लक्ष्मण को इस प्रकार आदेश देकर रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने सोने की मूँठवाली तलवार कमर में बाँध ली। तत्पश्चात् महापराक्रमी रघुनाथजी तीन स्थानों में झुके हुए अपने आभूषण रूप धनुष को हाथ में ले पीठ पर दो तरकस बाँधकर वहाँ से चल दिये। राजाधिराज श्रीराम को आते देख वह वन्य मृगों का राजा काञ्चन मृग भय के मारे छिप गया, किंतु फिर तुरंत ही उनके दृष्टिपथ में आ गया।
तब तलवार बाँधे और धनुष लिये श्रीराम जिस ओर वह मृग था, उसी ओर दौड़े। धनुर्धर श्रीराम ने देखा, वह अपने रूप से सामने की दिशा को प्रकाशित-सी कर रहा था। उस महान् वन में वह पीछे की ओर देख-देखकर आगे की ओर भाग रहा था। कभी छलाँगें मारकर बहुत दूर निकल जाता और कभी इतना निकट दिखायी देता कि हाथ से पकड़ लेने का लोभ पैदा कर देता था। कभी डरा हुआ, कभी घबराया हुआ और कभी आकाश में उछलता हुआ दीख पड़ता था। कभी वन के किन्हीं स्थानों में छिपकर अदृश्य हो जाता था, मानो शरद् ऋतु का चन्द्रमण्डल मेघखण्डों से आवृत हो गया हो। एक ही मुहूर्त में वह निकट दिखायी देता और पुनः बहुत दूर के स्थान में चमक उठता था।
इस तरह प्रकट होता और छिपता हुआ वह मृगरूपधारी मारीच श्रीरघुनाथजी को उनके आश्रम से बहुत दूर खींच ले गया। उस समय उससे मोहित और विवश होकर श्रीराम कुछ कुपित हो उठे और थक कर एक जगह छाया का आश्रय ले हरी-हरी घासवाली भूमि पर खड़े हो गये। इस मृगरूपधारी निशाचर ने उन्हें उन्मत्त-सा कर दिया था। थोड़ी ही देर में वह दूसरे मृगों से घिरा हुआ पास ही दिखायी दिया। श्रीराम मुझे पकड़ना चाहते हैं, यह देखकर वह फिर भागा और भय के मारे पुनः तत्काल ही अदृश्य हो गया।
तदनन्तर वह पुन: दूरवर्ती वृक्ष समूह से होकर निकला। उसे देखकर महातेजस्वी श्रीराम ने मार डालने का निश्चय किया। तब वहाँ क्रोध में भरे हुए बलवान् राघवेन्द्र श्रीराम ने तरकस से सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी एक प्रज्वलित एवं शत्रु-संहारक बाण निकालकर उसे अपने सुदृढ धनुष पर रखा और उस धनुष को जोर से खींचकर उस मृग को ही लक्ष्य करके फुफकारते सर्प के समान सनसनाता हुआ वह प्रज्वलित एवं तेजस्वी बाण, जिसे ब्रह्माजी ने बनाया था, छोड़ दिया।
वज्र के समान तेजस्वी उस उत्तम बाण ने मृगरूपधारी मारीच के शरीर को चीरकर उसके हृदय को भी विदीर्ण कर दिया। उसकी चोट से अत्यन्त आतुर हो वह राक्षस ताड़ के बराबर उछलकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका जीवन समाप्त हो चला। वह पृथ्वी पर पड़ा पड़ा भयंकर गर्जना करने लगा। मरते समय मारीच ने अपने उस कृत्रिम शरीर को त्याग दिया। फिर रावण के वचन का स्मरण करके उस राक्षस ने सोचा, किस उपाय से सीता लक्ष्मण को यहाँ भेज दे और सूने आश्रम से रावण उसे हर ले जाय।
रावण के बताये हुए उपाय को काम में लाने का अवसर आ गया है - यह समझकर उसने श्रीरामचन्द्रजी के ही समान स्वर में 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहकर पुकारा।
श्रीराम के अनुपम बाण से उसका मर्म विदीर्ण हो गया था, अत: उस मृगरूप को त्यागकर उसने राक्षस रूप धारण कर लिया। प्राणत्याग करते समय मारीच ने अपने शरीर को बहुत बड़ा बना लिया था। भयंकर दिखायी देने वाले उस राक्षस को भूमि पर पड़कर खून से लथपथ हो धरती पर लोटते और छटपटाते देख श्रीराम को लक्ष्मण की कही हुई बात याद आ गयी और वे मन-ही-मन सीता की चिन्ता करने लगे।
वे सोचने लगे - अहो! जैसा लक्ष्मणने पहले कहा था, उसके अनुसार यह वास्तव में मारीच की माया ही थी । लक्ष्मण की बात ठीक निकली। आज मेरे द्वारा यह मारीच ही मारा गया। परंतु यह राक्षस उच्च स्वर से 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' की पुकार करके मरा है। उसके उस शब्द को सुनकर सीता की कैसी अवस्था हो जायगी और महाबाहु लक्ष्मण की भी क्या दशा होगी ?
ऐसा सोचकर धर्मात्मा श्रीराम के रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ मृगरूपधारी उस राक्षस को मारकर और उसके उस शब्द को सुनकर श्रीराम के मन में विषादजनित तीव्र भय समा गया। उस लोकविलक्षण मृग का वध करके तपस्वी के उपभोग में आने योग्य फल- मूल आदि लेकर श्रीराम तत्काल ही जनस्थान के निकटवर्ती पञ्चवटी में स्थित अपने आश्रम की ओर बड़ी उतावली के साथ चले।
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का
