भाग-४०(40) कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को जीवित या मृत अवस्था में भी ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना

 


वह मृग सोने और चाँदी के समान कान्ति वाले पार्श्व भागों से सुशोभित था। शुद्ध सुवर्ण के समान कान्ति तथा निर्दोष अङ्गों वाली सुन्दरी सीता फूल चुनते- चुनते ही उस मृग को देखकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पति श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण को हथियार लेकर आने के लिये पुकारने लगीं। वे बार-बार उन्हें पुकारतीं और फिर उस मृग को अच्छी तरह देखने लगती थीं। 

वे बोलीं, 'आर्यपुत्र! अपने भाई के साथ आइये, शीघ्र आइये। 

विदेहकुमारी सीता के द्वारा पुकारे जाने पर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ आये और उस स्थान पर सब ओर दृष्टि डालते हुए उन्होंने उस समय उस मृग को देखा। 

उसे देखकर लक्ष्मण के मन में संदेह हुआ और वे बोले - भैया! मैं तो समझता हूँ कि इस मृग के रूप में वह मारीच नाम का राक्षस ही आया है। श्रीराम! स्वेच्छानुसार रूप धारण करने वाले इस पापी ने कपट-वेष बनाकर वन में शिकार खेलने के लिये आये हुए कितने ही हर्षोत्फुल्ल नरेशों का वध किया है। पुरुषसिंह! यह अनेक प्रकार की मायाएँ जानता है। इसकी जो माया सुनी गयी है, वही इस प्रकाशमान मृगरूप में परिणत हो गयी है। यह गन्धर्व-नगर के समान देखने भर के लिये ही है (इसमें वास्तविकता नहीं है ) |रघुनन्दन ! पृथ्वीनाथ! इस भूतल पर कहीं भी ऐसा विचित्र रत्नमय मृग नहीं है; अतः निःसंदेह यह माया ही है। 

मारीच के छल से जिनकी विचारशक्ति हर ली गयी थी, उन पवित्र मुसकान वाली सीता ने उपर्युक्त बातें कहते हुए लक्ष्मण को रोककर स्वयं ही बड़े हर्ष के साथ कहा - 'आर्यपुत्र ! यह मृग बड़ा ही सुन्दर है। इसने मेरे मन को हर लिया है। महाबाहो ! इसे ले आइये। यह हम लोगों के मन बहलाव के लिये रहेगा। राजन्! महाबाहो ! यद्यपि हमारे इस आश्रम पर बहुत से पवित्र एवं दर्शनीय मृग एक साथ आकर चरते हैं तथा सृमर (काली पूँछवाली चवँरी गाय), चमर (सफेद पूँछवाली चवँरी गाय), रीछ, चितकबरे मृगों के झुंड, वानर तथा सुन्दर रूप वाले महाबली किन्नर भी विचरण करते हैं, तथापि आज के पहले मैंने दूसरा कोई ऐसा तेजस्वी, सौम्य और दीप्तिमान् मृग नहीं देखा था, जैसा कि यह श्रेष्ठ मृग दिखायी दे रहा है। 

‘नाना प्रकार के रंगों से युक्त होने के कारण इसके अङ्ग विचित्र जान पड़ते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अङ्गों का ही बना हुआ हो। मेरे आगे निर्भय एवं शान्तभाव से स्थित होकर इस वन को प्रकाशित करता हुआ यह चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा है। इसका रूप अद्भुत है। इसकी शोभा अवर्णनीय है। इसकी स्वरसम्पत्ति (बोली) बड़ी सुन्दर है। विचित्र अङ्गों से सुशोभित यह अद्भुत मृग मेरे मन को मोहे लेता है। 

'यदि यह मृग जीते-जी ही आपकी पकड़ में आ जाय तो एक आश्चर्य की वस्तु होगा और सबके हृदय में विस्मय उत्पन्न कर देगा। जब हमारे वनवास की अवधि पूरी हो जायगी और हम पुनः अपना राज्य पा लेंगे, उस समय यह मृग हमारे अन्त:पुर की शोभा बढ़ायेगा। प्रभो! इस मृग का यह दिव्य रूप भरत के, आपके, मेरी सासुओं के और मेरे लिये भी विस्मयजनक होगा।' 

