भाग-३(3) सीता - अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना

 


धर्म का आचरण करने वाली महाभागा सीता को देखकर बूढ़ी अनसूया देवी उन्हें सान्त्वना देती हुई बोलीं - सीते! सौभाग्य की बात है कि तुम धर्म पर ही दृष्टि रखती हो। मानिनी सीते! बन्धु बान्धवों को छोड़कर और उनसे प्राप्त होने वाली मान-प्रतिष्ठा का परित्याग करके तुम वन में भेजे हुए श्रीराम का अनुसरण कर रही हो - यह बड़े सौभाग्य की बात है। अपने स्वामी नगर में रहें या वन में, भले हों या बुरे, जिन स्त्रियों को वे प्रिय होते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयशाली लोकों की प्राप्ति होती है। 

'पति बुरे स्वभाव का, मनमाना बर्ताव करने वाला अथवा धनहीन ही क्यों न हो, वह उत्तम स्वभाववाली नारियों के लिये श्रेष्ठ देवता के समान है। विदेहराजनन्दिनि! मैं बहुत विचार करने पर भी पति से बढ़कर कोई हितकारी बन्धु नहीं देखती। अपनी की हुई तपस्या के अविनाशी फल की भाँति वह इस लोक और परलोक में सर्वत्र सुख पहुँचाने में समर्थ होता है।' 

'जो अपने पति पर भी शासन करती हैं, वे काम के अधीन चित्तवाली असाध्वी स्त्रियाँ इस प्रकार पति का अनुसरण नहीं करतीं। उन्हें गुण-दोषों का ज्ञान नहीं होता; अत: वे इच्छानुसार इधर-उधर विचरती रहती हैं। मिथिलेशकुमारी! ऐसी नारियाँ अवश्य ही अनुचित कर्म में फँसकर धर्म से भ्रष्ट हो जाती हैं और संसार में उन्हें अपयश की प्राप्ति होती है। किंतु जो तुम्हारे समान लोक-परलोक को जानने वाली साध्वी स्त्रियाँ हैं, वे उत्तम गुणों से युक्त होकर पुण्यकर्मों में संलग्न रहती हैं; अत: वे दूसरे पुण्यात्माओं की भाँति स्वर्गलोक में विचरण करेंगी।' 

'हे राजकुमारी! सुनो- माता, पिता, भाई सभी हित करने वाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही (सुख) देने वाले हैं, परन्तु हे जानकी! पति तो (मोक्ष रूप) असीम (सुख) देने वाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती। धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है।'

'जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत में (मेरे पति को छोड़कर) दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है। मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराए पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो (अर्थात समान अवस्था वाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।) जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्न श्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं।'

'और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराए पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है। क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है।'

'किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है। स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। (पतिव्रत धर्म के कारण ही) आज भी 'तुलसीजी' भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं।'

'हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्री रामजी प्राणों के समान प्रिय हैं, यह (पतिव्रत धर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिए कही है। अत: तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में लगी रहो - सतीधर्म का पालन करो, पति को प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामी की सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनों की प्राप्ति होगी।' 

तपस्विनी अनसूया के इस प्रकार उपदेश देने पर किसी के प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाली विदेहराजकुमारी सीता ने उनके वचनों की भूरि-भूरि प्रशंसा करके धीरे धीरे इस प्रकार कहना आरम्भ किया - देवी! आप संसारकी स्त्रियों में सबसे श्रेष्ठ हैं। आपके मुँह से ऐसी बातों का सुनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । नारी का गुरु पति ही है, इस विषय में जैसा आपने उपदेश किया है, यह बात मुझे भी पहले से ही विदित है। मेरे पतिदेव यदि अनार्य (चरित्रहीन ) तथा जीविका के साधनोंसे रहित (निर्धन) होते तो भी मैं बिना किसी दुविधा के इनकी सेवा में लगी रहती। 

'फिर जब कि ये अपने गुणों के कारण ही सबकी प्रशंसा के पात्र हैं, तब तो इनकी सेवा के लिये कहना ही क्या है। ये श्रीरघुनाथजी परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखनेवाले, धर्मात्मा तथा माता-पिता के समान प्रिय हैं।  ये महाबली अपनी माता कौशल्या के प्रति जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही महाराज दशरथ की दूसरी रानियों के साथ भी करते हैं।' 

‘महाराज दशरथ ने एक बार भी जिन स्त्रियों को प्रेमदृष्टि से देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माता के समान ही बर्ताव करते हैं। जब मैं पति के साथ निर्जन वन में आने लगी, उस समय मेरी सास कौशल्या ने मुझे जो कर्तव्य का उपदेश दिया था, वह मेरे हृदय में ज्यों-का-त्यों स्थिरभाव से अङ्कित है।' 

