भाग-३७(37) श्रीराम का पुरवासियों से भरत और महाराज दशरथ के प्रति प्रेम भाव रखने का अनुरोध करते हुए लौट जाने के लिये कहना

 


उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वन की ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखने वाले बहुत- से अयोध्यावासी मनुष्य वन में निवास करने के लिये उनके पीछे-पीछे चल दिये। ‘जिसके जल्दी लौटने की कामना की जाये, उस स्वजन को दूर तक नहीं पहुँचाना चाहिये' – इत्यादि रूप से बताये गये सुहृद्धर्म के अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजी के रथ के पीछे-पीछे लगे हुए थे, वे अयोध्यावासी अपने घर की ओर नहीं लौटे। क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषों के लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रिय हो गये थे॥ उन प्रजाजनों ने श्रीराम से घर लौट चलने के लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिता के सत्य की रक्षा करने के लिये वन की ओर ही बढ़ते गये। 

वे प्रजाजनों को इस प्रकार स्नेहभरी दृष्टि से देख रहे थे मानो नेत्रों से उन्हें पी रहे हों। उस समय श्रीराम ने अपनी संतान के समान प्रिय उन प्रजाजनों से स्नेहपूर्वक कहा - अयोध्यानिवासियों का मेरे प्रति जो प्रेम और आदर है, वह मेरी ही प्रसन्नता के लिये भरत के प्रति और अधिक रूप में होना चाहिये। उनका चरित्र बड़ा ही सुन्दर और सबका कल्याण करनेवाला है। कैकेयी का आनन्द बढ़ाने वाले भरत आप लोगों का यथावत् प्रिय और हित करेंगे। 

‘वे अवस्था में छोटे होने पर भी ज्ञान में बड़े हैं। पराक्रमोचित गुणों से सम्पन्न होने पर भी स्वभाव के बड़े कोमल हैं। वे आपलोगों के लिये योग्य राजा होंगे और प्रजा के भय का निवारण करेंगे। वे मुझसे भी अधिक राजोचित गुणों से युक्त हैं, इसीलिये महाराज ने उन्हें युवराज बनाने का निश्चय किया है; अत: आपलोगों को अपने स्वामी भरत की आज्ञा का सदा पालन करना चाहिये। मेरे वन में चले जाने पर महाराज दशरथ जिस प्रकार भी शोक से संतप्त न होने पायें, इस बात के लिये आप लोग सदा चेष्टा रखें। मेरा प्रिय करने की इच्छा से आपको मेरी इस प्रार्थना पर अवश्य ध्यान देना चाहिये।' 

दशरथनन्दन श्रीराम ने ज्यों-ज्यों धर्म का आश्रय लेने के लिये ही दृढ़ता दिखायी, त्यों-ही-त्यों प्रजाजनों के मन में उन्हीं को अपना स्वामी बनाने की इच्छा प्रबल होती गयी। समस्त पुरवासी अत्यन्त दीन होकर आँसू बहा रहे थे और लक्ष्मण सहित श्रीराम मानो अपने गुणों में बाँधकर उन्हें खींचे लिये जा रहे थे। 

उनमें बहुत-से ब्राह्मण थे, जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल - तीनों ही दृष्टियों से बड़े थे। वृद्धावस्था के कारण कितनों के तो सिर काँप रहे थे। वे दूर से ही इस प्रकार बोले – अरे! ओ तेज चलने वाले अच्छी जाति के घोड़ो ! तुम बड़े वेगशाली हो और श्रीराम को वन की ओर लिये जा रहे हो, लौटो! अपने स्वामी के हितैषी बनो! तुम्हें वन में नहीं जाना चाहिये। यों तो सभी प्राणियों के कान होते हैं, परंतु घोड़ों के कान बड़े होते हैं; अत: तुम्हें हमारी याचना का ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये घर की ओर लौट चलो। 

'तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रत का दृढ़ता से पालन करनेवाले हैं, अत: तुम्हें इनका उपवहन करना चाहिये – इन्हें बाहर से नगर के समीप ले चलना चाहिये। नगर से वन की ओर इनका अपवहन करना - इन्हें ले जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है।' 

वृद्ध ब्राह्मणों को इस प्रकार आर्त भाव से प्रलाप करते देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा रथ से नीचे उतर गये। वे सीता और लक्ष्मण के साथ पैदल ही चलने लगे। ब्राह्मणों का साथ न छूटे, इसके लिये वे अपना पैर बहुत निकट रखते थे। लंबे डग से नहीं चलते थे। वन में पहुँचना ही उनकी यात्रा का परम लक्ष्य था। श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र में वात्सल्य - गुण की प्रधानता थी। उनकी दृष्टि में दया भरी हुई थी; इसलिये वे रथ के द्वारा चलकर उन पैदल चलने वाले ब्राह्मणों को पीछे छोड़ने का साहस न कर सके। 

