उस वृक्ष के नीचे पहुँचकर आनन्द प्रदान करनेवालों में श्रेष्ठ श्रीराम ने सायंकाल की संध्योपासना करके लक्ष्मण से इस प्रकार कहा - सुमित्रानन्दन! आज हमें अपने जनपद से बाहर यह पहली रात प्राप्त हुई है; जिसमें सुमन्त्र हमारे साथ नहीं हैं। इस रात को पाकर तुम्हें नगर की सुख-सुविधाओं के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये।
‘लक्ष्मण! आज से हम दोनों भाइयों को आलस्य छोड़कर रात में जागना होगा; क्योंकि सीता के योगक्षेम हम दोनों ही अधीन हैं। सुमित्रानन्दन! यह रात हमलोग किसी तरह बितायँगे और स्वयं संग्रह करके लाये हुए तिनकों और पत्तों की शय्या बनाकर उसे भूमि पर बिछाकर उस पर किसी तरह सो लेंगे।
जो बहुमूल्य शय्या पर सोने के योग्य थे, वे श्रीराम भूमि पर ही बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण से ये बातें कहने लगे - लक्ष्मण! आज महाराज निश्चय ही बड़े दुःख से सो रहे होंगे; परंतु माता कैकेयी सफलमनोरथ होने के कारण बहुत संतुष्ट होगी। कहीं ऐसा न हो कि माता कैकेयी भरत को आया देख राज्य के लिये महाराज को प्राणों से भी वियुक्त कर दे। महाराज का कोई रक्षक न होने के कारण वे इस समय अनाथ हैं, बूढ़े हैं और उन्हें मेरे वियोग का सामना करना पड़ा है। उनकी कामना मन में ही रह गयी तथा वे माता कैकेयी के वश में पड़ गये हैं; ऐसी दशा में वे बेचारे अपनी रक्षा के लिये क्या करेंगे?
'अपने ऊपर आये हुए इस संकट को और राजा की मतिभ्रान्ति को देखकर मुझे ऐसा मालूम होता है कि अर्थ और धर्म की अपेक्षा काम का ही गौरव अधिक है। लक्ष्मण! पिताजी ने जिस तरह मुझे त्याग दिया है, उस प्रकार अत्यन्त अज्ञ होने पर भी कौन ऐसा पुरुष होगा, जो एक स्त्री के लिये अपने आज्ञाकारी पुत्र का परित्याग कर दे?'
‘कैकेयीकुमार भरत ही सुखी और सौभाग्यवती स्त्री के पति हैं, जो अकेले ही हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरे हुए कोशलदेश का सम्राट की भाँति पालन करेंगे। पिताजी अत्यन्त वृद्ध हो गये हैं और मैं वन में चला आया हूँ, ऐसी दशा में केवल भरत ही समस्त राज्य के श्रेष्ठ सुख का उपभोग करेंगे। सच है, जो अर्थ और धर्म का परित्याग करके केवल काम का अनुसरण करता है, वह उसी प्रकार शीघ्र ही आपत्ति में पड़ जाता है, जैसे इस समय महाराज दशरथ पड़े हैं।'
‘सौम्य! मैं समझता हूँ कि महाराज दशरथ के प्राणों का अन्त करने, मुझे देशनिकाला देने और भरत को राज्य दिलाने के लिये ही माता कैकेयी इस राजभवन में आयी थी। इस समय भी सौभाग्य के मद से मोहित हुई माता कैकेयी मेरे कारण माता कौशल्या और सुमित्रा को कष्ट पहुँचा सकती है। हम लोगों के कारण तुम्हारी माता सुमित्रादेवी को बड़े दुःख के साथ वहाँ रहना पड़ेगा; अतः लक्ष्मण! तुम यहीं से कल प्रातः काल अयोध्या को लौट जाओ।'
‘मैं अकेला ही सीता के साथ दण्डकवन को जाऊँगा। तुम वहाँ मेरी असहाय माता कौशल्या के सहायक हो जाओगे। धर्मज्ञ लक्ष्मण! माता कैकेयी के कर्म बड़े खोटे हैं। वह द्वेषवश अन्याय भी कर सकती है। तुम्हारी और मेरी माता को विष भी दे सकती है। तात सुमित्राकुमार! निश्चय ही पूर्वजन्म में मेरी माता ने कुछ स्त्रियों का उनके पुत्रों से वियोग कराया होगा, उसी पाप का यह पुत्र- बिछोह रूप फल आज उन्हें प्राप्त हुआ है।'
'मेरी माता ने चिरकाल तक मेरा पालन-पोषण किया और स्वयं दुःख सहकर मुझे बड़ा किया। अब जब पुत्र से प्राप्त होनेवाले सुखरूपी फल के भोगने का अवसर आया, तब मैंने माता कौशल्या को अपने से विलग कर दिया। मुझे धिक्कार है! सुमित्रानन्दन! कोई भी सौभाग्यवती स्त्री कभी ऐसे पुत्र को जन्म न दे, जैसा मैं हूँ; क्योंकि मैं अपनी माता को अनन्त शोक दे रहा हूँ।'