‘पहले मेरे विवाह-काल में अग्नि के समीप माता ने मुझे जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे अच्छी तरह याद है। धर्मचारिणि! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनों ने अपने वचनों द्वारा जो-जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है। स्त्री के लिये पति की सेवा के अतिरिक्त दूसरे किसी तप का विधान नहीं है।' 

‘सत्यवान की पत्नी सावित्री पति की सेवा करके ही स्वर्गलोक में पूजित हो रही हैं। उन्हीं के समान बर्ताव करने वाली आप (अनसूया देवी) ने भी पति की सेवा के ही प्रभाव से स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त कर लिया है। सम्पूर्ण स्त्रियों में श्रेष्ठ यह स्वर्ग की देवी रोहिणी पतिसेवा के प्रभाव से ही एक मुहूर्त के लिये भी चन्द्रमा से विलग होती नहीं देखी जाती। इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य धर्म का पालन करनेवाली बहुत-सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्म के बल से देवलोक में आदर पा रही हैं।' 

तदनन्तर सीता के कहे हुए वचन सुनकर अनसूया को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने उनका मस्तक सूँघा और फिर उन मिथिलेशकुमारी का हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा - उत्तम व्रत का पालन करनेवाली सीते! मैंने अनेक प्रकार के नियमों का पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है। उस तपोबलका ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगने के लिये कहती हूँ। मिथिलेशकुमारी सीते! तुमने बहुत ही युक्तियुक्त और उत्तम वचन कहा है। उसे सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ है, अत: बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?

उनका यह कथन सुनकर सीता को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तपोबलसम्पन्न अनसूया से मन्द मन्द मुसकराती हुई बोलीं – आपने अपने वचनों द्वारा ही मेरा सारा प्रिय कार्य कर दिया, अब और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। 

सीता के ऐसा कहने पर धर्मज्ञ अनसूया को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोलीं - सीते! तुम्हारी निर्लोभता से जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुममें जो लोभहीनता के कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूंगी। यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, यह अङ्गराग और बहुमूल्य अनुलेपन मैं तुम्हें देती हूँ। विदेह- नन्दिनि सीते! मेरी दी हुई ये वस्तुएँ तुम्हारे अङ्गों की शोभा बढ़ायेंगी। ये कभी मलिन नहीं होते। ये सभी वस्त्र आभूषण मुझे देवताओं ने प्रदान किये थे। ये सब तुम्हारे ही योग्य हैं और सदा उपयोग में लायी जाने पर निर्दोष एवं निर्विकार रहेंगी। ' 

'जनककिशोरी ! इस दिव्य अङ्गराग को अङ्गों में लगाकर तुम अपने पति को उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान् विष्णु की शोभा बढ़ाती है।' 

अनसूया की आज्ञा से धीर स्वभाववाली यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीता ने उस वस्त्र, अङ्गराग, आभूषण हार को उनकी प्रसन्नता का परम उत्तम उपहार समझकर ले लिया। उस प्रेमोपहार को ग्रहण करके वे दोनों हाथ जोड़कर उन तपोधना अनसूया की सेवा में बैठी रहीं। 

तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करनेवाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया - सीते! इन यशस्वी राघवेन्द्र ने तुम्हें स्वयंवर में प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुनने में आयी है। मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस वृत्तान्त को विस्तार के साथ सुनना चाहती हूँ। अतः जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्णरूप से मुझे बताओ। 

उनके इस प्रकार आज्ञा देने पर सीता ने उन धर्मचारिणी तापसी अनसूया से कहा – "माताजी! सुनिये।' ऐसा कहकर उन्होंने उस कथा को इस प्रकार कहना आरम्भ किया - मिथिला जनपद के वीर राजा 'जनक' नाम से प्रसिद्ध हैं। वे धर्म के ज्ञाता हैं, अतः क्षत्रियोचित कर्म में तत्पर रहकर न्यायपूर्वक पृथ्वी का पालन करते हैं। एक समय की बात है, वे यज्ञ के योग्य क्षेत्र को हाथ में हल लेकर जोत रहे थे; इसी समय मैं पृथ्वी को फाड़कर प्रकट हुई। इतने मात्र से ही मैं राजा जनक की पुत्री हुई। 

‘वे राजा उस क्षेत्र में ओषधियों को मुट्ठी में लेकर बो रहे थे। इतने ही में उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गों में धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्था में मुझे देखकर राजा जनक को बड़ा विस्मय हुआ। उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोद में ले लिया और 'यह मेरी पुत्री है' ऐसा कहकर मुझ पर अपने हृदय का सारा स्नेह उड़ेल दिया। 

'इसी समय आकाशवाणी हुई, जो स्वरूपतः मानवी भाषा में कही गयी थी (अथवा मेरे विषय में प्रकट हुई वह वाणी अमानुषी - दिव्य थी।) उसने कहा – 'नरेश्वर! तुम्हारा कथन ठीक है, यह कन्या धर्मतः तुम्हारी ही पुत्री है। यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिलानरेश बड़े प्रसन्न हुए। मुझे पाकर उन नरेश ने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी। उन्होंने पुण्यकर्मपरायणा बड़ी रानी को, जो उन्हें अधिक प्रिय थीं, मुझे दे दिया। उन स्नेहमयी महारानी ने मातृसमुचित सौहार्द से मेरा लालन-पालन किया।' 

