भाग - ४६(46) श्रीराम का गंगा पार जाना


इसके बाद फिर रघुकुल के स्वामी श्री रामचन्द्रजी ने स्नान करके पार्थिव पूजा की और शिवजी को सिर नवाया। सती साध्वी विदेहनन्दिनी सीता ने हाथ जोड़कर गङ्गाजी से यह प्रार्थना की - देवि गङ्गे! ये परम बुद्धिमान् महाराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये वन में जा रहे हैं। ये आपसे सुरक्षित होकर पिता की इस आज्ञा का पालन कर सकें ऐसी कृपा कीजिये। 

‘वन में पूरे चौदह वर्षों तक निवास करके ये मेरे तथा अपने भाई के साथ पुनः अयोध्यापुरी को लौटेंगे। सौभाग्यशालिनी देवि गङ्गे ! उस समय वन से पुन: कुशलपूर्वक लौटने पर सम्पूर्ण मनोरथों से सम्पन्न हुई मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ आपकी पूजा करूँगी। स्वर्ग, भूतल और पाताल – तीनों मार्गों पर विचरने वाली देवी! तुम यहाँ से ब्रह्मलोक तक फैली हुई हो और इस लोक में समुद्रराज की पत्नी के रूप में दिखायी देती हो।' 

'शोभाशालिनी देवि! पुरुषसिंह श्रीराम जब पुनः वन से सकुशल लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब मैं पुन: आपको मस्तक झुकाऊँगी और आपकी स्तुति करूँगी। इतना ही नहीं, मैं आपका प्रिय करने की इच्छा से ब्राह्मणों को एक लाख गौएँ, बहुत-से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूँगी। देवी! पुन: अयोध्यापुरी में लौटने पर मैं सहस्रों देवदुर्लभ पदार्थों से तथा राजकीय भाग से रहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्न द्वारा भी आपकी पूजा करूँगी। आप मुझ पर प्रसन्न हों। आपके किनारे जो-जो देवता, तीर्थ और मन्दिर हैं, उन सबका मैं पूजन करूँगी। निष्पाप गङ्गे! ये महाबाहु पापरहित मेरे पतिदेव मेरे तथा अपने भाई के साथ वनवास से लौटकर पुनः अयोध्या नगरी में प्रवेश करें।' 

सीताजी की प्रेम रस में सनी हुई विनती सुनकर तब गंगाजी के निर्मल जल में से श्रेष्ठ वाणी हुई - हे रघुवीर की प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे (कृपा दृष्टि से) देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं। तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनाई, यह तो मुझ पर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवी! मैं अपनी वाणी सफल होने के लिए तुम्हें आशीर्वाद दूँगी। तुम अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुंदर यश जगत भर में छा जाएगा। 

मंगल के मूल गंगाजी के वचन सुनकर और देवनदी को अनुकूल देखकर सीताजी आनंदित हुईं। तब प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने निषादराज गुह से कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ! यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदय में दाह उत्पन्न हो गया। 

गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला - हे रघुकुल शिरोमणि! मेरी विनती सुनिए। मैं नाथ आपके साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार (कुछ) दिन चरणों की सेवा करके- हे रघुराज! जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुंदर पर्णकुटी (पत्तों की कुटिया) बना दूँगा। तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर आपकी दुहाई है, मैं वैसा ही करूँगा। 

उसके स्वाभाविक प्रेम को देखकर श्री रामचन्द्रजी ने उसको साथ ले लिया, इससे गुह के हृदय में बड़ा आनंद हुआ। फिर गुह (निषादराज) ने अपनी जाति के लोगों को बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया। 

तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मण से बोले – सुमित्राकुमार ! अब तुम सजन या निर्जन वन में सीता की रक्षा के लिये सावधान हो जाओ। हम जैसे लोगों को निर्जन वन में नारी की रक्षा अवश्य करनी चाहिये। अत: तुम आगे-आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीता की तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा। पुरुषप्रवर! हमलोगों को एक-दूसरे की रक्षा करनी चाहिये। 

'अबतक कोई भी दुष्कर कार्य समाप्त नहीं हुआ है - इस समय से ही कठिनाइयों का सामना आरम्भ हुआ है। आज विदेहकुमारी सीता को वनवास के वास्तविक कष्ट का अनुभव होगा। अब ये ऐसे वन में प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्यों के आने-जाने का कोई चिह्न नहीं दिखायी देगा, न धान आदि के खेत होंगे, न टहलने के लिये बगीचे। जहाँ ऊँची-नीची भूमि होगी और गड्ढे मिलेंगे, जिसमें गिरने का भय रहेगा। 

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर लक्ष्मण आगे बढ़े। उनके पीछे सीता चलने लगीं तथा सीता के पीछे रघुकुलनन्दन श्रीराम थे। 

श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजी के उस पार पहुँचकर जब तक दिखायी दिये तबतक सुमन्त्र निरन्तर उन्हीं की ओर दृष्टि लगाये देखते रहे। जब वन के मार्ग में बहुत दूर निकल जाने के कारण वे दृष्टि से ओझल हो गये, तब तपस्वी सुमन्त्र के हृदय में बड़ी व्यथा हुई। वे नेत्रों से आँसू बहाने लगे। लोकपालों के समान प्रभावशाली वरदायक महात्मा श्रीराम महानदी गङ्गा को पार करके क्रमश: समृद्धिशाली वत्सदेश (प्रयाग)-में जा पहुँचे, जो सुन्दर धन-धान्यसे सम्पन्न था। वहाँ के लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट थे। तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कन्द-मूल आदि लेकर सायंकाल के समय ठहरने के लिये वे सीताजी के साथ एक वृक्ष के नीचे चले गये। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग - ४६(46) समाप्त !

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