मारीच का वह कथन उचित और माननेयोग्य था तो भी जैसे मरने की इच्छावाला रोगी दवा नहीं लेता, उसी प्रकार उसके बहुत कहने पर भी रावण ने उसकी बात नहीं मानी।
काल से प्रेरित हुए उस राक्षसराज ने यथार्थ और हित की बात बताने वाले मारीच से अनुचित और कठोर वाणी में कहा - दूषित कुल में उत्पन्न मारीच ! तुमने मेरे प्रति जो ये अनाप-शनाप बातें कही हैं, ये मेरे लिये अनुचित और असंगत हैं, ऊसर में बोये हुए बीज के समान अत्यन्त निष्फल हैं। तुम्हारे इन वचनों द्वारा मूर्ख, पापाचारी और विशेषतः मनुष्य राम के साथ युद्ध करने अथवा उसकी स्त्री का अपहरण करने के निश्चय से मुझे विचलित नहीं किया जा सकता।
'एक स्त्री (कैकेयी) के मूर्खतापूर्ण वचन सुनकर जो राज्य, मित्र, माता और पिता को छोड़कर सहसा जंगल में चला आया है तथा जिसने युद्ध में खर का वध किया है, उस रामचन्द्र की प्राणों से भी प्यारी भार्या सीता का मैं तुम्हारे निकट ही अवश्य हरण करूँगा। मारीच! ऐसा मेरे हृदय का निश्चित विचार है, इसे इन्द्र आदि देवता और सारे असुर मिलकर भी बदल नहीं सकते। यदि इस कार्य का निर्णय करने के लिये तुमसे पूछा जाता 'इसमें क्या दोष है, क्या गुण है, इसकी सिद्धि में कौन- सा विघ्न है अथवा इस कार्य को सिद्ध करने का कौन-सा उपाय है' तो तुम्हें ऐसी बातें कहनी चाहिये थीं।'
‘जो अपना कल्याण चाहता हो, उस बुद्धिमान् मन्त्री को उचित है कि वह राजा से उसके पूछने पर ही अपना अभिप्राय प्रकट करे और वह भी हाथ जोड़कर नम्रता के साथ। राजाके सामने ऐसी बात कहनी चाहिये, जो सर्वथा अनुकूल, मधुर, उत्तम, हितकर, आदर से युक्त और उचित हो। राजा सम्मान का भूखा होता है। उसकी बात का खण्डन करके आक्षेप पूर्ण भाषा में यदि हितकर वचन भी कहा जाय तो उस अपमानपूर्ण वचन का वह कभी अभिनन्दन नहीं कर सकता।'
'निशाचर! अमित तेजस्वी महामनस्वी राजा अग्नि, इन्द्र, सोम, यम और वरुण – इन पाँच देवताओं के स्वरूप धारण किये रहते हैं, इसीलिये वे अपने में इन पाँचों के गुण- प्रताप, पराक्रम, सौम्यभाव, दण्ड और प्रसन्नता भी धारण करते हैं। अत: सभी अवस्थाओं में सदा राजाओं का सम्मान और पूजन ही करना चाहिये। तुम तो अपने धर्म को न जानकर केवल मोह के वशीभूत हो रहे हो। मैं तुम्हारा अभ्यागत- अतिथि हूँ तो भी तुम दुष्टतावश मुझसे ऐसी कठोर बातें कह रहे हो। राक्षस! मैं तुमसे अपने कर्तव्य के गुण-दोष नहीं पूछता हूँ और न यही जानना चाहता हूँ कि मेरे लिये क्या उचित है।'
‘अमितपराक्रमी मारीच! मैंने तो तुमसे इतना ही कहा था कि इस कार्य में तुम्हें मेरी सहायता करनी चाहिये। अच्छा, अब तुम्हें सहायता के लिये मेरे कथनानुसार जो कार्य करना है, उसे सुनो। तुम सुवर्णमय चर्म से युक्त चितकबरे रंग के मृग हो जाओ। तुम्हारे सारे अङ्ग में चाँदी की-सी सफेद बूँदें रहनी चाहिये। ऐसा रूप धारण करके तुम राम के आश्रम में सीता के सामने विचरो। एक बार विदेहकुमारी को लुभाकर जहाँ तुम्हारी इच्छा हो उधर ही चले जाओ।'
'तुम मायामय काञ्चन मृग को देखकर मिथिलेशकुमारी सीता को बड़ा आश्चर्य होगा और वह शीघ्र ही राम से कहेगी कि आप इसे पकड़ लाइये। जब राम तुम्हें पकड़ने के लिये आश्रम से दूर चले जायँ तो तुम भी दूर तक जाकर राम की बोली के अनुरूप ही -ठीक उन्हीं के स्वर में 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहकर पुकारना। तुम्हारी उस पुकार को सुनकर सीता की प्रेरणा से सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी स्नेहवश घबराये हुए अपने भाई के ही मार्ग का अनुसरण करेंगे।
‘इस प्रकार राम और लक्ष्मण दोनों के आश्रम से दूर निकल जाने पर मैं सुखपूर्वक सीता को हर लाँऊगा, ठीक उसी तरह जैसे इन्द्र शची को हर लाये थे। उत्तम व्रत का पालन करने वाले राक्षस मारीच ! इस प्रकार इस कार्य को सम्पन्न करके जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाना। मैं इसके लिये तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूँगा। सौम्य! अब इस कार्य की सिद्धि के लिये प्रस्थान करो। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो। मैं रथ पर बैठकर दण्डकवन तक तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा।'
'राम को धोखा देकर बिना युद्ध किये ही सीता को अपने हाथ में करके कृतार्थ हो तुम्हारे साथ ही लंका को लौट चलूँगा। मारीच ! यदि तुम इनकार करोगे तो तुम्हें अभी मार डालूँगा। मेरा यह कार्य तुम्हें अवश्य करना पड़ेगा। मैं बलप्रयोग करके भी तुमसे यह काम कराऊँगा। राजा के प्रतिकूल चलने वाला पुरुष कभी सुखी नहीं होता है।'
