रावण से इस प्रकार कठोर बातें कहकर उस निशाचर - राज के भय से दुःखी हुए मारीच ने कहा – 'चलो चलें! मेरे वध के लिये जिनका हथियार सदा उठा ही रहता है, उन धनुष-बाण और तलवार धारण करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने यदि फिर मुझे देख लिया तो मेरे जीवन का अन्त निश्चित है।
श्रीरामचन्द्रजी के साथ पराक्रम दिखाकर कोई जीवित नहीं लौटता है। तुम यमदण्ड से मारे गये हो (इसीलिये उनसे भिड़ने की बात सोचते हो)। वे श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे लिये यमदण्ड के ही समान हैं। परंतु जब तुम इस प्रकार दुष्टतापर उतारू हो गये, तब मैं क्या कर सकता हूँ। लो, यह मैं चलता हूँ। निशाचर! तुम्हारा कल्याण हो।
जब मारीच ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्री रघुनाथजी की शरण तकी (अर्थात उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा)। (सोचा कि) उत्तर देते ही (नाहीं करते ही) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्री रघुनाथजी के बाण लगने से ही क्यों न मरूँ।
मारीच के उस वचन से राक्षस रावण को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उसे कसकर हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा - यह तुमने वीरता की बात कही है; क्योंकि अब तुम मेरी इच्छा के वशवर्ती हो गये हो। इस समय तुम वास्तव में मारीच हो। पहले तुममें किसी दूसरे राक्षस का आवेश हो गया था। यह रत्नों से विभूषित मेरा पुष्पक विमान तैयार है, इस पर मेरे साथ शीघ्रता से बैठ जाओ। (तुम्हारे जिम्मे एक ही काम है) विदेहकुमारी सीता के मन में अपने लिये लोभ उत्पन्न कर दो। उसे लुभाकर तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। आश्रम सूना हो जाने पर मैं मिथिलेशकुमारी सीता को जबरदस्ती उठा लाऊँगा।
तब ताड़का कुमार मारीच ने रावण से कहा - 'तथास्तु' ऐसा ही हो। तदनन्तर रावण और मारीच दोनों उस पुष्पक विमान पर बैठकर शीघ्र ही उस आश्रममण्डल से चल दिये।
इधर लक्ष्मणजी जब कंद-मूल-फल लेने के लिए वन में गए, तब (अकेले में) कृपा और सुख के समूह श्री रामचंद्रजी हँसकर जानकीजी से बोले - हे प्रिये! हे सुंदर पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो।
श्री रामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्री सीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गईं। सीताजी ने अपनी ही छाया मूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके जैसे ही शील-स्वभाव और रूप वाली तथा वैसे ही विनम्र थी। भगवान ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मणजी ने भी नहीं जाना।
(जब रावण सीता का हरण करने आया, तो असली सीता (लक्ष्मी रूप) अग्नि में समा गईं और रावण ने वेदवती की आत्मा, जिसे 'माया सीता' कहा जाता है, का हरण किया। वेदवती ने ही लंका में अशोक वाटिका का दुख सहा। पूर्वकाल में एक समय वेदवती नाम की तपस्विनी ने भगवान विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। जिसे रावण ने भंग किया था। (इस कथा को विस्तार से जानने के लिए अध्याय - ३ रावण चरित्र के भाग-३८ को पढ़ें।)
(तब वेदवती ने क्रुद्ध होकर रावण को यह शाप दिया था की वह फिर जन्म लेगी और उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। चूँकि भगवान राम ने एक पत्नीव्रत का वचन लिया था इस कारण वेदवती को उन्होंने पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया। किन्तु उसकी तपस्या का मान रखते हुए उन्होंने माया सीता के रूप में वेदवती को यह अवसर दिया। वेदवती ने सीता बनकर रावण का अंत किया।)
मार्ग में पहले की ही भाँति अनेकानेक वनों, पर्वतों, समस्त नदियों, राष्ट्रों तथा नगरों को देखते हुए दोनों ने दण्डकारण्य में प्रवेश किया और वहाँ मारीच सहित राक्षसराज रावण ने श्रीरामचन्द्रजी का आश्रम देखा।