श्रीराम को अब भी वन की ओर ही जाते देख वे ब्राह्मण मन-ही-मन घबरा उठे और अत्यन्त संतप्त होकर उनसे इस प्रकार बोले - रघुनन्दन! तुम ब्राह्मणों के हितैषी हो, इसी से यह सारा ब्राह्मण समाज तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा है। इन ब्राह्मणों के कंधों पर चढ़कर अग्निदेव भी तुम्हारा अनुसरण कर रहे हैं। वर्षा बीतने पर शरद् ऋतु में दिखायी देने वाले सफेद बादलों के समान हमारे इन श्वेत छत्रों की ओर देखो, जो तुम्हारे पीछे-पीछे चल पड़े हैं। ये हमें वाजपेय यज्ञ में प्राप्त हुए थे। तुम्हें राजकीय श्वेतच्छत्र नहीं प्राप्त हुआ, अतएव तुम सूर्यदेव की किरणों से संतप्त हो रहे हो। इस अवस्था में हम वाजपेय यज्ञ में प्राप्त हुए इन अपने छत्रों द्वारा तुम्हारे लिये छाया करेंगे। 

‘वत्स! हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रोंके पीछे चलती थी - उन्हीं के चिन्तन में लगी रहती थी, वही तुम्हारे लिये वनवास का अनुसरण करनेवाली हो गयी है। जो हमारे परम धन वेद हैं, वे हमारे हृदयों में स्थित हैं। हमारी स्त्रियाँ अपने चरित्रबल से सुरक्षित रहकर घरों में ही रहेंगी। अब हमें अपने कर्तव्य के विषय में पुन: कुछ निश्चय नहीं करना है। हमने तुम्हारे साथ जाने का विचार स्थिर कर लिया है। तो भी हमें इतना अवश्य कहना है कि जब तुम ही ब्राह्मण की आज्ञा के पालनरूपी धर्म की ओर से निरपेक्ष हो जाओगे, तब दूसरा कौन प्राणी धर्ममार्ग पर स्थित रह सकेगा।' 

'सदाचार का पोषण करनेवाले श्रीराम ! हमारे सिर के बाल पककर हंस के समान सफेद हो गये हैं और पृथ्वी पर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करने से इनमें धूल भर गयी है। हम अपने ऐसे मस्तकों को झुकाकर तुमसे याचना करते हैं कि तुम घर को लौट चलो (वे तत्त्वज्ञ ब्राह्मण यह जानते थे कि श्रीराम साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। इसीलिये उनका श्रीराम के प्रति प्रणाम करना दोष की बात नहीं है।) 

इतने पर भी जब श्रीराम नहीं रुके, तब वे ब्राह्मण बोले –  वत्स! जो लोग यहाँ आये हैं, इनमें बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया है; अब इनके यज्ञों की समाप्ति तुम्हारे लौटने पर ही निर्भर है। संसार के स्थावर और जन्में सभी प्राणी तुम्हारे प्रति भक्ति रखते हैं। वे सब तुमसे लौट चलने की प्रार्थना कर रहे हैं। अपने उन भक्तों पर तुम अपना स्नेह दिखाओ। ये वृक्ष अपनी जड़ों के कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसी से तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायु के वेग से इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं तुमसे लौट चलने की प्रार्थना कर रहे हैं। 

‘जो सब प्रकार की चेष्टा छोड़ चुके हैं, चारा चुगने के लिये भी कहीं उड़कर नहीं जाते हैं और निश्चितरूप से वृक्ष के एक स्थान पर ही पड़े रहते हैं, वे पक्षी भी तुमसे लौट चलने के लिये प्रार्थना कर रहे हैं; क्योंकि तुम समस्त प्राणियों पर कृपा करनेवाले हो।' 

इस प्रकार श्रीराम से लौटने के लिये पुकार मचाते हुए उन ब्राह्मणों पर मानो कृपा करने के लिये मार्ग में तमसा नदी दिखायी दी, जो अपने तिर्यक्-प्रवाह (तिरछी धारा) से श्रीरघुनाथजी को रोकती हुई-सी प्रतीत होती थी। वहाँ पहुँचने पर सुमन्त्र ने भी थके हुए घोड़ों को शीघ्र ही रथ से खोलकर उन सबको टहलाया, फिर पानी पिलाया और नहलाया, तत्पश्चात् तमसा के निकट ही चरने के लिये छोड़ दिया। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३७(37) समाप्त !


No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...