भाग-४१(41) श्रीराम का श्रृङ्गवेरपुर में गङ्गातट पर पहुँचकर रात्रि में निवास करना, वहाँ निषादराज गुह द्वारा उनका सत्कार

 


इसके बाद पुरुषसिंह श्रीराम रथ के द्वारा ही उस कोशल जनपद को लाँघ गये, जो धन-धान्य से सम्पन्न और सुखदायक था। वहाँ के सब लोग दानशील थे। उस जनपद में कहीं से कोई भय नहीं था । वहाँ के भूभाग रमणीय एवं चैत्य-वृक्षों तथा यज्ञ-सम्बन्धी यूपों से व्याप्त थे। बहुत से उद्यान और आमों के वन उस जनपद की शोभा बढ़ाते थे। वहाँ जल से भरे हुए बहुत-से जलाशय सुशोभित थे। सारा जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरा था ; गौओं के समूहों से व्याप्त और सेवित था। वहाँ के ग्रामों की बहुत-से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रों की ध्वनि गूँजती रहती थी। 

कोशलदेश से आगे बढ़ने पर धैर्यवानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी मध्यमार्ग से ऐसे राज्य में होकर निकले, जो सुख- सुविधा से युक्त, धन-धान्यसे सम्पन्न, रमणीय उद्यानों से व्याप्त तथा सामन्त नरेशों के उपभोग में आनेवाला था। उस राज्य में श्रीरघुनाथजी ने त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गङ्गा का दर्शन किया, जो शीतल जल से भरी हुई, सेवारों से रहित तथा रमणीय थीं। बहुत से महर्षि उनका सेवन करते थे। उनके तट पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर बहुत-से सुन्दर आश्रम बने थे, जो उन देवनदी की शोभा बढ़ाते थे। समय- समय पर हर्ष भरी अप्सराएँ भी उतर कर उनके जलकुण्ड का सेवन करती हैं। वे गङ्गा सबका कल्याण करनेवाली हैं। 

देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उन शिवस्वरूपा भागीरथी की शोभा बढ़ाते हैं। नागों और गन्धर्वों की पत्नियाँ उनके जल का सदा सेवन करती हैं। गङ्गा के दोनों तटों पर देवताओं के सैकड़ों पर्वतीय क्रीडास्थल हैं। उनके किनारे देवताओं के बहुत से उद्यान भी हैं। वे देवताओं की क्रीड़ा के लिये आकाश में भी विद्यमान हैं और वहाँ देवपद्मिनी के रूप में विख्यात हैं। प्रस्तरखण्डों से गङ्गा के जल के टकराने से जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है। जल से जो फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदी का निर्मल हास है। कहीं तो उनका जल वेणी के आकार का है और कहीं वे भँवरों से सुशोभित होती हैं। 

कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है। कहीं वे महान् वेग से व्याप्त हैं। कहीं उनके जल से मृदङ्ग आदि के समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदि के समान भयंकर नाद सुनायी पड़ता है। उनके जल में देवताओं के समुदाय गोते लगाते हैं। कहीं-कहीं उनका जल नील कमलों अथवा कुमुदों से आच्छादित होता है। कहीं विशाल पुलिन का दर्शन होता है तो कहीं निर्मल 'बालुका-राशिका' हंसों और सारसों के कल्रव वहाँ गूंजते रहते हैं। चकवे उन देवनदी की शोभा बढ़ाते हैं। सदा मदमत्त रहने वाले विहंगम उनके जल पर मँडराते रहते हैं। वे उत्तम शोभा से सम्पन्न हैं। 

कहीं तटवर्ती वृक्ष माला कार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलों से आच्छादित है और कहीं कमलवनों से व्याप्त , कहीं कुमुदसमूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं। कहीं नाना प्रकार के पुष्पों के परागों से व्याप्त होकर वे मदमत्त नारी के समान प्रतीत होती हैं। वे मलसमूह (पापराशि) दूर कर देती हैं। उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणि के समान निर्मल दिखायी देता है। उनके तटवर्ती वन का भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराज की सवारी में आनेवाले श्रेष्ठ गजराजों से कोलाहलपूर्ण बना रहता है। 