तब उस सुवर्णभूषित रथ से उतरकर रावण ने मारीच का हाथ अपने हाथ में ले उससे कहा - सखे! यह केलों से घिरा हुआ राम का आश्रम दिखायी दे रहा है। अब शीघ्र ही वह कार्य करो, जिसके लिये हम लोग यहाँ आये हैं।
रावण की बात सुनकर राक्षस मारीच उस समय मृग का रूप धारण करके श्रीराम के आश्रम के द्वार पर विचरने लगा। उस समय उसने देखने में बड़ा ही अद्भुत रूप धारण कर रखा था। उसके सींगों के ऊपरी भाग इन्द्रनील नामक श्रेष्ठ मणि के बने हुए जान पड़ते थे, मुखमण्डल पर सफेद और काले रंग की बूँदें थीं, मुख का रंग लाल कमल के समान था। उसके कान नीलकमल के तुल्य थे और गरदन कुछ ऊँची थी, उदर का भाग इन्द्रनीलमणि की कान्ति धारण कर रहा था। पार्श्वभाग महुए के फूल के समान श्वेतवर्ण के थे, शरीर का सुनहरा रंग कमल के केसर की भाँति सुशोभित होता था।
उसके खुर वैदूर्यमणि के समान, पिंडलियाँ पतली और पूँछ ऊपर से इन्द्रधनुष के रंग की थी, जिससे उसका संगठित शरीर विशेष शोभा पा रहा था। उसकी देह की कान्ति बड़ी ही मनोहर और चिकनी थी। वह नाना प्रकार की रत्नमयी बुँदकियों से विभूषित दिखायी देता था। राक्षस मारीच क्षणभर में ही परम शोभाशाली मृग बन गया।
सीता को लुभाने के लिये विविध धातुओं से चित्रित मनोहर एवं दर्शनीय रूप बनाकर वह निशाचर उस रमणीय वन तथा श्रीराम के उस आश्रम को प्रकाशित करता हुआ सब ओर उत्तम घासों को चरने और विचरने लगा। सैकड़ों रजतमय विन्दुओं से युक्त विचित्र रूप धारण करके वह मृग बड़ा प्यारा दिखायी देता था। वह वृक्षों के कोमल पल्लवों को खाता हुआ इधर-उधर विचरने लगा।
केले के बगीचे में जाकर वह कनेरों के कुञ्ज में जा पहुँचा। फिर जहाँ सीता की दृष्टि पड़ सके, ऐसे स्थान में जाकर मन्दगति का आश्रय ले इधर-उधर घूमने लगा। उसका पृष्ठ भाग कमल के केसर की भाँति सुनहरे रंग का होने के कारण विचित्र दिखायी देता था, इससे उस महान् मृग की बड़ी शौभा हो रही थी। श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम के निकट ही वह अपनी मौज से घूम रहा था। वह श्रेष्ठ मृग कुछ दूर जाकर फिर लौट आता था और वहीं घूमने लगता था। दो घड़ी के लिये कहीं चला जाता और फिर बड़ी उतावली के साथ लौट आता था।
वह कहीं खेलता, कूदता और पुन: भूमि पर ही बैठ जाता था, फिर आश्रम के द्वार पर आकर मृगों के झुंड के पीछे- पीछे चल देता। तत्पश्चात् झुंड-के-झुंड मृगों को साथ लिये फिर लौट आता था। उस मृगरूप धारी राक्षस के मन में केवल यह अभिलाषा थी कि किसी तरह सीता की दृष्टि मुझ पर पड़ जाय। सीता के समीप आते समय वह विचित्र मण्डल (पैंतरे) दिखाता हुआ चारों ओर चक्कर लगाता था। उस वन में विचरने वाले जो दूसरे मृग थे, वे सब उसे देखकर पास आते और उसे सूँघकर दसों दिशाओं में भाग जाते थे।
राक्षस मारीच यद्यपि मृगों के वध में ही तत्पर रहता था तथापि उस समय अपने भाव को छिपाने के लिये उन वन्य मृगों का स्पर्श करके भी उन्हें खाता नहीं था। उसी समय मदभरे सुन्दर नेत्रों वाली विदेहनन्दिनी सीता, जो फूल चुनने में लगी हुई थीं, कनेर, अशोक और आम के वृक्षों को लाँघती हुई उधर आ निकलीं। फूलों को चुनती हुई वे वहीं विचरने लगीं। उनका मुख बड़ा ही सुन्दर था। वे वनवास का कष्ट भोगने के योग्य नहीं थीं। परम सुन्दरी सीता ने उस रत्नमय मृग को देखा, जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग मुक्तामणियों से चित्रित-सा जान पड़ता था।
उसके दाँत और ओठ बड़े सुन्दर थे तथा शरीर के रोएँ चाँदी एवं ताँबे आदि धातुओं के बने हुए जान पड़ते थे। उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही सीताजी की आँखें आश्चर्य से खिल उठीं और वे बड़े स्नेह से उसकी ओर निहारने लगीं।
वह मायामय मृग भी श्रीराम की प्राणवल्लभा सीता को देखता और उस वन को प्रकाशित करता हुआ वहीं विचरने लगा। सीताने वैसा मृग पहले कभी नहीं देखा था। वह नाना प्रकार के रत्नों का ही बना जान पड़ता था। उसे देखकर जनककिशोरी सीता को बड़ा विस्मय हुआ।
