैठे थे और उनके बीच में वे विराजमान थे। उन्होंने अपने आश्रम पर अतिथिरूप में पधारे हुए श्रीराम का स्वागतपूर्वक सत्कार किया। 

उनके उस सत्कार को ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजी जब आसन पर विराजमान हुए, तब भरद्वाजजी ने उनसे यह धर्मयुक्त वचन कहा - ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं इस आश्रम पर दीर्घकाल से तुम्हारे शुभागमन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ (आज मेरा मनोरथ सफल हुआ है)। मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास दे दिया गया है। गङ्गा, यमुना और सरस्वती - इन तीनों महानदियों के संगम के पास का यह स्थान बड़ा ही पवित्र और एकान्त है। यहाँ की प्राकृतिक छटा भी मनोरम है, अत: तुम यहीं सुखपूर्वक निवास करो। 

भरद्वाज मुनि के ऐसा कहने पर समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहनेवाले रघुकुलनन्दन श्रीराम ने इन शुभ वचनों के द्वारा उन्हें उत्तर दिया - भगवन्! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुण समूहों का घर है। हे मुनीश्वर! मेरे नगर और जनपद के लोग यहाँ से बहुत निकट पड़ते हैं, अतः मैं समझता हूँ कि यहाँ मुझसे मिलना सुगम समझकर लोग इस आश्रम पर मुझे और सीता को देखने के लिये प्राय: आते-जाते रहेंगे; इस कारण यहाँ निवास करना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता। भगवन्! किसी एकान्त प्रदेश में आश्रम के योग्य उत्तम स्थान देखिये (सोचकर बताइये), जहाँ सुख भोगने के योग्य विदेहराजकुमारी जानकी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें। हे नाथ! बताइए हम किस मार्ग से जाएँ। 

श्रीरामचन्द्रजी का यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाजजी ने उनके उक्त उद्देश्य की सिद्धि का बोध कराने वाली बात कही - श्रीराम! आपके लिए सभी मार्ग सुगम हैं। तात! यहाँ से दस कोस की दूरी पर एक सुन्दर और महर्षियों द्वारा सेवित परम पवित्र पर्वत है, उस पर बहुत-से लंगूर विचरते रहते हैं। वहाँ वानर और रीछ भी निवास करते हैं। वह पर्वत चित्रकूट नाम से विख्यात है और गन्धमादन के समान मनोहर है। जब मनुष्य चित्रकूट के शिखरों का दर्शन कर लेता है, तब कल्याणकारी पुण्य कर्मों का फल पा लेता है और कभी पाप में मन नहीं लगाता है। 

'वहाँ बहुत-से ऋषि, जिनके सिर के बाल वृद्धावस्था के कारण खोपड़ी की भाँति सफेद हो गये थे, तपस्या द्वारा सैकड़ों वर्षों तक क्रीड़ा करके स्वर्गलोक को चले गये हैं। उसी स्थान के निकट महा तपस्वी भगवान वाल्मीकि का आश्रम है। तुम उनके दर्शनों का लाभ प्राप्त करना वही तुम्हें आगे का मार्ग और सुलभ स्थान सुझाएंगे अथवा श्रीराम ! तुम वनवास के उद्देश्य से मेरे साथ इस आश्रम पर ही रहो। 

ऐसा कहकर भरद्वाजजी ने पत्नी और भ्राता सहित प्रिय अतिथि श्रीराम का हर्ष बढ़ाते हुए सब प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुओं द्वारा उन सबका आतिथ्य सत्कार किया। प्रयाग में श्रीरामचन्द्रजी महर्षि के पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतने में ही पुण्यमयी रात्रि का आगमन हुआ। 

वे सुख भोगने योग्य होने पर भी परिश्रम से बहुत थक गये थे, इसलिये भरद्वाज मुनि के उस मनोहर आश्रम में श्रीराम ने लक्ष्मण, गुह और सीता के साथ सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की। 

तदनन्तर जब रात बीती और प्रात: काल हुआ, तब पुरुषसिंह श्रीराम प्रज्वलित तेज वाले भरद्वाज मुनि के पास गये और बोले – भगवन्! आप स्वभावतः सत्य बोलने वाले हैं। आज हम लोगों ने आपके आश्रम में बड़े आराम से रात बितायी है, अब आप हमें आगे के गन्तव्य स्थान पर जाने के लिये आज्ञा प्रदान करें। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-४८(48) समाप्त !

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