‘पुरुषसिंह! यदि कदाचित् यह श्रेष्ठ मृग जीते-जी पकड़ा न जा सके तो इसका चमड़ा ही बहुत सुन्दर होगा। घास-फूस की बनी हुई चटाई पर इस मरे हुए मृग का सुवर्णमय चमड़ा बिछाकर मैं इस पर आपके साथ बैठना चाहती हूँ। यद्यपि स्वेच्छा से प्रेरित होकर अपने पति को ऐसे काम में लगाना यह भयंकर स्वेच्छाचार है और साध्वी स्त्रियों के लिये उचित नहीं माना गया है तथापि इस जन्तु के शरीर ने मेरे हृदय में विस्मय उत्पन्न कर दिया है (इसीलिये मैं इसको पकड़ लाने के लिये अनुरोध करती हूँ)।' 

सुनहरी रोमावली, इन्द्रनील मणि के समान सींग, उदयकाल के सूर्यकी - सी कान्ति तथा नक्षत्रलोक की भाँति विन्दुयुक्त तेज से सुशोभित उस मृग को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का मन भी विस्मित हो उठा। 

सीता की पूर्वोक्त बात को सुनकर, उस मृग के अद्भुत रूप को देखकर, उसके उस रूप पर लुभाकर और सीता से प्रेरित होकर हर्ष से भरे हुए श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण से कहा - लक्ष्मण! देखो तो सही, विदेहूनन्दिनी सीता के मन में इस मृग को पाने के लिये कितनी प्रबल इच्छा जाग उठी है? वास्तव में इसका रूप है भी बहुत ही सुन्दर। अपने रूप की इस श्रेष्ठता के कारण ही यह मृग आज जीवित नहीं रह सकेगा। सुमित्रानन्दन! देवराज इन्द्र के नन्दनवन में और कुबेर के चैत्ररथवन में भी कोई ऐसा मृग नहीं होगा, जो इसकी समानता कर सके। फिर पृथ्वी पर तो हो ही कहाँ से सकता है। 

'टेढ़ी और सीधी रुचिर रोमावलियाँ इस मृग के शरीर का आश्रय ले सुनहरे बिन्दुओं से चित्रित हो बड़ी शोभा पा रही हैं। देखो न, जब यह जँभाई लेता है, तब इसके मुख से प्रज्वलित अग्निशिखा के समान दमकती हुई जिह्वा बाहर निकल आती है और मेघ से प्रकट हुई बिजली के समान चमकने लगती है। इसका मुख्-सम्पुट इन्द्रनीलमणि के बने हुए चषक (पानपात्र) के समान जान पड़ता है, उदर शङ्ख और मोती के समान सफेद है। यह अवर्णनीय मृग किसके मन को नहीं लुभा लेगा।' 

‘नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित इसके सुनहरी प्रभावाले दिव्य रूप को देखकर किसके मन में विस्मय नहीं होगा। लक्ष्मण! राजालोग बड़े-बड़े वनों में मृगया खेलते समय मांस (मृगचर्म) के लिये और शिकार खेलने का शौक पूरा करने के लिये भी धनुष हाथ में लेकर मृगों को मारते हैं। मृगया के उद्योग से ही राजालोग विशाल वन में धन का भी संग्रह करते हैं; क्योंकि वहाँ मणि, रत्न और सुवर्ण आदि से युक्त नाना प्रकार की धातुएँ उपलब्ध होती हैं।' 

‘लक्ष्मण! कोश की वृद्धि करने वाला वह वन्य धन मनुष्यों के लिये अत्यन्त उत्कृष्ट होता है। ठीक उसी तरह, जैसे ब्रह्मभाव को प्राप्त हुए पुरुष के लिये मन के चिन्तनमात्र से प्राप्त हुई सारी वस्तुएँ अत्यन्त उत्तम बतायी गयी हैं। लक्ष्मण! अर्थी मनुष्य जिस अर्थ (प्रयोजन) का सम्पादन करने के लिये उसके प्रति आकृष्ट हो बिना विचारे ही चल देता है, उस अत्यन्त आवश्यक प्रयोजन को ही अर्थसाधन में चतुर एवं अर्थशास्त्र के ज्ञाता विद्वान् 'अर्थ' कहते हैं। इस रत्नस्वरूप श्रेष्ठ मृग के बहुमूल्य सुनहरे चमड़े पर सुन्दरी विदेहराजनन्दिनी सीता मेरे साथ बैठेगी।' 

