भाग-३५(35) श्रीराम के वनगमन से रनिवास की स्त्रियों का विलाप, राजा दशरथ का पृथ्वी पर गिरना, श्रीराम के लिये विलाप करना, कैकेयी को अपने पास आने से मना करना और उसे त्याग देना

 


पुरुषसिंह श्रीराम ने माताओं सहित पिता के लिये दूर से ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्था में जब वे रथ द्वारा नगर से बाहर निकलने लगे, उस समय रनिवास की रानियों में बड़ा हाहाकार मच गया। 

वे रोती हुई कहने लगीं- 'हाय ! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनों की गति (सब सुखों की प्राप्ति कराने वाले) और शरण (समस्त आपत्तियों से रक्षा करनेवाले) थे, वे हमारे नाथ (मनोरथ पूर्ण करने वाले) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं? जो किसी के द्वारा झूठा कलंक लगाये जाने पर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलाने वाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगों को मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरों के दुःख में समवेदना प्रकट करने वाले राम कहाँ जा रहे हैं? 

'जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौशल्या के साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं? कैकेयी के द्वारा क्लेश में डाले गये महाराज के वन जाने के लिये कहने पर हम लोगों की अथवा समस्त जगत की रक्षा करने वाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं? अहो! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीव जगत के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीराम को वनवास के लिये देश निकाला दे रहे हैं।' 

इस प्रकार वे सब-की-सब रानियाँ बछड़ों से बिछुड़ी हुई गौओं की तरह दु:ख से आर्त होकर रोने और उच्चस्वर से क्रन्दन करने लगीं। अन्तःपुर में वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोक से संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दुःखी हो गये। उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थों के घर भोजन नहीं बना, प्रजाओं ने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये, हाथियों ने मुँह में लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओं ने बछड़ों को दूध नहीं पिलाया और पहले- पहल पुत्र को जन्म देकर भी कोई माता प्रसन्न नहीं हुई। 

त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रात में वक्रगति से चन्द्रमा के पास पहुँचकर दारुण (क्रूरकान्ति युक्त) होकर स्थित हो गये ।नक्षत्रों की कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये। वे सब के सब आकाश में विपरीत मार्ग पर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे। आकाश में छायी हुई मेघमाला वायु के वेग से उमड़े हुए समुद्र के समान प्रतीत होती थी। श्रीराम के वन को जाते समय वह सारा नगर जोर-जोर से हिलने लगा (वहाँ भूकम्प आ गया।) 

समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार सा छा गया। न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र। सहसा सारे नागरिक दीन दशा को प्राप्त हो गये। किसी ने भी आहार या विहार में मन नहीं लगाया। अयोध्यावासी सब लोग शोक परम्परा से संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथ को कोसने लगे॥ सड़क पर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था । सबका मुख आँसुओं से भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे। 

शीतल वायु नहीं चलती थी। चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था। सूर्य भी जगत को उचित मात्रा में ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था। सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था। बालक माँ-बाप को भूल गये। पतियों को स्त्रियों की याद नहीं आती थी और भाई भाई का स्मरण नहीं करते थे- सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीराम का ही चिन्तन करने लगे। जो श्रीराम के मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। शोक के भार से आक्रान्त होने के कारण वे रात में सोये तक नहीं। 

इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीराम से रहित होकर भय और शोक से प्रज्वलित सी होकर उसी प्रकार घोर हलचल में पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्र से रहित हुई मेरु पर्वत सहित यह पृथ्वी डगमगाने लगती है। हाथी, घोड़े और सैनिकों सहित उस नगरी में भयंकर आर्तनाद होने लगा। 

