अपने को घर लौटनेकी आज्ञा प्राप्त हुई देख सारथि सुमन्त्र शोक से व्याकुल हो उठे और इक्ष्वाकुनन्दन पुरुषसिंह श्रीराम से इस प्रकार बोले - रघुनन्दन! जिसकी प्रेरणा से आपको भाई और पत्नी के साथ साधारण मनुष्यों की भाँति वन में रहने को विवश होना पड़ा है, उस दैव का इस संसार में किसी भी पुरुष ने उल्लङ्घन नहीं किया। जब आप-जैसे महान् पुरुष पर यह संकट आ गया, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य पालन, वेदों के स्वाध्याय, दयालुता अथवा सरलता में भी किसी फल की सिद्धि नहीं है।
'वीर रघुनन्दन ! इस प्रकार पिता के सत्य की रक्षा के लिये विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में निवास करते हुए आप तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करनेवाले महापुरुष नारायण की भाँति उत्कर्ष (महान् यश) प्राप्त करेंगे। श्रीराम! निश्चय ही हम लोग हर तरह से मारे गये; क्योंकि आपने हम पुरवासियों को अपने साथ न ले जाकर अपने दर्शनजनित सुख से वञ्चित कर दिया। अब हम पापिनी कैकेयी के वश में पड़ेंगे और दु:ख भोगते रहेंगे। आत्मा के समान प्रिय श्रीरामचन्द्रजी से ऐसी बात कहकर उन्हें दूर जाने को उद्यत देख सारथी सुमन्त्र दु:ख से व्याकुल होकर देर तक रोते रहे।
आँसुओं का प्रवाह रुकने पर आचमन करके पवित्र हुए सारथी से श्रीरामचन्द्रजी ने बारंबार मधुर वाणी में कहा – सुमन्त्रजी! मेरी दृष्टि में इक्ष्वाकुवंशियों का हित करनेवाला सुहृद् आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे महाराज दशरथ को मेरे लिये शोक न हो। पृथ्वी पति महाराज दशरथ एक तो बूढ़े हैं, दूसरे उनका सारा मनोरथ चूर-चूर हो गया है; इसलिये उनका हृदय शोक से पीड़ित है। यही कारण है कि मैं आपको उनकी सँभाल के लिये कहता हूँ। वे महामनस्वी महाराज कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से आपको जो कुछ जैसी भी आज्ञा दें, उसका आप आदरपूर्वक पालन करें यही मेरा अनुरोध है।
‘राजालोग इसीलिये राज्य का पालन करते हैं कि किसी भी कार्य में इनके मन की इच्छा पूर्ति में विघ्न न डाला जाये। सुमन्त्रजी! जिस किसी भी कार्य में जिस किसी तरह भी महाराज को अप्रिय बात से खिन्न होने का अवसर न आवे तथा वे शोक से दुबले न हों, वह आपको उसी प्रकार करना चाहिये। जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा है, उन आर्य, जितेन्द्रिय और वृद्ध महाराज को मेरी ओर से प्रणाम करके यह बात कहियेगा। हम लोग अयोध्या से निकल गये अथवा हमें वन में रहना पड़ेगा, इस बात को लेकर न तो मैं कभी शोक करता हूँ और न लक्ष्मण को ही इसका शोक है।'
‘चौदह वर्ष समाप्त होने पर हम पुनः शीघ्र ही लौट आयँगे और उस समय आप मुझे, लक्ष्मण को और सीता को भी फिर देखेंगे। सुमन्त्रजी! महाराज से ऐसा कहकर आप मेरी माता से, उनके साथ बैठी हुई अन्य देवियों (माताओं) से तथा कैकेयी से भी बारंबार मेरा कुशल- समाचार कहियेगा। माता कौशल्या से कहियेगा कि तुम्हारा पुत्र स्वस्थ एवं प्रसन्न है। इसके बाद सीता की ओर से, मुझ ज्येष्ठ पुत्र की ओर से तथा लक्ष्मण की ओर से भी माता की चरणवन्दना कह दीजियेगा।'
‘तदनन्तर मेरी ओर से महाराज से भी यह निवेदन कीजियेगा कि आप भरत को शीघ्र ही बुलवा लें और जब वे जाये, तब अपने अभीष्ट युवराजपद पर उनका अभिषेक कर दें। भरत को छाती से लगाकर और युवराज के पद पर अभिषिक्त करके आपको हम लोगों के वियोग से होनेवाला दु:ख दबा नहीं सकेगा।'
'भरत से भी हमारा यह संदेश कह दीजियेगा कि महाराज के प्रति जैसा तुम्हारा बर्ताव है, वैसा ही समान रूप से सभी माताओं के प्रति होना चाहिये। तुम्हारी दृष्टि में माता कैकेयी का जो स्थान है, वही समान रूप से माता सुमित्रा और मेरी माता कौशल्या का भी होना उचित है, इन सब में कोई अन्तर न रखना। पिताजी का प्रिय करने की इच्छा से युवराजपद को स्वीकार करके यदि तुम राजकाज की देखभाल करते रहोगे तो इहलोक और परलोक में सदा ही सुख पाओगे।'
श्रीरामचन्द्रजी ने सुमन्त्र को लौटाते हुए जब इस प्रकार समझाया, तब उनकी सारी बातें सुनकर वे श्रीराम से स्नेहपूर्वक बोले – तात! सेवक का स्वामी के प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुख से स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाये तो 'यह मेरा भक्त है' ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा। जो आपके वियोग से पुत्र शोक आतुर हुई माता की भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरी में मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा?
