भाग-३८(38) सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रात्रि में तमसा-तट पर निवास, माता-पिता और अयोध्या के लिये चिन्ता तथा पुरवासियों को सोते छोड़कर वन की ओर जाना

 


तदनन्तर तमसा के रमणीय तट का आश्रय लेकर श्रीराम ने सीता की ओर देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण से इस प्रकार कहा - सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। हम लोग जो वन की ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवास की आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अत: अब तुम्हें नगर के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये। इन सूने वनों की ओर तो देखो, इनमें वन्य पशु-पक्षी अपने-अपने स्थान पर आकर अपनी बोली बोल रहे हैं। उनके शब्द से सारी वनस्थली व्याप्त हो गयी है, मानो ये सारे वन हमें इस अवस्था में देखकर खिन्न हो सब ओर से रो रहे हैं। 

‘आज मेरे पिता की राजधानी अयोध्या नगरी वन में आये हुए हम लोगों के लिये समस्त नर-नारियों सहित शोक करेगी, इसमें संशय नहीं है। पुरुषसिंह! अयोध्या के मनुष्य बहुत-से सद्गुणों के कारण महाराज में, तुममें, मुझमें तथा भरत और शत्रुघ्न में भी अनुरक्त हैं। इस समय मुझे पिता और यशस्विनी माता के लिये बड़ा शोक हो रहा है; कहीं ऐसा न हो कि वे निरन्तर रोते रहने के कारण अंधे हो जाएँ। परंतु भरत बड़े धर्मात्मा हैं। अवश्य ही वे धर्म, अर्थ और काम - तीनों के अनुकूल वचनों द्वारा पिताजी को और मेरी माता को भी सान्त्वना देंगे।' 

‘महाबाहो! जब मैं भरत के कोमल स्वभाव का बार-बार स्मरण करता हूँ, तब मुझे माता- पिता के लिये अधिक चिन्ता नहीं होती। नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुमने मेरे साथ आकर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है; क्योंकि तुम न आते तो मुझे विदेहकुमारी सीता की रक्षा के लिये कोई सहायक ढूँढ़ना पड़ता। सुमित्रानन्दन! यद्यपि यहाँ नाना प्रकार के जंगली फल- मूल मिल सकते हैं तथापि आज की यह रात मैं केवल जल पीकर ही बिताऊँगा। यही मुझे अच्छा जान पड़ता है। 

लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुमन्त्र से भी कहा – सौम्य ! अब आप घोड़ों की रक्षा पर ध्यान दें, उनकी ओर से असावधान न हों। 

सुमन्त्र ने सूर्यास्त हो जाने पर घोड़ों को लाकर बाँध दिया और उनके आगे बहुत-सा चारा डालकर वे श्रीराम के पास आ गये। फिर (वर्णानुकूल) कल्याणमयी संध्योपासना करके रात आयी देख लक्ष्मण सहित सुमन्त्र ने श्रीरामचन्द्रजी के शयन करने योग्य स्थान और आसन ठीक किया। तमसा के तट पर वृक्ष के पत्तों से बनी हुई वह शय्या देखकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीता के साथ उस पर बैठे। 

थोड़ी देर में सीता सहित श्रीराम को थककर सोया हुआ देख लक्ष्मण सुमन्त्र से उनके नाना प्रकार के गुणों का वर्णन करने लगे। सुमन्त्र और लक्ष्मण तमसा के किनारे श्रीराम के गुणों की चर्चा करते हुए रात भर जागते रहे। इतने ही में सूर्योदय का समय निकट आ पहुँचा। तमसा का वह तट गौओं के समुदाय से भरा हुआ था। श्रीरामचन्द्रजी ने प्रजाजनों के साथ वहीं रात्रि में निवास किया। वे प्रजाजनों से कुछ दूर पर सोये थे। 