वे फलों, फूलों, पल्लवों, गुल्मों तथा पक्षियों से आवृत होकर उत्तम आभूषणों से यत्नपूर्वक विभूषित हुई युवती के समान शोभा पाती हैं। उनका प्राकट्य भगवान् विष्णु के चरणोंसे हुआ है। उनमें पाप का लेश भी नहीं है । वे दिव्य नदी गङ्गा जीवों के समस्त पापों का नाश कर देने वाली हैं। उनके जल में सूँस, घड़ियाल और सर्प निवास करते हैं। सगरवंशी राजा भगीरथ के तपोमय तेज से जिनका शंकरजी के जटाजूट से अवतरण हुआ था, जो समुद्र की रानी हैं तथा जिनके निकट सारस और क्रौञ्च पक्षी कलरव करते रहते हैं, उन्हीं देवनदी गङ्गा के पास महाबाहु श्रीरामजी पहुँचे। गङ्गा की वह धारा श्रृङ्गवेरपुर में बह रही थी। जिनके आवर्त (भँवरें) लहरों से व्याप्त थे, उन गङ्गाजी का दर्शन करके महारथी श्रीराम ने सारथी सुमन्त्र से कहा - आर्य सुमंत्र! आज हमलोग यहीं रहेंगे। गङ्गाजी के समीप ही जो यह बहुत से फूलों और नये-नये पल्लवों से सुशोभित महान् इंगुदी का वृक्ष है, इसी के नीचे आज रात में हम निवास करेंगे। जिनका जल देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, सर्पों, पशुओं तथा पक्षियों के लिये भी समादरणीय है, उन कल्याणस्वरूपा, सरिताओं में श्रेष्ठ गङ्गाजी का भी मुझे यहाँ से दर्शन होता रहेगा। 

तब लक्ष्मण और सुमन्त्र भी श्रीरामचन्द्रजी से बहुत अच्छा कहकर अश्वों द्वारा उस इंगुदी वृक्ष के समीप गये। उस रमणीय वृक्ष के पास पहुँचकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ रथ से उतर गये। वहाँ गंगाजी को देखकर श्री रामजी ने बड़े हर्ष के साथ दण्डवत की। लक्ष्मणजी, सुमंत्र और सीताजी ने भी प्रणाम किया। सबके साथ श्री रामचन्द्रजी ने सुख पाया। गंगाजी समस्त आनंद-मंगलों की मूल हैं। वे सब सुखों को करने वाली और सब पीड़ाओं को हरने वाली हैं। अनेक कथा प्रसंग कहते हुए श्री रामजी गंगाजी की तरंगों को देख रहे हैं। उन्होंने मंत्री को, छोटे भाई लक्ष्मणजी को और प्रिया सीताजी को देवनदी गंगाजी की बड़ी महिमा सुनाई। 

इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्ग का सारा श्रम (थकावट) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया। जिनके स्मरण मात्र से (बार-बार जन्म ने और मरने का) महान श्रम मिट जाता है, उनको 'श्रम' होना- यह केवल लौकिक व्यवहार (नरलीला) है। फिर सुमन्त्र ने भी उतरकर उत्तम घोड़ों को खोल दिया और वृक्ष की जड़ पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

श्रृङ्गवेरपुर में गुह नाम का राजा राज्य करता था। वह श्रीरामचन्द्रजी का प्राणों के समान प्रिय मित्र था। उसका जन्म निषादकुल में हुआ था। वह शारीरिक शक्ति और सैनिक शक्ति की दृष्टि से भी बलवान् था तथा वहाँ के निषादों का सुविख्यात राजा था। (निषादराज गुह पर भगवान शिव की कृपा कैसे हुई इसे विस्तार से जानने के लिए अध्याय - १ रामायण माहात्म्य के भाग - ६(6) को पढ़ें।)  

उसने जब सुना कि पुरुषसिंह श्रीराम मेरे राज्य में पधारे हैं, तब वह बूढ़े मन्त्रियों और बन्धु बान्धवों से घिरा हुआ वहाँ आया। निषादराज को दूर से आया हुआ देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ आगे बढ़कर उससे मिले। 

श्रीरामचन्द्रजी को वल्कल आदि धारण किये देख गुह को बड़ा दु:ख हुआ। उसने श्रीरघुनाथजी को हृदय से लगाकर कहा - श्रीराम ! आपके लिये जैसे अयोध्या का राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? महाबाहो! आप-जैसा प्रिय अतिथि किसको सुलभ होगा? 