'आते समय लोगों ने मेरे रथ में श्रीराम को विराजमान देखा था, अब इस रथ को श्रीराम से रहित देखकर उन लोगों का और उस अयोध्यापुरी का भी हृदय विदीर्ण हो जायेगा। जैसे युद्ध में अपने स्वामी वीर रथी के मारे जाने पर जिसमें केवल सारथी शेष रह गया हो ऐसे रथ को देखकर उसकी अपनी सेना अत्यन्त दयनीय अवस्था में पड़ जाती है, उसी प्रकार मेरे इस रथ को आपसे सूना देखकर सारी अयोध्या नगरी दीन दशा को प्राप्त हो जायेगी।'
'आप दूर रहकर भी प्रजा के हृदय में निवास करने के कारण सदा उसके सामने ही खड़े रहते है। निश्चय ही इस समय प्रजावर्ग के सब लोगों ने आपका ही चिन्तन करते हुए खाना-पीना छोड़ दिया होगा। श्रीराम! जिस समय आप वन को आने लगे, उस समय आपके शोक से व्याकुलचित्त हुई प्रजा ने जैसा आर्तनाद एवं क्षोभ प्रकट किया था, उसे तो आपने देखा ही था।'
‘आपके अयोध्या से निकलते समय पुरवासियों ने जैसा आर्तनाद किया था, आपके बिना मुझे खाली रथ लिये लौटा देख वे उससे भी सौगुना हाहाकार करेंगे। क्या मैं महारानी कौशल्या से जाकर कहूँगा कि मैंने आपके बेटे को मामा के घर पहुँचा दिया है? इसलिये आप संताप न करें, यह बात प्रिय होने पर भी असत्य है, अतः ऐसा असत्य वचन भी मैं कभी नहीं कह सकता। फिर यह अप्रिय सत्य भी कैसे सुना सकूँगा कि मैं आपके पुत्र को वन में पहुँचा आया।'
‘ये उत्तम घोड़े मेरी आज्ञा के अधीन रहकर आपके बन्धुजनों का भार वहन करते हैं आपके बन्धुजनों से ही रथ का ये वहन नहीं करते हैं, ऐसी दशा में आपसे सूने रथ को ये कैसे खींच सकेंगे ? अत: निष्पाप रघुनन्दन! अब मैं आपके बिना अयोध्या लौटकर नहीं जा सकूँगा। मुझे भी वन में चलने की ही आज्ञा दीजिये। यदि इस तरह याचना करने पर भी आप मुझे त्याग ही देंगे तो मैं आपके द्वारा परित्यक्त होकर यहाँ रथ सहित अग्रि में प्रवेश कर जाऊँगा।'
‘रघुनन्दन! वन में आपकी तपस्या में विघ्न डालने वाले जो-जो जन्तु उपस्थित होंगे, मैं इस रथ के द्वारा उन सबको दूर भगा दूँगा। श्रीराम! आपकी कृपा से मुझे आपको रथ पर बिठाकर यहाँ तक लाने का सुख प्राप्त हुआ। अब आपके ही अनुग्रह से मैं आपके साथ वन में रहने का सुख भी पाने की आशा करता हूँ। आप प्रसन्न होकर आज्ञा दीजिये। मैं वन में आपके पास ही रहना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप प्रसन्नतापूर्वक कह दें कि तुम वन में मेरे साथ ही रहो।'
'वीर! ये घोड़े भी यदि वन में रहते समय आपकी सेवा करेंगे तो इन्हें परमगति की प्राप्ति होगी। प्रभो! मैं वन में रहकर अपने सिर से (सारे शरीर से) आपकी सेवा करूँगा और इस सुख के आगे अयोध्या तथा देवलोक का भी सर्वथा त्याग कर दूँगा। जैसे सदाचारहीन प्राणी इन्द्र की राजधानी स्वर्ग में नहीं प्रवेश कर सकता, उसी प्रकार आपके बिना मैं अयोध्यापुरी में नहीं जा सकता।'
'मेरी यह अभिलाषा है कि जब वनवास की अवधि समाप्त हो जाये, तब फिर इसी रथ पर बिठाकर आपको अयोध्यापुरी में ले चलूँ। वन में आपके साथ रहने से ये चौदह वर्ष मेरे लिये चौदह क्षणों के समान बीत जायेंगे। अन्यथा चौदह सौ वर्षों के समान भारी जान पड़ेंगे। अत: भक्तवत्सल! आप मेरे स्वामी के पुत्र हैं। आप जिस पथ पर चल रहे हैं, उसी पर आपकी सेवा के लिये साथ चलने को मैं भी तैयार खड़ा हूँ। मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, आपका भृत्य हूँ और भृत्यजनोचित मर्यादा के भीतर स्थित हूँ; अत: आप मेरा परित्याग न करें।'