वन की ओर जाते हुए श्रीराम के रथ की धूल जब तक दिखायी देती रही, तब तक इक्ष्वाकुवंश के स्वामी राजा दशरथ ने उधर से अपनी आँखें नहीं हटायीं। वे महाराज अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्र को जबतक देखते रहे, तब तक पुत्र को देखने के लिये उनका शरीर मानो पृथ्वी पर बढ़ रहा था – वे ऊँचे उठ उठकर उनकी ओर निहार रहे थे। जब राजा को श्रीराम के रथ की धूल भी नहीं दिखायी देने लगी, तब वे अत्यन्त आर्त और विषाद ग्रस्त हो पृथ्वी पर गिर पड़े। 

उस समय उन्हें सहारा देने के लिये उनकी धर्मपत्नी कौशल्या देवी दाहिनी बाँह के पास आयीं और सुन्दरी कैकेयी उनके वामभाग में जा पहुँचीं। कैकेयी को देखते ही न्याय, विनय और धर्म से सम्पन्न राजा दशरथ की समस्त इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं; वे बोल उठे - पापपूर्ण विचार रखने वाली कैकेयी! तू मेरे अङ्गों का स्पर्श न कर। मैं तुझे देखना नहीं चाहता। तू न तो मेरी भार्या है और न बान्धवी। जो तेरा आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं। तूने केवल धन में आसक्त होकर धर्म का त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ। मैंने जो तेरा पाणिग्रहण किया है और तुझे साथ लेकर अग्रि की परिक्रमा की है, तेरे साथ का वह सारा सम्बन्ध इस लोक और परलोक के लिये भी त्याग देता हूँ। तेरा पुत्र भरत भी यदि इस विघ्न-बाधा से रहित राज्य को पाकर प्रसन्न हो तो वह मेरे लिये श्राद्ध में जो कुछ पिण्ड या जल आदि दान करे, वह मुझे प्राप्त न हो। 

तदनन्तर शोक से कातर हुई कौशल्या देवी उस समय धरती पर लोटने के कारण धूल से व्याप्त हुए महाराज को उठाकर उनके साथ राजभवन की ओर लौटीं। जैसे कोई जान-बूझकर स्वेच्छापूर्वक ब्राह्मण की हत्या कर डाले अथवा हाथ से प्रज्वलित अग्नि का स्पर्श कर ले और ऐसा करके संतप्त होता रहे, उसी प्रकार धर्मात्मा राजा दशरथ अपने ही दिये हुए वरदान के कारण वन में गये हुए श्रीराम का चिन्तन करके अनुतप्त हो रहे थे । राजा दशरथ बारंबार पीछे लौटकर रथ के मार्गों पर देखने का कष्ट उठाते थे। उस समय उनका रूप राहुग्रस्त सूर्य की भाँति अधिक शोभा नहीं पाता था। 

वे अपने प्रिय पुत्र का बारंबार स्मरण करके दु:ख से आतुर हो विलाप करने लगे। वे बेटे को नगर की सीमा पर पहुँचा हुआ समझकर इस प्रकार कहने लगे - हाय! मेरे पुत्र को वन की ओर ले जाते हुए श्रेष्ठ वाह्नों (घोड़ों) के पदचिह्न तो मार्ग में दिखायी देते हैं; परंतु उन महात्मा श्रीराम का दर्शन नहीं हो रहा है। जो मेरे श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम चन्दन से चर्चित हो तकियों का सहारा लेकर उत्तम शय्याओं पर सुख से सोते थे और उत्तम अलंकारों से विभूषित सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें व्यजन डुलाती थीं, वे निश्चय ही आज कहीं वृक्ष की जड़ का आश्रय ले अथवा किसी काठ या पत्थर को सिरके नीचे रखकर भूमि पर ही शयन करेंगे। 

'फिर अङ्गों में धूल लपेटे दीन की भाँति लंबी साँस खींचते हुए वे उस शयन--भूमि से उसी प्रकार उठेंगे, जैसे किसी झरने के पास से गजराज उठता है। निश्चय ही वन में रहनेवाले मनुष्य लोकनाथ महाबाहु श्रीराम को वहाँ से अनाथ की भाँति उठकर जाते हुए देखेंगे। जो सदा सुख भोगने के ही योग्य है, वह जनक की प्यारी पुत्री सीता आज अवश्य ही काँटों पर पैर पड़ने से व्यथा का अनुभव करती हुई वन को जायेगी।' 

