भाग-४३(43) श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्री राम-सीता से सुमन्त्र का संवाद

 


जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्ष वाले महायशस्वी श्रीराम ने शुभलक्षण सम्पन्न सुमित्रा कुमार लक्ष्मण से इस प्रकार कहा - 

तात! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी। अब सूर्योदय का समय आ पहुँचा है। वह अत्यन्त काले रंग का पक्षी कोकिल कुहू कुहू बोल रहा है। वन में अव्यक्त शब्द करने वाले मयूरों की केकी वाणी भी सुनायी देती है; अत: सौम्य ! अब हमें तीव्र गति बहने वाली समुद्रगामिनी गङ्गाजी के पार उतरना चाहिये। 

मित्रों को आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने श्रीरामचन्द्रजी के कथन का अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्र को बुलाकर पार उतरने की व्यवस्था करने के लिये कहा और स्वयं वे भाई के सामने आकर खड़े हो गये।

श्रीरामचन्द्रजी का वचन सुनकर उनका आदेश शिरोधार्य करके निषादराज ने तुरंत अपने सचिवों को बुलाया और इस प्रकार कहा - तुम घाट पर शीघ्र ही केवट के पास जाओ और उससे एक ऐसी नाव लेकर आने को कहो, जो मजबूत होने के साथ ही सुगमता पूर्वक खेने योग्य हो, उसमें डाँड़ लगा हुआ हो, कर्णधार बैठा हो तथा वह नाव देखने में सुन्दर हो। 

निषादराज गुह का वह आदेश सुनकर उसका महान् मन्त्री गया और एक सुन्दर नाव घाट पर पहुँचाकर उसने गुह को इसकी सूचना दी। तब गुहने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजी से कहा – देव ! आपके लिए नौका उपस्थित है; बताइये, इस समय आपकी और क्या सेवा करूँ ? देवकुमार के समान तेजस्वी तथा उत्तम व्रत का पालन करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम ! समुद्रगामिनी गङ्गानदी को पार करने के लिये आपकी सेवा में यह नाव आ गयी है, अब आप शीघ्र इस पर आरूढ़ होइये। 

तब महातेजस्वी श्रीराम गुह से इस प्रकार बोले - सखे! तुमने मेरा सारा मनोरथ पूर्ण कर दिया, अब शीघ्र ही सब सामान नाव पर चढ़ाओ। 

यह कहकर श्रीराम और लक्ष्मण ने कवच धारण करके तरकस एवं तलवार बाँधी तथा धनुष लेकर वे दोनों भाई जिस मार्ग से सब लोग घाट पर जाया करते थे, उसी से सीता के साथ गङ्गाजी के तट पर गये। 

उस समय धर्म के ज्ञाता भगवान् श्रीराम के पास जाकर सारथी सुमन्त्र ने विनीतभाव से हाथ जोड़कर पूछा - हे नाथ! मुझे कौशलनाथ दशरथजी ने ऐसी आज्ञा दी थी कि तुम रथ लेकर श्री रामजी के साथ जाओ, वन दिखाकर, गंगा स्नान कराकर दोनों भाइयों को तुरंत लौटा लाना। सब संशय और संकोच को दूर करके लक्ष्मण, राम, सीता को फिरा लाना। प्रभो! अब मैं आपकी क्या सेवा करूँ? 

तब दशरथनन्दन श्रीराम ने सुमन्त्र को उत्तम दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए कहा – हे तात ! आपने तो धर्म के सभी सिद्धांतों को छान डाला है। शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चन्द्र ने धर्म के लिए करोड़ों (अनेकों) कष्ट सहे थे। बुद्धिमान राजा रन्तिदेव और बलि बहुत से संकट सहकर भी धर्म को पकड़े रहे (उन्होंने धर्म का परित्याग नहीं किया)। वेद, शास्त्र और पुराणों में कहा गया है कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। मैंने उस धर्म को सहज ही पा लिया है। इस (सत्य रूपी धर्म) का त्याग करने से तीनों लोकों में अपयश छा जाएगा। प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपयश की प्राप्ति करोड़ों मृत्यु के समान भीषण संताप देने वाली है। हे तात! मैं आप से अधिक क्या कहूँ! लौटकर उत्तर देने में भी पाप का भागी होता हूँ। 

'सुमन्त्रजी ! अब आप शीघ्र ही पुन: महाराज के पास लौट जाइये और वहाँ सावधान होकर रहिये। 

उन्होंने फिर कहा - इतनी दूर तक महाराज की आज्ञा से मैंने रथद्वारा यात्रा की है, अब हम लोग रथ छोड़कर पैदल ही महान् वन की यात्रा करेंगे; अतः आप लौट जाइये। 

