तदनन्तर इन्द्र अण्डकोष से रहित होकर बहुत डर गये। उनके नेत्रों में त्रास छा गया। वे अग्नि आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों और चारणों से इस प्रकार बोले – देवताओ! महात्मा गौतम की तपस्या में विघ्न डालने के लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है। ऐसा करके मैंने यह देवताओं का कार्य ही सिद्ध किया है। मुनि ने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोष से रहित कर दिया और अपनी पन्ती का भी परित्याग कर दिया। इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्या का अपहरण हुआ है।
'यदि मैं उनकी तपस्या में विघ्न नहीं डालता तो वे देवताओं का राज्य ही छीन लेते। अतः ऐसा करके मैंने देवताओं का ही कार्य सिद्ध किया है। इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुम सब लोग, ऋषिसमुदाय और चारणगण मिलकर मुझे अण्डकोष से युक्त करने का प्रयत्न करो।'
इन्द्र का यह वचन सुनकर मरुद्रणों सहित अग्नि आदि समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओं के पास जाकर बोले – पितृगण! यह आपका भेड़ा अण्डकोष से युक्त है और इन्द्र अण्डकोष रहित कर दिये गये हैं। अत: इस भेड़े के दोनों अण्डकोषों को लेकर आप शीघ्र ही इन्द्र को अर्पित कर दें। अण्डकोष से रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थान में आप लोगों को परम संतोष प्रदान करेगा। अत: जो मनुष्य आपलोगों की प्रसन्नता के लिये अण्डकोष रहित भेड़ा दान करेंगे, उन्हें आप लोग उस दान का उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे।
अग्नि की यह बात सुनकर पितृदेवताओं ने एकत्र हो भेड़े के अण्डकोषों को उखाड़कर इन्द्र के शरीर में उचित स्थान पर जोड़ दिया।
'ककुत्स्थनन्दन श्रीराम ! तभी से वहाँ आये हुए समस्त पितृ देवता अण्डकोष रहित भेड़ों को ही उपयोग में लाते हैं और दाताओं को उनके दान जनित फलों के भागी बनाते हैं। रघुनन्दन ! उसी समय से महात्मा गौतम के तपस्या जनित प्रभाव से इन्द्र को भेड़ों के अण्डकोष धारण करने पड़े। महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम पुण्यकर्मा महर्षि गौतम के इस आश्रम पर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहिल्या का उद्धार करो। इंद्र की माया के कारण ही यह तपस्विनी उसे पहचान कर भी उसके साथ सम्भोग कर बैठी।'
'सभी का कल्याण करने वाले श्रीराम! तुम निष्पाप हो। गौतम मुनि की स्त्री अहिल्या शापवश पत्थर की देह धारण किए बड़े धीरज से आपके चरणकमलों की धूलि चाहती है। हे रघुवीर! इस पर कृपा कीजिए।
विश्वामित्रजी का यह वचन सुनकर लक्ष्मण सहित श्रीराम ने उन महर्षि को आगे करके उस आश्रम में प्रवेश किया। वहाँ जाकर उन्होंने देखा – महासौभाग्यशालिनी अहिल्या अपनी तपस्या से देदीप्यमान हो रही हैं। इस लोक के मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता और असुर भी वहाँ आकर उन्हें देख नहीं सकते थे।
श्रीराम के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहिल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री रघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहिल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनंद के आँसुओं) की धारा बहने लगी।
उनका स्वरूप दिव्य था। विधाता ने बड़े प्रयत्न से उनके अंगों का निर्माण किया था। वे मायामयी - सी प्रतीत होती थीं। धूम से घिरी हुई प्रज्वलित अग्निशिखा - सी जान पड़ती थीं। ओले और बादलों से ढकी हुई पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा-सी दिखायी देती थीं तथा जल के भीतर उद्भासित होने वाली सूर्य की दुर्धर्ष प्रभा के समान दृष्टिगोचर होती थीं।
गौतम के शापवश श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन होने से पहले तीनों लोकों के किसी भी प्राणी के लिये उनका दर्शन होना कठिन था। श्रीराम का दर्शन मिल जाने से जब उनके शाप का अन्त हो गया, तब वे उन सबको दिखायी देने लगीं। उस समय श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ अहिल्या के दोनों चरणों का स्पर्श किया। महर्षि गौतम के वचनों का स्मरण करके अहिल्या ने बड़ी सावधानी के साथ उन दोनों भाइयों को आदरणीय अतिथि के रूप में अपनाया और पाद्य, अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका आतिथ्य सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजी ने शास्त्रीय विधि के अनुसार अहिल्या का वह आतिथ्य ग्रहण किया।
फिर प्रभु को अपने समीप देखकर अत्यंत निर्मल वाणी से उनकी इस प्रकार स्तुति की -
स्तुति (स्रोत-श्रीरामचरितमानस)
मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
भावार्थ:
मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगत को पवित्र करने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥
मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं॥
हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥
जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा॥
उस समय देवताओं की दुन्दुभि बज उठी। साथ ही आकाश से फूलों की बड़ी भारी वर्षा होने लगी। गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा महान् उत्सव मनाया जाने लगा। महर्षि गौतम के अधीन रहने वाली अहिल्या अपनी तपःशक्ति से विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त हुईं – यह देख सम्पूर्ण देवता उन्हें साधुवाद देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम भी अहिल्या को अपने साथ पाकर सुखी हो गये। उन्होंने श्रीराम की विधिवत् पूजा करके तपस्या आरम्भ की। महामुनि गौतम की ओर से विधिपूर्वक उत्तम पूजा - आदर-सत्कार पाकर श्रीराम भी मुनिवर विश्वामित्रजी के साथ मिथिलापुरी को चले गये।

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