शय्या पर पड़े हुए राजा को पुत्रशोक से व्याकुल देख पुत्र के ही शोक से पीड़ित हुई कौशल्या ने उन महाराज से कहा - नरश्रेष्ठ श्रीराम पर अपना विष उँडेलकर टेढ़ी चाल से चलने वाली कैकेयी केंचुल छोड़कर नूतन शरीर से प्रकट हुई सर्पिणी की भाँति अब स्वच्छन्द विचरेगी। जैसे घर में रहने वाला दुष्ट सर्प बारंबार भय देता रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्र को वनवास देकर सफल मनोरथ हुई सुभगा कैकेयी सदा सावधान होकर मुझे त्रास देती रहेगी। यदि श्रीराम इस नगर में भीख माँगते हुए भी घर में रहते अथवा मेरे पुत्र को कैकेयी का दास भी बना दिया गया होता तो वैसा वरदान मुझे भी अभीष्ट होता क्योंकि उस दशा में मुझे भी श्रीराम का दर्शन होता रहता। श्रीराम के वनवास का वरदान तो कैकेयी ने मुझे दुःख देने के लिये ही माँगा है।
‘कैकेयी ने अपनी इच्छा के अनुसार श्रीराम को उनके स्थान से भ्रष्ट करके वैसा ही किया है, जैसे किसी अग्निहोत्री ने पर्व के दिन देवताओं को उनके भाग से वञ्चित करके राक्षसों को वह भाग अर्पित कर दिया हो। गजराज के समान मन्द गति से चलने वाले वीर महाबाहु धनुर्धर श्रीराम निश्चय ही अपनी पत्नी और लक्ष्मण के साथ वन में प्रवेश कर रहे होंगे। महाराज! जिन्होंने जीवन में कभी दुःख नहीं देखे थे, उन श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को आपने कैकेयी की बातों में आकर वन में भेज दिया। अब उन बेचारों की वनवास के कष्ट भोगने के सिवा और क्या अवस्था होगी ?'
'रत्नतुल्य उत्तम वस्तुओं से वञ्चित वे तीनों तरुण सुखरूप फल भोगने के समय घर से निकाल दिये गये। अब वे बेचारे फल- मूल का भोजन करके कैसे रह सकेंगे ? क्या अब फिर मेरे शोक को नष्ट करने वाला वह शुभ समय आयेगा, जब मैं सीता और लक्ष्मण के साथ वन से लौटे हुए श्रीराम को देखूँगी? कब वह शुभ अवसर प्राप्त होगा जब कि 'वीर श्रीराम और लक्ष्मण वन से लौट आये' यह सुनते ही यशस्विनी अयोध्यापुरी के सब लोग हर्ष से उल्लसित हो उठेंगे और घर-घर फहराये गये ऊँचे-ऊँचे ध्वज - समूह पुरी की शोभा बढ़ाने लगेंगे।
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण को पुनः वन से आया हुआ देख यह अयोध्यापुरी पूर्णिमा के उमड़ते हुए समुद्र की भाँति कब हर्षोल्लास से परिपूर्ण होगी ? जैसे साँड़ गाय को आगे करके चलता है, उसी प्रकार वीर महाबाहु श्रीराम रथ पर सीता को आगे करके कब अयोध्यापुरी में प्रवेश करेंगे?कब यहाँ के सहस्रों मनुष्य पुरी में प्रवेश करते और राजमार्ग पर चलते हुए मेरे दोनों शत्रुदमन पुत्रों पर लावा (खील) की वर्षा करेंगे?'
‘उत्तम आयुध एवं खड्ग लिये शिखरयुक्त पर्वतों के समान प्रतीत होने वाले श्रीराम और लक्ष्मण सुन्दर कुण्डलों से अलंकृत हो कब अयोध्यापुरी में प्रवेश करते हुए मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट होंगे? कब ब्राह्मणों की कन्याएँ हर्षपूर्वक फूल और फल अर्पण करती हुई अयोध्यापुरी की परिक्रमा करेंगी ? कब ज्ञान में बढ़े- चढ़े और अवस्था में देवताओं के समान तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम उत्तम वर्षा की भाँति जनसमुदाय का लालन करते हुए यहाँ पधारेंगे?'