इस तरह अनेक प्रकार से दीन वचन कहकर बारंबार याचना करनेवाले सुमन्त्र से सेवकों पर कृपा करने वाले श्रीराम ने इस प्रकार कहा - सुमन्त्रजी! आप स्वामी के प्रति स्नेह रखने वाले हैं। मुझमें आपकी जो उत्कृष्ट भक्ति है, उसे मैं जानता हूँ; फिर भी जिस कार्य के लिये मैं आपको यहाँ से अयोध्यापुरी में भेज रहा हूँ, उसे सुनिये।
'जब आप नगर को लौट जायँगे, तब आपको देखकर मेरी छोटी माता कैकेयी को यह विश्वास हो जायेगा कि राम वन को चले गये। इसके विपरीत यदि आप नहीं गये तो उसे संतोष नहीं होगा। मेरे वनवासी हो जाने पर भी वह धर्मपरायण महाराज दशरथ के प्रति मिथ्यावादी होने का संदेह करे, ऐसा मैं नहीं चाहता। आपको भेजने में मेरा मुख्य उद्देश्य यही है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरत द्वारा सुरक्षित समृद्धिशाली राज्य को हस्तगत कर ले। सुमन्त्रजी! मेरा तथा महाराज का प्रिय करने के लिये आप अयोध्यापुरी को अवश्य पधारिये और आपको जिनके लिये जो संदेश दिया गया है, वह सब वहाँ जाकर उन लोगों से कह दीजिये।'
ऐसा कहकर श्रीराम ने सुमन्त्र को बारंबार सान्त्वना दी। इसके बाद उन्होंने गुह से उत्साहपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही - निषादराज गुह! इस समय मेरे लिये ऐसे वन में रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपद के लोगों का आना-जाना अधिक होता हो, अब अवश्य मुझे निर्जन वन के आश्रम में ही वास करना होगा। इसके लिये जटा धारण आदि आवश्यक विधि का मुझे पालन करना चाहिये। अत: फल- मूल का आहार और पृथ्वी पर शयन आदि नियमों को ग्रहण करके मैं सीता और लक्ष्मण की अनुमति लेकर पिता का हित करने की इच्छा से सिर पर तपस्वी जनों के आभूषणरूप जटा धारण करके यहाँ से वन को जाऊँगा। मेरे केशों को जटा का रूप देने के लिये तुम बड़ का दूध ला दो।'
गुह ने तुरंत ही बड़ का दूध लाकर श्रीराम को दिया। श्रीराम ने उसके द्वारा लक्ष्मण की तथा अपनी जटाएँ बनायीं। महाबाहु पुरुषसिंह श्रीराम तत्काल जटाधारी हो गये। उस समय वे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण वल्कल वस्त्र और जटामण्डल धारण करके ऋषियों के समान शोभा पाने लगे। तदनन्तर वानप्रस्थ मार्ग का आश्रय लेकर लक्ष्मण सहित श्रीराम ने वानप्रस्थोचित व्रत को ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे अपने सहायक गुह से बोले - निषादराज! तुम सेना, खजाना, किला और राज्य के विषय में सदा सावधान रहना; क्योंकि राज्य की रक्षा का काम बड़ा कठिन माना गया है।
गुह को इस प्रकार आज्ञा देकर उससे विदा ले इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पत्नी और लक्ष्मण के साथ तुरंत ही वहाँ से चल दिये। उस समय उनके चित्त में तनिक भी व्यग्रता नहीं थी।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-४४(44) समाप्त !

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