भाग-४०(40) ग्रामवासियों की बातें सुनते हुए श्रीराम का कोशल जनपद को लाँघते हुए आगे जाना और वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दिका नदियों को पार करके मार्ग में अयोध्यापुरी से वनवास की आज्ञा माँगना

 


उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिता की आज्ञा का बारंबार स्मरण करते हुए उस शेष रात्रि में ही बहुत दूर निकल गये। उसी तरह चलते-चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी। सवेरा होने पर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदों को लाँघते हुए चल दिये। वे जिनकी सीमा के पास की भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलों से सुशोभित वनों को देखते हुए उत्तम घोड़ों द्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर दृश्यों के देखने में तन्मय रहने के कारण उन्हें उस रथ की गति धीमी-सी ही जान पड़ती थी।

मार्ग में जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करनेवाले मनुष्यों की निम्नाकित बातें उनके कानों में पड़ रही थीं - अहो! काम के वश में पड़े हुए राजा दशरथ को धिक्कार है! हाय! हाय! पापशीला, पापासक्त, क्रूर तथा धर्ममर्यादा का त्याग करने वाली कैकेयी को तो दया छू भी नहीं गयी है, वह क्रूर अब निष्ठुर कर्म में ही लगी रहती है। जिसने महाराज के ऐसे धर्मात्मा, महाज्ञानी, दयालु और जितेन्द्रिय पुत्र को वनवास के लिये घर से निकलवा दिया है। जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुखों में ही रत रहती थीं, अब वनवास के दुःख कैसे भोग सकेंगी? अहो! क्या राजा दशरथ अपने पुत्र के प्रति इतने स्नेहहीन हो गये, जो प्रजाओं के प्रति कोई अपराध न करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी का यहाँ परित्याग कर देना चाहते हैं। 

छोटे-बड़े गाँवों में रहनेवाले मनुष्यों की ये बातें सुनते हुए वीर कोशलपति श्रीराम कोशल जनपद की सीमा लाँघकर आगे बढ़ गये। तदनन्तर शीतल एवं सुखद जल बहाने वाली वेदश्रुति नामक नदी को पार करके श्रीरामचन्द्रजी अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशा की ओर बढ़ गये। दीर्घकाल तक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदी को पार किया, जो शीतल जल का स्रोत बहाती थी। उसके कछार में बहुत-सी गौएँ विचरती थीं। शीघ्रगामी घोड़ों द्वारा गोमती नदी को लाँघ करके श्रीरघुनाथजी ने मोरों और हंसों के कलरवों से व्याप्त स्यन्दिका नामक नदी को भी पार किया। वहाँ जाकर श्रीराम ने धन-धान्य से सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदों से घिरी हुई भूमि का सीता को दर्शन कराया, जिसे पूर्वकाल में राजा मनु ने इक्ष्वाकु को दिया था। 

फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीराम ने सारथि सुमंत्र को बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंस के समान मधुर स्वर में इस प्रकार कहा – सुमंत्र ! मैं कब पुन: लौटकर माता-पिता से मिलूँगा और सरयू के पार्श्ववर्ती पुष्पित वन में मृगया के लिये भ्रमण करूँगा? मैं सरयू के वन में शिकार खेलने की बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता। यह लोक में 'एक प्रकार की अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियों के समुदाय को अभिमत है। इस लोक में वन में जाकर शिकार खेलना राजर्षियों की क्रीड़ा के लिये प्रचलित हुआ था। अतः मनुपुत्रों द्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य धनुर्धरों को भी अभीष्ट हुई। 

इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी विभिन्न विषयों को लेकर सुमंत्र से मधुर वाणी में उपयुक्त बातें कहते हुए उस मार्ग पर बढ़ते चले गये। इस प्रकार विशाल और रमणीय कोशलदेश की सीमा को पार करके लक्ष्मण के बड़े भाई बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी ने अयोध्या की ओर अपना मुख किया और हाथ जोड़कर कहा – ककुत्स्थवंशी राजाओं से परिपालित पुरीशिरोमणि अयोध्ये! मैं तुमसे तथा जो-जो देवता तुम्हारी रक्षा करते और तुम्हारे भीतर निवास करते हैं, उनसे भी वन में जाने की आज्ञा चाहता हूँ। वनवास की अवधि पूरी करके महाराज के ऋण से उऋण हो मैं पुन: लौटकर तुम्हारा दर्शन करूँगा और अपने माता-पिता से भी मिलूँगा। 

इसके बाद सुन्दर एवं अरुण नेत्रवाले श्रीराम ने दाहिनी भुजा उठाकर नेत्रों से आँसू बहाते हुए दु:खी होकर जनपद के लोगों से कहा - आपने मुझ पर बड़ी कृपा की और यथोचित दया दिखायी। मेरे लिये आप लोगों ने बहुत देर तक कष्ट सहन किया। इस तरह आपका देर तक दु:ख में पड़े रहना अच्छा नहीं है; इसलिये अब आप लोग अपना-अपना कार्य करने के लिये जाइये। 

यह सुनकर उन मनुष्यों ने महात्मा श्रीराम को प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और घोर विलाप करते हुए वे जहाँ-तहाँ खड़े हो गये। उनकी आँखें अभी श्रीराम के दर्शन से तृप्त नहीं हुई थीं और वे पूर्वोक्त रूप से विलाप कर ही रहे थे, इतने में श्रीरघुनाथजी उनकी दृष्टि से ओझल हो गये, जैसे सूर्य प्रदोषकाल में छिप जाते हैं। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-४०(40) समाप्त !

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