फिर भाँति-भाँति का उत्तम अन्न लेकर वह सेवा में उपस्थित हुआ। उसने शीघ्र ही अर्घ्य निवेदन किया और इस प्रकार कहा - महाबाहो! आपका स्वागत है। यह सारी भूमि, जो मेरे अधिकार में है, आपकी ही है। हम आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी, आज से आप ही हमारे इस राज्य का भलीभाँति शासन करें। यह भक्ष्य (अन्न आदि), भोज्य (खीर आदि), पेय (पान का रस आदि) तथा लेह्य (चटनी आदि) आपकी सेवा में उपस्थित है, इसे स्वीकार करें। ये उत्तमोत्तम शय्याएँ हैं तथा आपके घोड़ों के खाने के लिये चने और घास आदि भी प्रस्तुत हैं ये सब सामग्री ग्रहण करें'। 

गुह के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया - सखे! तुम्हारे यहाँ तक पैदल आने और स्नेह दिखाने से ही हमारा सदा के लिये भलीभाँति पूजन - स्वागत सत्कार हो गया। तुम से मिलकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। 

फिर श्रीराम ने अपनी दोनों गोल-गोल भुजाओं से गुह का अच्छी तरह आलिङ्गन करते हुए कहा - 'गुह! सौभाग्य की बात है कि मैं आज तुम्हें बन्धु बान्धवों के साथ स्वस्थ एवं सानन्द देख रहा हूँ। बताओ, तुम्हारे राज्य में, मित्रों के यहाँ तथा वनों में सर्वत्र कुशल तो है ? तुमने प्रेमवश यह जो कुछ सामग्री प्रस्तुत की है, इसे स्वीकार करके मैं तुम्हें वापिस ले जाने की आज्ञा देता हूँ; क्योंकि इस समय दूसरों की दी हुई कोई भी वस्तु मैं ग्रहण नहीं करता - अपने उपयोग में नहीं लाता। 

‘वल्कल और मृगचर्म धारण करके फल- मूल का आहार करता हूँ और धर्म में स्थित रहकर तापसवेश में वनके भीतर ही विचरता हूँ। इन दिनों तुम मुझे इसी नियम में स्थित जानो। इन सामग्रियों में जो घोड़ों के खाने-पीने की वस्तु है, उसी की इस समय मुझे आवश्यकता है, दूसरी किसी वस्तु की नहीं। घोड़ों को खिला-पिला देनेमात्र से तुम्हारे द्वारा मेरा पूर्ण सत्कार हो जायेगा। ये घोड़े मेरे पिता महाराज दशरथ को बहुत प्रिय हैं। इनके खाने-पीने का सुन्दर प्रबन्ध कर देने से मेरा भलीभाँति पूजन हो जायेगा।' 

तब गुह ने अपने सेवकों को उसी समय यह आज्ञा दी कि तुम घोड़ों के खाने-पीने के लिये आवश्यक वस्तुएँ शीघ्र लाकर दो। तत्पश्चात् वल्कल का उत्तरीय वस्त्र धारण करनेवाले श्रीराम ने सायंकाल की संध्योपासना करके भोजन के नाम पर स्वयं लक्ष्मण का लाया हुआ केवल जलमात्र पी लिया । फिर पत्नीसहित श्रीराम भूमि पर ही तृण की शय्या बिछाकर सोये। उस समय लक्ष्मण उनके दोनों चरणों को धो- पोंछ कर वहाँ से कुछ दूर पर हट आये और एक वृक्ष का सहारा लेकर बैठ गये। गुह भी सावधानी के साथ धनुष धारण करके सुमन्त्र के साथ बैठकर सुमित्रा कुमार लक्ष्मण से बातचीत करता हुआ श्रीराम की रक्षा के लिये रात भर जागता रहा। इस प्रकार सोये हुए यशस्वी मनस्वी दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम की, जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा था तथा जो सुख भोगने ही योग्य थे, वह रात उस समय (नींद न आने के कारण) बहुत देर के बाद व्यतीत हुई। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-४१(41) समाप्त !

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