‘वह वन के कष्टों से अनभिज्ञ है। वहाँ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं का गम्भीर तथा रोमाञ्चकारी गर्जन- तर्जन सुनकर निश्चय ही भयभीत हो जायेगी। अरी कैकेयी! तू अपनी कामना सफल कर ले और विधवा होकर राज्य भोग। मैं पुरुषसिंह श्रीराम के बिना जीवित नहीं रह सकता। 

इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथ ने मरघट से नहाकर आये हुए पुरुष की भाँति मनुष्यों की भारी भीड़ से घिरकर अपने शोकपूर्ण उत्तम भवन में प्रवेश किया। उन्होंने देखा, अयोध्यापुरी के प्रत्येक घर का बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है। क्योंकि उन घरों के सब लोग श्रीराम के पीछे चले गये थे। बाजार - हाट बंद है। जो लोग नगर में हैं, वे भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दु:ख से आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कों पर भी अधिक आदमी जाते-आते नहीं दिखायी देते हैं। सारे नगर की यह अवस्था देखकर श्रीराम के लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महल के भीतर गये, जैसे सूर्य मेघों की घटा में छिप जाते हैं। 

श्रीराम, लक्ष्मण और सीता से रहित वह राजभवन उस महान् अक्षोभ्य जलाशय के समान जान पड़ता था, जिसके भीतर के नाग को गरुड़ उठा ले गये हों। उस समय विलाप करते हुए राजा दशरथ ने गद्गद वाणी में द्वारपालों से यह मधुर, अस्पष्ट, दीनतायुक्त और स्वाभाविक स्वर से रहित बात कही - मुझे शीघ्र ही श्रीराम - माता कौसल्या के घर में पहुँचा दो; क्योंकि मेरे हृदय को और कहीं शान्ति नहीं मिल सकती। 

ऐसी बात कहते हुए राजा दशरथ को द्वारपालों ने बड़ी विनय के साथ रानी कौशल्या के भवन में पहुँचाया और पलंग पर सुला दिया। वहाँ कौसल्या के भवन में प्रवेश करके पलंग पर आरूढ़ हो जाने पर भी राजा दशरथ का मन चञ्चल एवं मलिन ही रहा। दोनों पुत्र और पुत्रवधू सीता से रहित वह भवन राजा को चन्द्रहीन आकाश की भाँति श्रीहीन दिखायी देने लगा।

उसे देखकर पराक्रमी महाराज ने एक बाँह ऊपर उठाकर उच्चस्वर से विलाप करते हुए कहा - हा राम ! तुम हम दोनों माता-पिता को त्याग दे रहे हो। जो नरश्रेष्ठ चौदह वर्षों की अवधि तक जीवित रहेंगे और अयोध्या में पुन: लौटे हुए श्रीराम को हृदय से लगाकर देखेंगे, वे ही वास्तव में सुखी होंगे। 

तदनन्तर अपनी काल रात्रि के समान वह रात्रि आने पर राजा दशरथ ने आधी रात होने पर कौशल्या से इस प्रकार कहा - कौशल्ये! मेरी दृष्टि श्रीराम के ही साथ चली गयी और वह अब तक नहीं लौटी है; अत: मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ। एक बार अपने हाथ से मेरे शरीर का स्पर्श तो करो। 

शय्या पर पड़े हुए महाराज दशरथ को श्रीराम का ही चिन्तन करते और लंबी साँस खींचते देख देवी कौशल्या अत्यन्त व्यथित हो उनके पास आ बैठीं और बड़े कष्ट से विलाप करने लगीं। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३५(35) समाप्त !

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