महातेजस्वी श्रीराम तड़के ही उठे और प्रजाजनों को सोते देख पवित्र लक्षणों वाले भाई लक्ष्मण से इस प्रकार बोले - सुमित्राकुमार लक्ष्मण! इन पुरवासियों की ओर देखो, ये इस समय वृक्षों की जड़ से सटकर सो रहे हैं। इन्हें केवल हमारी चाह है। ये अपने घरों की ओर से भी पूर्ण निरपेक्ष हो गये हैं। हमें लौटा ले चलने के लिये ये जैसा उद्योग कर रहे हैं, इससे जान पड़ता है, ये अपना प्राण त्याग देंगे; किंतु अपना निश्चय नहीं छोड़ेंगे। अत: जब तक ये सो रहे हैं तभी तक हम लोग रथ पर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक यहाँ से चल दें। फिर हमें इस मार्ग पर और किसी के आने का भय नहीं रहेगा। अयोध्यावासी हम लोगों के अनुरागी हैं। जब हम यहाँ से निकल चलेंगे, तब उन्हें फिर अब इस प्रकार वृक्षों की जड़ों से सटकर नहीं सोना पड़ेगा। राजकुमारों का यह कर्तव्य है कि वे पुरवासियों को अपने द्वारा होने वाले दु:ख से मुक्त करें, न कि अपना दु:ख देकर उन्हें और दुःखी बना दें। 

यह सुनकर लक्ष्मण ने साक्षात् धर्म के समान विराजमान भगवान् श्रीराम से कहा – परम बुद्धिमान् आर्य! मुझे आपकी राय पसंद है। शीघ्र ही रथ पर सवार होइये। 

शोक और परिश्रम (थकावट) के मारे लोग सो गए और कुछ देवताओं की माया से भी उनकी बुद्धि मोहित हो गई। तब श्रीराम ने सुमन्त्र से कहा - हे तात! रथ के खोज मारकर (अर्थात पहियों के चिह्नों से दिशा का पता न चले इस प्रकार) रथ को हाँकिए। और किसी उपाय से बात नहीं बनेगी। प्रभो! आप जाइये और शीघ्र ही रथ जोतकर तैयार कीजिये। फिर मैं जल्दी ही यहाँ से वन की ओर चलूँगा। 

आज्ञा पाकर सुमन्त्र ने उन उत्तम घोड़ों को तुरंत ही रथ में जोत दिया और श्रीराम के पास हाथ जोड़कर निवेदन किया - महाबाहो! रथियों में श्रेष्ठ वीर! आपका कल्याण हो। आपका यह रथ जुता हुआ तैयार है। अब सीता और लक्ष्मण के साथ शीघ्र इस पर सवार होइये। 

श्रीरामचन्द्रजी सबके साथ रथ पर बैठकर तीव्र गति से बहने वाली भँवरों से भरी हुई तमसा नदी के उस पार गये। नदी को पार करके महाबाहु श्रीमान् राम ऐसे महान् मार्ग पर जा पहुँचे जो कल्याणप्रद, कण्टक रहित तथा सर्वत्र भय देखने वालों के लिये भी भय से रहित था। 

उस समय श्रीराम ने पुरवासियों को भुलावा देने के लिये सुमन्त्र से यह बात कही - सारथे ! (हम लोग तो यहीं उतर जाते हैं;) परंतु आप रथ पर आरूढ़ होकर पहले उत्तर दिशा की ओर जाइये। दो घड़ी तक तीव्र गति से उत्तर जाकर फिर दूसरे मार्ग से रथ को यहीं लौटा लाइये। जिस तरह भी पुरवासियों को मेरा पता न चले, वैसा एकाग्रता पूर्वक प्रयत्न कीजिये। 

श्रीरामजी का यह वचन सुनकर सारथी ने वैसा ही किया और लौटकर पुनः श्रीराम की सेवा में रथ उपस्थित कर दिया। तत्पश्चात् सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण, जो रघुवंश की वृद्धि करनेवाले थे, लौटाकर लाये गये उस रथ पर चढ़े। तदनन्तर सारथि ने घोड़ों को उस मार्ग पर बढ़ा दिया, जिससे तपोवन में पहुँचा जा सकता था। तदनन्तर सारथी सहित महारथी श्रीराम ने यात्रा कालिक मङ्गलसूचक शकुन देखने के लिये पहले तो उस रथ को उत्तराभिमुख खड़ा किया; फिर वे उस रथ पर आरूढ़ होकर वन की ओर चल दिये। 

इधर रात बीतने पर जब सवेरा हुआ, तब अयोध्यावासी मनुष्य श्रीरघुनाथजी को न देखकर अचेत हो गये। शोक से व्याकुल होने के कारण उनसे कोई भी चेष्टा करते न बनी। शोकजनित आँसू बहाते हुए अत्यन्त खिन्न हो गये तथा इधर-उधर उनकी खोज करने लगे। परंतु उन दु:खी पुरवासियों को श्रीराम किधर गये, इस बात का पता देनेवाला कोई चिह्न तक नहीं दिखायी दिया। 