'वीर! इसमें संदेह नहीं कि पूर्व जन्म में मुझ नीच आचार- विचार वाली नारी ने बछड़ों के दूध पीने के लिये उद्यत होते ही उनकी माताओं के स्तन काट दिये होंगे। पुरुषसिंह! जैसे किसी सिंह ने छोटे से बछड़े वाली वत्सला गौ को बलपूर्वक बछड़े से हीन कर दिया हो, उसी प्रकार कैकेयी ने मुझे बलात् अपने बेटे से विलग कर दिया है। जो उत्तम गुणों से युक्त और सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रवीण हैं, उन अपने पुत्र श्रीराम के बिना मैं इकलौते पुत्र वाली माँ जीवित नहीं रह सकती।'
'अब प्यारे पुत्र श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को देखे बिना मुझमें जीवित रहने की कुछ भी शक्ति नहीं है। जैसे ग्रीष्म ऋतु में उत्कृष्ट प्रभा वाले भगवान् सूर्य अपनी किरणों द्वारा इस पृथ्वी को अधिक ताप देते हैं, उसी प्रकार यह पुत्रशोकजनित महान् अहितकारक अग्नि आज मुझे जलाये दे रही है।
नारियोंमें श्रेष्ठ कौशल्या को इस प्रकार विलाप करती देख धर्मपरायणा सुमित्रा यह धर्मयुक्त बात बोली - आर्ये! तुम्हारे पुत्र श्रीराम उत्तम गुणों से युक्त और पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। उनके लिये इस प्रकार विलाप करना और दीनता पूर्वक रोना व्यर्थ है, इस तरह रोने-धोने से क्या लाभ? बहिन! जो राज्य छोड़कर अपने महात्मा पिता को भलीभाँति सत्यवादी बनाने के लिये वन में चले गये हैं, वे तुम्हारे महाबली श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम उस उत्तम धर्म में स्थित हैं, जिसका सत्पुरुषों ने सर्वदा और सम्यक् प्रकार से पालन किया है तथा जो परलोक में भी सुखमय फल प्रदान करनेवाला है। ऐसे धर्मात्मा के लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये।
'निष्पाप लक्ष्मण समस्त प्राणियों के प्रति दयालु हैं। वे सदा श्रीराम के प्रति उत्तम बर्ताव करते हैं, अत: उन महात्मा लक्ष्मण के लिये यह लाभ की ही बात है। विदेहनन्दिनी सीता भी जो सुख भोगने के ही योग्य है, वनवास के दुःखों को भलीभाँति सोच-समझकर ही तुम्हारे धर्मात्मा पुत्र का अनुसरण करती है। जो प्रभु संसार में अपनी कीर्तिमयी पताका फहरा रहे हैं और सदा सत्यव्रत के पालन में तत्पर रहते हैं, उन धर्मस्वरूप तुम्हारे पुत्र श्रीराम को कौन-सा श्रेय प्राप्त नहीं हुआ है।'
'श्रीराम की पवित्रता और उत्तम माहात्म्य को जानकर निश्चय ही सूर्य अपनी किरणों द्वारा उनके शरीर को संतप्त नहीं कर सकते। सभी समयों में वनों से निकली हुई उचित सरदी और गरमी से युक्त सुखद एवं मङ्गलमय वायु श्रीरघुनाथजी की सेवा करेगी। रात्रिकाल में धूप का कष्ट दूर करने वाले शीतल चन्द्रमा सोते हुए निष्पाप श्रीराम का अपने किरणरूपी करों से आलिङ्गन और स्पर्श करके उन्हें आह्लाद प्रदान करेंगे।'
'श्रीराम के द्वारा रणभूमि में तिमिध्वज (शम्बर) के पुत्र दानवराज सुबाहु को मारा गया देख विश्वामित्रजी ने उन महातेजस्वी वीर को बहुत से दिव्यास्त्र प्रदान किये थे। वे पुरुषसिंह श्रीराम बड़े शूरवीर हैं। वे अपने ही बाहुबल का आश्रय लेकर जैसे महल में रहते थे, उसी तरह वन में भी निडर होकर रहेंगे। जिनके बाणों का लक्ष्य बनकर सभी शत्रु विनाश को प्राप्त होते हैं, उनके शासन में यह पृथ्वी और यहाँ के प्राणी कैसे नहीं रहेंगे?'