‘लक्ष्मण! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि माता कौशल्या में मुझसे अधिक प्रेम उनकी पाली हुई वह सारिका ही करती है; क्योंकि उसके मुख से माँ को सदा यह बात सुनायी देती है कि 'ऐ तोते! तू शत्रु के पैर को काट खा' (अर्थात् हमें पालने वाली माता कौशल्या के शत्रु के पाँव को चोंच मार दे। वह पक्षिणी होकर माता का इतना ध्यान रखती है और मैं उनका पुत्र होकर भी उनके लिये कुछ नहीं कर पाता)।'
‘शत्रुदमन! जो मेरे लिये शोकमग्न रहती है, मन्दभागिनी-सी हो रही है और पुत्र का कोई फल न पाने के कारण निपूती - सी हो गयी है, उस मेरी माता को कुछ भी उपकार न करने वाले मुझ जैसे पुत्र से क्या प्रयोजन है? मुझसे बिछुड़ जाने के कारण माता कौशल्या वास्तव में मन्दभागिनी हो गयी है और शोक के समुद्र में पड़कर अत्यन्त दुःख से आतुर हो उसी में शयन करती है।'
‘लक्ष्मण! यदि मैं कुपित हो जाऊँ तो अपने बाणों द्वारा अकेला ही अयोध्यापुरी तथा समस्त भूमण्डल को निष्कण्टक बनाकर अपने अधिकार में कर लूँ; परंतु पारलौकिक हित साधन में बल - पराक्रम कारण नहीं होता है इसीलिये मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ। निष्पाप लक्ष्मण! मैं अधर्म और परलोक के डर से डरता हूँ; इसीलिये आज अयोध्या के राज्य पर अपना अभिषेक नहीं कराता हूँ।'
यह तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर श्रीराम ने उस निर्जन वन में करुणाजनक विलाप किया। तत्पश्चात् वे उस रात में चुपचाप बैठ गये। उस समय उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी और दीनता छा रही थी।
विलाप से निवृत्त होने पर श्रीराम ज्वालारहित अग्नि और वेगशून्य समुद्र के समान शान्त प्रतीत होते थे। उस समय लक्ष्मण ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा - अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीराम ! आपके निकल आने से निश्चय ही आज अयोध्यापुरी चन्द्रहीन रात्रि के समान निस्तेज हो गयी। पुरुषोत्तम श्रीराम! आप जो इस तरह संतप्त हो रहे हैं, यह आपके लिये कदापि उचित नहीं है। आप ऐसा करके भाभी सीता को और मुझको भी खेद में डाल रहे हैं। रघुनन्दन! आपके बिना भाभी सीता और मैं दोनों दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते। ठीक उसी तरह, जैसे जल से निकाले हुए मत्स्य नहीं जीते हैं। शत्रुओं को ताप देनेवाले रघुवीर ! आपके बिना आज मैं न तो पिताजी को, न भाई शत्रुघ्न को, न माता सुमित्रा को और न स्वर्गलोक को ही देखना चाहता हूँ।
तदनन्तर वहाँ बैठे हुए धर्मवत्सल सीता और श्रीराम ने थोड़ी ही दूर पर वटवृक्ष के नीचे लक्ष्मण द्वारा सुन्दर ढंग से निर्मित हुई शय्या देखकर उसी का आश्रय लिया (अर्थात् वे दोनों वहाँ जाकर सो गये।)
शत्रुओं को संताप देनेवाले रघुनाथजी ने इस प्रकार वनवास के प्रति आदरपूर्वक कहे हुए लक्ष्मण के अत्यन्त उत्तम वचनों को सुनकर स्वयं भी दीर्घकाल के लिये वनवासरूप धर्म को स्वीकार करके सम्पूर्ण वर्षों तक लक्ष्मण को अपने साथ वन में रहने की अनुमति दे दी। तदनन्तर उस महान् निर्जन वन में रघुवंश की वृद्धि करने वाले वे दोनों महाबली वीर पर्वतशिखर पर विचरने वाले दो सिंहों के समान कभी भय और उद्वेग को नहीं प्राप्त हुए।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-४७(47) समाप्त !

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