'कदली (कोमल ऊँचे चितकबरे और नीलाग्ररोमवाले मृगविशेष), प्रियक (कोमल ऊँचे चिकने और घने रोम वाले मृगविशेष), प्रवेण (विशेष प्रकार के बकरे ) और अवि (भेड़) की त्वचा भी स्पर्श करने में इस काञ्चन मृग के छाले के समान कोमल एवं सुखद नहीं हो सकती, ऐसा मेरा विश्वास है। यह सुन्दर मृग और वह जो दिव्य आकाशचारी मृग (मृगशिरा नक्षत्र) है, ये दोनों ही दिव्य मृग हैं। इनमें से एक तारामृग और दूसरा महीमृग है। 

‘लक्ष्मण! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि यह राक्षस की माया ही हो तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिये। क्योंकि अपवित्र (दुष्ट) चित्तवाले इस क्रूरकर्मा मारीच ने वन में विचरते समय पहले अनेकानेक श्रेष्ठ मुनियों की हत्या की है। इसने मृगया के समय प्रकट होकर बहुत से महाधनुर्धर नरेशों का वध किया है, अत: इस मृग के रूप में इसका भी वध अवश्य करने योग्य है। इसी वन में पहले वातापि नामक राक्षस रहता था, जो तपस्वी महात्माओं का तिरस्कार करके कपटपूर्ण उपाय से उनके पेट में पहुँच जाता और जैसे खच्चरी को अपने ही गर्भ का बच्चा नष्ट कर देता है, उसी प्रकार उन ब्रह्मर्षियों को नष्ट कर देता था।' 

'वह वातापि एक दिन दीर्घकाल के पश्चात् लोभवश तेजस्वी महामुनि अगस्त्यजी के पास जा पहुँचा और (श्राद्धकाल में) उनका आहार बन गया। उनके पेट में पहुँच गया। श्राद्ध के अन्त में जब वह अपना राक्षसरूप प्रकट करने की इच्छा करने लगा उनका पेट फाड़कर निकल आने को उद्यत हुआ, तब उस वातापि को लक्ष्य करके भगवान् अगस्त्य मुसकराये और उससे इस प्रकार बोले – "वातापे! तुमने बिना सोचे- विचारे इस जीव जगत में बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने तेज से तिरस्कृत किया है, उसी पाप से अब तुम पच गये।" 

‘लक्ष्मण! जो सदा धर्म में तत्पर रहने वाले मुझ जैसे जितेन्द्रिय पुरुष का भी अतिक्रमण करे, उस मारीच नामक राक्षस को भी वातापि के समान ही नष्ट हो जाना चाहिये। जैसे वातापि अगस्त्य के द्वारा नष्ट हुआ, उसी प्रकार यह मारीच अब मेरे सामने आकर अवश्य ही मारा जायगा। तुम अस्त्र और कवच आदि से सुसज्जित हो जाओ और यहाँ सावधानी के साथ मिथिलेशकुमारीकी रक्षा करो। रघुनन्दन! हम लोगों का जो आवश्यक कर्तव्य है, वह सीता की रक्षा के ही अधीन है। मैं इस मृग को मार डालूँगा अथवा इसे जीता ही पकड़ लाऊँगा।' 

'सुमित्राकुमार लक्ष्मण! देखो, इस मृग का चर्म हस्तगत करने के लिये विदेहनन्दिनी को कितनी उत्कण्ठा हो रही है, इसलिये इस मृग को ले आने के लिये मैं तुरंत ही जा रहा हूँ। इस मृग को मारने का प्रधान हेतु है, इसके चमड़े को प्राप्त करना। आज इसी के कारण यह मृग जीवित नहीं रह सकेगा। लक्ष्मण! तुम आश्रम पर रहकर सीता के साथ सावधान रहना - सावधानी के साथ तब तक इसकी रक्षा करना, जब तक कि मैं एक ही बाण से इस चितकबरे मृग को मार नहीं डालता हूँ। मारने के पश्चात् इसका चमड़ा लेकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा।' 

'लक्ष्मण! बुद्धिमान् पक्षी गृध्रराज जटायु बड़े ही बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं। उनके साथ ही यहाँ सदा सावधान रहना। मिथिलेशकुमारी सीता को अपने संरक्षण में लेकर प्रतिक्षण सब दिशाओं में रहने वाले राक्षसों की ओर से चौकन्ने रहना।' 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-४०(40) समाप्त !

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