‘राम के सामने जाने पर तुम्हारे प्राण जाने का संदेहमात्र है, परंतु मेरे साथ विरोध करने पर तो आज ही तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। इन बातों पर बुद्धि लगाकर भलीभाँति विचार कर लो। उसके बाद यहाँ जो हितकर जान पड़े, उसे उसी प्रकार तुम करो।'
रावण ने जब राजा की भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीच ने निःशङ्क होकर उस राक्षसराज से कठोर वाणी में कहा - निशाचर! किस पापी ने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियों सहित तुम्हारे विनाश का यह मार्ग बताया है? राजन्! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है? किसने युक्ति से तुम्हें मौत द्वार पर जाने की यह सलाह दी है ? निशाचर! आज यह बात स्पष्टरूप से ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं।
‘राक्षसराज! तुम्हारे अहित का विचार रखने वाले किस नीच ने तुम्हें यह पाप करने का उपदेश दिया है? जान पड़ता है कि वह तुम्हें अपने ही कुकर्म से नष्ट होते देखना चाहता है। रावण! निश्चय ही वध के योग्य तुम्हारे वे मन्त्री हैं, जो कुमार्ग पर आरूढ़ हुए तुम जैसे राजा को सब प्रकार से रोक नहीं रहे हैं; किंतु तुम उनका वध नहीं करते हो।'
'अच्छे मन्त्रियों को चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्ग पर चलने लगे, उसे सब प्रकार से वे रोकें। तुम भी रोकने के ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं। विजयी वीरों में श्रेष्ठ निशाचर! मन्त्री अपने स्वामी राजा की कृपा से ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं। रावण! यदि स्वामी की कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है। राजा के दोष से दूसरे लोगों को भी कष्ट भोगना पड़ता है। विजयशीलों में श्रेष्ठ राक्षसराज ! धर्म और यश की प्राप्ति का मूल कारण राजा ही है; अतः सभी अवस्थाओं में राजा की रक्षा करनी चाहिये।
'रात्रि में विचरने वाले राक्षस! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनता के अत्यन्त प्रतिकूल चलने वाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजा से राज्य की रक्षा नहीं हो सकती। जो मन्त्री तीखे उपाय का उपदेश करते हैं, वे अपनी सलाह मानने वाले उस राजा के साथ ही दुःख भोगते हैं, जैसे जिनके सारथि मूर्ख हों, ऐसे रथ नीची-ऊँची भूमि में जाने पर सारथियों के साथ ही संकट में पड़ जाते हैं। उपयुक्त धर्म का 'अनुष्ठान करने वाले बहुत-से साधु-पुरुष इस जगत में दूसरों के अपराधसे परिवार सहित नष्ट हो गये हैं।'
‘रावण! प्रतिकूल बर्ताव और तीखे स्वभाववाले राजासे रक्षित होनेवाली प्रजा उसी तरह वृद्धि को नहीं प्राप्त होती है, जैसे गीदड़ या भेड़िये से पालित होनेवाली भेड़ें। रावण! जिनके तुम क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा हो, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे। काकतालीय न्याय के अनुसार मुझे तुमसे अकस्मात् ही यह घोर दुःख प्राप्त हो गया। इस विषय में मुझे तुम ही शोक के योग्य जान पड़ते हो; क्योंकि सेनासहित तुम्हारा नाश हो जायगा।'
'श्रीरामचन्द्रजी मुझे मारकर तुम्हारा भी शीघ्र ही वध कर डालेंगे। जब दोनों ही तरह से मेरी मृत्यु निश्चित है, तब श्रीराम के हाथ से होने वाली जो यह मृत्यु है, इसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा; क्योंकि शत्रु के द्वारा युद्ध में मारा जाकर प्राणत्याग करूँगा (तुम जैसे राजा के हाथ से बलपूर्वक प्राण दण्ड पाने का कष्ट नहीं भोगूँगा)।'
‘राजन्! यह निश्चित समझो कि श्रीराम के सामने जाकर उनकी दृष्टि पड़ते ही मैं मारा जाऊँगा और यदि तुमने सीता का हरण किया तो तुम अपने को भी बन्धु बान्धवों सहित मरा हुआ ही मानो। यदि तुम मेरे साथ जाकर श्रीराम के आश्रम से सीता का अपहरण करोगे, तब न तो तुम जीवित बचोगे और न मैं ही। न लंकापुरी रहने पायेगी और न वहाँ के निवासी राक्षस ही।
‘निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्म से रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं होती है। सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदों की कही हुई हितकर बातें नहीं स्वीकार करते हैं।'