‘जब पिता ने देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्ता में पड़े। जैसे कमाये हुए धन का नाश हो जाने से निर्धन मनुष्य को बड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाह की चिन्ता से बहुत दु:खी हो गये। संसार में कन्या के पिता को, वह भूतल पर इन्द्र के ही तुल्य क्यों न हो, वरपक्ष के लोगों से, वे अपने समान या अपने से छोटी हैसियत के ही क्यों न हों, प्रायः अपमान उठाना पड़ता है।' 

‘वह अपमान सहन करने की घड़ी अपने लिये बहुत समीप आ गयी है, यह देखकर राजा चिन्ता के समुद्र में डूब गये। जैसे नौकारहित मनुष्य पार नहीं पहुँच पाता, उसी प्रकार मेरे पिता भी चिन्ता का पार नहीं पा रहे थे। मुझे अयोनिजा बिना गर्भ से उत्पन्न) कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पति का विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके। सदा मेरे विवाह की चिन्ता में पड़े रहने वाले उन महाराज के मन में एक दिन यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं धर्मतः अपनी पुत्री का स्वयंवर करूँगा।' 

'उन्हीं दिनों उनके एक महान् यज्ञ में प्रसन्न होकर महात्मा वरुण ने उन्हें एक श्रेष्ठ दिव्य धनुष तथा अक्षय बाणों से भरे हुए दो तरकस दिये। वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य पूरा प्रयत्न करने पर भी उसे हिला भी नहीं पाते थे। भूमण्डल के नरेश स्वप्न में भी उस धनुष को झुकाने में असमर्थ थे। उस धनुष को पाकर मेरे सत्यवादी पिता ने पहले भूमण्डल के राजाओं को आमन्त्रित करके उन नरेशों के समूह में यह बात कही - 'जो मनुष्य इस धनुष को उठाकर इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, मेरी पुत्री सीता उसी की पत्नी होगी, इसमें संशय नहीं है।' 

‘अपने भारीपन के कारण पहाड़ जैसे प्रतीत होनेवाले उस श्रेष्ठ धनुष को देखकर वहाँ आये हुए राजा जब उसे उठाने में समर्थ न हो सके, तब उसे प्रणाम करके चले गये। तदनन्तर ये महातेजस्वी रघुकुल - नन्दन सत्यपराक्रमी आर्य (श्रीराम) अपने भाई लक्ष्मण को साथ लेकर विश्वामित्रजी के साथ मेरे पिता का यज्ञ देखने के लिये मिथिला में पधारे। उस समय मेरे पिता ने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि का बड़ा आदर-सत्कार किया।' 

'तब वहाँ विश्वामित्रजी मेरे पिता से बोले- 'राजन् ! ये दोनों रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथ के पुत्र हैं और आपके उस दिव्य धनुष का दर्शन करना चाहते हैं। आप अपना वह देवप्रदत्त धनुष राजकुमार श्रीराम को दिखाइये। विप्रवर विश्वामित्र के ऐसा कहने पर पिताजी ने उस दिव्य धनुष को मँगवाया और राजकुमार श्रीराम को उसे दिखाया। महाबली और परम पराक्रमी श्रीराम ने पलक मारते-मारते उस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कान तक खींचा। 

‘उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीच से ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये। उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो। तब मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता ने जल का उत्तम पात्र लेकर आर्य (श्रीराम) के हाथ में मुझे दे देने का उद्योग किया। उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथ के अभिप्राय को जाने बिना आर्य (श्रीराम) ने राजा जनक के देने पर भी मुझे नहीं ग्रहण किया। तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथ की अनुमति लेकर पिताजी ने आत्मज्ञानी श्रीराम को मेरा दान कर दिया।

‘तत्पश्चात् पिताजी ने स्वयं ही मेरी छोटी बहिन सती साध्वी परम सुन्दरी ऊर्मिला को लक्ष्मण की पत्नी रूप से उनके हाथ में दे दिया। मेरे काका कुशध्वज की बड़ी कन्या मांडवी को मेरे बड़े देवर श्रीभरत को तथा उनकी छोटी कन्या श्रुतिकीर्ति को सबसे छोटे देवर वीर शत्रुघ्न के हाथ में दे दिया। इस प्रकार उस स्वयंवर में पिताजी ने श्रीराम के हाथ में मुझको सौंपा था। मैं धर्म के अनुसार अपने पति बलवानों में श्रेष्ठ आर्य (श्रीराम) में सदा अनुरक्त रहती हूँ। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-३(3) समाप्त !

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