'श्रीराम की जैसी शारीरिक शोभा है, जैसा पराक्रम है और जैसी कल्याणकारिणी शक्ति है, उससे जान पड़ता है कि वे वनवास से लौटकर शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे। देवी! श्रीराम सूर्य के भी सूर्य (प्रकाशक) और अग्नि के भी अग्नि (दाहक) हैं। वे प्रभु के भी प्रभु, लक्ष्मी की भी उत्तम लक्ष्मी और क्षमा की भी क्षमा हैं। इतना ही नहीं वे देवताओं के भी देवता तथा भूतों के भी उत्तम भूत हैं। वे वन में रहें या नगर में, उनके लिये कौन-से चराचर प्राणी दोषावह हो सकते हैं।'
‘पुरुषशिरोमणि श्रीराम शीघ्र ही पृथ्वी, सीता और लक्ष्मी - इन तीनों के साथ राज्य पर अभिषिक्त होंगे। जिनको नगर से निकलते देख अयोध्या का सारा जनसमुदाय शोक के वेग से आहत हो नेत्रों से दुःख के आँसू बहा रहा है, कुश और चीर धारण करके वन को जाते हुए जिन अपराजित नित्यविजयी वीर के पीछे-पीछे सीता के रूप में साक्षात् लक्ष्मी ही गयी है, उनके लिये क्या दुर्लभ है ? जिनके आगे धनुर्धारियों में श्रेष्ठ लक्ष्मण स्वयं बाण और खड्ग आदि अस्त्र लिये जा रहे हैं, उनके लिये जगत में कौन-सी वस्तु दुर्लभ है ?'
'देवी! मैं तुमसे सत्य कहती हूँ। तुम वनवास की अवधि पूर्ण होने पर यहाँ लौटे हुए श्रीराम को फिर देखोगी, इसलिये तुम शोक और मोह छोड़ दो। कल्याणि! अनिन्दिते! तुम नवोदित चन्द्रमा के समान अपने पुत्र को पुनः अपने चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम करते देखोगी। राजभवन में प्रविष्ट होकर पुन: राजपद पर अभिषिक्त हुए अपने पुत्र को बड़ी भारी राजलक्ष्मी से सम्पन्न देखकर तुम शीघ्र ही अपने नेत्रों से आनन्द के आँसू बहाओगी।'
‘देवी! श्रीराम के लिये तुम्हारे मन में शोक और दुःख नहीं होना चाहिये; क्योंकि उनमें कोई अशुभ बात नहीं दिखायी देती । तुम सीता और लक्ष्मण के साथ अपने पुत्र श्रीराम को शीघ्र ही यहाँ उपस्थित देखोगी। पापरहित देवी! तुम्हें तो इन सब लोगों को धैर्य बँधाना चाहिये, फिर स्वयं ही इस समय अपने हृदय में इतना दुःख क्यों करती हो?'
'देवी! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि तुम्हें रघुकुलनन्दन राम जैसा बेटा मिला है। श्रीराम से बढ़कर सन्मार्ग में स्थिर रहने वाला मनुष्य संसार में दूसरा कोई नहीं है। जैसे वर्षाकाल के मेघों की घटा जल की वृष्टि करती है, उसी प्रकार तुम सुहृदों सहित अपने पुत्र श्रीराम को अपने चरणों में प्रणाम करते देख शीघ्र ही आनन्दपूर्वक आँसुओं की वर्षा करोगी। तुम्हारे वरदायक पुत्र पुन: शीघ्र ही अयोध्या में आकर अपने मोटे-मोटे कोमल हाथों द्वारा तुम्हारे दोनों पैरों को दबायेंगे। जैसे मेघमाला पर्वत को नहलाती है, उसी प्रकार तुम अभिवादन करके नमस्कार करते हुए सुहृदों सहित अपने शूरवीर पुत्र का आनन्द के आँसुओं से अभिषेक करोगी।'
बातचीत करने में कुशल, दोषरहित तथा रमणीय रूप वाली देवी सुमित्रा इस प्रकार तरह-तरह की बातों से श्रीराम माता कौशल्या को आश्वासन देती हुई उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गयीं। लक्ष्मण की माता का वह वचन सुनकर महाराज दशरथ की पत्नी तथा श्रीराम की माता कौशल्या का सारा शोक उनके शरीर (मन) में ही तत्काल विलीन हो गया। ठीक उसी तरह, जैसे शरद् ऋतु का थोड़े जल वाला बादल शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो जाता है।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३६(36) समाप्त !

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