बुद्धिमान् श्रीराम से विलग होकर वे अत्यन्त दीन हो गये। उनके मुख पर विषादजनित वेदना स्पष्ट दिखायी देती थी। वे मनीषी पुरवासी करुणा भरे वचन बोलते हुए विलाप करने लगे - हाय! हमारी उस निद्रा को धिक्कार है, जिससे अचेत हो जाने के कारण हम उस समय विशाल वक्ष वाले महाबाहु श्रीराम के दर्शन से वञ्चित हो गये हैं। जिनकी कोई भी क्रिया कभी निष्फल नहीं होती, वे तापस वेष धारी महाबाहु श्रीराम हम भक्तजनों को छोड़कर परदेश (वन) में कैसे चले गये? जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का पालन करता है, उसी प्रकार जो सदा हमारी रक्षा करते थे, वे ही रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम आज हमें छोड़कर वन को क्यों चले गये? 

'अब हम लोग यहीं प्राण दे दें या मरने का निश्चय करके उत्तर दिशा की ओर चल दें। श्रीराम से रहित होकर हमारा जीवन-धारण किसलिये हितकर हो सकता है?  अथवा यहाँ बहुत-से बड़े-बड़े सूखे काठ पड़े हैं, उनसे चिता जलाकर हम सब लोग उसी में प्रवेश कर जायें। यदि हमसे कोई श्रीराम का वृत्तान्त पूछेगा तो हम उसे क्या उत्तर देंगे ? क्या हम यह कहेंगे कि जो किसी के दोष नहीं देखते और सबसे प्रिय वचन बोलते हैं, उन महाबाहु श्रीरघुनाथजी को हमने वन में पहुँचा दिया है? हाय! यह अयोग्य बात हमारे मुँह से कैसे निकल सकती है ? 

‘श्रीराम के बिना हमलोगों को लौटा हुआ देखकर स्त्री, बालक और वृद्धों सहित सारी अयोध्यानगरी निश्चय ही दीन और आनन्दहीन हो जायगी। हम लोग वीरवर महात्मा श्रीराम के साथ सर्वदा निवास करने के लिये निकले थे। अब उनसे बिछुड़ कर हम अयोध्यापुरी को कैसे देख सकेंगे।' 

इस प्रकार अनेक तरह की बातें कहते हुए वे समस्त पुरवासी अपनी भुजा उठाकर विलाप करने लगे। वे बछड़ों से बिछुड़ी हुई अग्रगामिनी गौओं की भाँति दुःख से व्याकुल हो रहे थे। फिर रास्ते पर रथ की लीक देखते हुए सब-के-सब कुछ दूर तक गये; किंतु क्षणभर में मार्ग का चिह्न न मिलने के कारण वे महान् शोक में डूब गये। 

उस समय यह कहते हुए कि 'यह क्या हुआ? अब हम क्या करें? दैव ने हमें मार डाला' वे मनस्वी पुरुष ! रथ की लीक का अनुसरण करते हुए अयोध्या की ओर लौट पड़े। उनका चित्त क्लान्त हो रहा था। वे सब जिस मार्ग से गये थे, उसी से लौटकर अयोध्यापुरी में जा पहुँचे, जहाँ के सभी सत्पुरुष श्रीराम के लिये व्यथित थे। 

उस नगरी को देखकर उनका हृदय दुःख से व्याकुल हो उठा। वे अपने शोकपीड़ित नेत्रों द्वारा आँसुओं की वर्षा करने लगे। 

वे बोले - जिसके गहरे कुण्ड से वहाँ का नाग गरुड़ के द्वारा निकाल लिया गया हो, वह नदी जैसे शोभाहीन हो जाती है, उसी प्रकार श्रीराम से रहित हुई यह अयोध्यानगरी अब अधिक शोभा नहीं पाती है। उन्होंने देखा, सारा नगर चन्द्रहीन आकाश और जलहीन समुद्र के समान आनन्दशून्य हो गया है। पुरी की यह दुरवस्था देख वे अचेत से हो गये। उनके हृदय का सारा उल्लास नष्ट हो चुका था। वे दुःख से पीड़ित हो उन महान् वैभवसम्पन्न गृहों में बड़े क्लेश के साथ प्रविष्ट हो सबको देखते हुए भी अपने और पराये की पहचान न कर सके। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३८(38) समाप्त !

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