श्री रघुनाथजी और सुमंत्र का यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुम्बियों सहित व्याकुल हो गया। फिर लक्ष्मणजी ने कुछ कड़वी बात कही। प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने उसे बहुत ही अनुचित जानकर उनको मना किया। श्री रामचन्द्रजी ने सकुचाकर, अपनी सौगंध दिलाकर सुमंत्रजी से कहा कि आप जाकर लक्ष्मण का यह संदेश न कहिएगा। 

सुमंत्र ने फिर राजा का संदेश कहा कि सीता वन के क्लेश न सह सकेंगी। अतएव जिस तरह सीता अयोध्या को लौट आवें, तुमको और श्री रामचन्द्र को वही उपाय करना चाहिए। नहीं तो मैं बिल्कुल ही बिना सहारे का होकर वैसे ही नहीं जीऊँगा जैसे बिना जल के मछली नहीं जीती। सीता के मायके (पिता के घर) और ससुराल में सब सुख हैं। जब तक यह विपत्ति दूर नहीं होती, तब तक वे जब जहाँ जी चाहें, वहीं सुख से रहेंगी। 

राजा ने जिस तरह (जिस दीनता और प्रेम से) विनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श्री रामचन्द्रजी ने पिता का संदेश सुनकर सीताजी को करोड़ों (अनेकों) प्रकार से सीख दी। उन्होंने कहा-) जो तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिन्ता मिट जाए। 

पति के वचन सुनकर जानकीजी कहती हैं - हे प्राणपति! हे परम स्नेही! सुनिए हे प्रभो! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं। कृपा करके विचार तो कीजिए शरीर को छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है? सूर्य की प्रभा सूर्य को छोड़कर कहाँ जा सकती है? और चाँदनी चन्द्रमा को त्यागकर कहाँ जा सकती है? 

इस प्रकार पति को प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मंत्री से सुहावनी वाणी कहने लगीं- आप मेरे पिताजी और ससुरजी के समान मेरा हित करने वाले हैं। आपको मैं बदले में उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है। किन्तु हे तात! मैं आर्त्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानिएगा। आर्यपुत्र (स्वामी) के चरणकमलों के बिना जगत में जहाँ तक नाते हैं, सभी मेरे लिए व्यर्थ हैं। 

'मैंने पिताजी के ऐश्वर्य की छटा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी से सर्वशिरोमणि राजाओं के मुकुट मिलते हैं (अर्थात बड़े-बड़े राजा जिनके चरणों में प्रणाम करते हैं) ऐसे पिता का घर भी, जो सब प्रकार के सुखों का भंडार है, पति के बिना मेरे मन को भूलकर भी नहीं भाता। मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है, इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासन पर बैठने के लिए स्थान देता है, ऐसे (ऐश्वर्य और प्रभावशाली) ससुर, (उनकी राजधानी) अयोध्या का निवास, प्रिय कुटुम्बी और माता के समान सासुएँ- ये कोई भी श्री रघुनाथजी के चरण कमलों की रज के बिना मुझे स्वप्न में भी सुखदायक नहीं लगते।'

'दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी, सिंह, अथाह तालाब एवं नदियाँ, कोल, भील, हिरन और पक्षी- प्राणपति श्री रघुनाथजी के साथ रहते ये सभी मुझे सुख देने वाले होंगे। अतः सास और ससुर के पाँव पड़कर, मेरी ओर से विनती कीजिएगा कि वे मेरा कुछ भी सोच न करें, मैं वन में स्वभाव से ही सुखी हूँ। वीरों में अग्रगण्य तथा धनुष और बाणों से भरे तरकश धारण किए मेरे प्राणनाथ और प्यारे देवर साथ हैं। इससे मुझे न रास्ते की थकावट है, न भ्रम है और न मेरे मन में कोई दुःख ही है। आप मेरे लिए भूलकर भी सोच न करें। सुमंत्र सीताजी की शीतल वाणी सुनकर ऐसे व्याकुल हो गए जैसे साँप मणि खो जाने पर। नेत्रों से कुछ सूझता नहीं, कानों से सुनाई नहीं देता। वे बहुत व्याकुल हो गए, कुछ कह नहीं सकते। श्री रामचन्द्रजी ने उनका बहुत प्रकार से समाधान किया। तो भी उनकी छाती ठंडी न हुई। साथ चलने के लिए मंत्री ने अनेकों यत्न किए (युक्तियाँ पेश कीं), पर रघुनंदन श्री रामजी उन सब युक्तियों का यथोचित उत्तर देते गए। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-४३(43) समाप्त !


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