अन्न और जल से स्वयं उसका पूर्ण सत्कार करके मारीच ने प्रयोजन की बातें पूछते हुए उससे इस प्रकार कहा - आसन और जल आदि के द्वारा स्वयं ही उसका पूजन करके मारीच ने अर्थयुक्त वाणी में पूछा – राक्षसराज! तुम्हारे राज्य में लोगों की कुशल तो है न? तुम बड़ी उतावली के साथ आ रहे हो, इसलिये मेरे मन में कुछ खटका हुआ है। मैं समझता हूँ, तुम्हारे यहाँ का अच्छा हाल नहीं है।
मारीच के इस प्रकार पूछने पर बातचीत करने में कुशल महातेजस्वी रावण ने उससे इस प्रकार कहा – तात मारीच! मैं सब बता रहा हूँ। मेरी बात सुनो। इस समय मैं बहुत दु:खी हूँ और इस दुःख की अवस्था में तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देने वाले हो। तुम जनस्थान को जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत-से लक्ष्यवेध में कुशल शूरवीर निशाचर रहा करते थे। वे सभी राक्षस मेरी आज्ञा से वहाँ घर बनाकर रहते थे और उस विशाल वन में जो धर्माचरण करने वाले मुनि थे, उन्हें सताया करते थे।
‘वहाँ खर के मन का अनुसरण करने वाले तथा युद्धविषयक उत्साह से सम्पन्न चौदह हजार शूरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करने वाले थे। जनस्थान में निवास करने वाले जितने महाबली राक्षस थे, वे सब के सब उस समय अच्छी तरह सन्नद्ध होकर युद्ध क्षेत्र में राम के साथ जा भिड़े थे। वे खर आदि राक्षस नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करने में कुशल थे, परंतु युद्ध के मुहाने पर रोष में भरे हुए राम ने अपने मुँह से कोई कड़वी बात न कहकर बाणों के साथ धनुष का ही व्यापार आरम्भ किया।'
‘पैदल और मनुष्य होकर भी राम ने अपने दमकते हुए बाणों से भयंकर तेजवाले चौदह हजार राक्षसों का विनाश कर डाला और उसी युद्ध में खर को भी मौत के घाट उतार कर दूषण को भी मार गिराया। साथ ही त्रिशिरा का वध करके उसने दण्डकारण्य को दूसरों के लिये निर्भय बना दिया। उसके पिता ने कुपित होकर उसे पत्नी सहित घर से निकाल दिया है। उसका जीवन क्षीण हो चला है। यह क्षत्रियकुल-कलङ्क राम ही उस राक्षस सेना का घातक है।'
'वह शीलरहित, क्रूर, तीखे स्वभाव वाला, मूर्ख, लोभी, अजितेन्द्रिय, धर्मत्यागी, अधर्मात्मा और समस्त प्राणियों के अहित में तत्पर रहनेवाला है। जिसने बिना किसी वैर - विरोध के केवल बल का आश्रय ले मेरी बहिन के नाक- कान काटकर उसका रूप बिगाड़ दिया, उससे बदला लेने के लिये मैं भी उसकी देवकन्या के समान सुन्दरी पत्नी सीता को जनस्थान से बलपूर्वक हर लाऊँगा। तुम उस कार्य में मेरी सहायता करो।'
‘महाबली राक्षस! तुम जैसे पार्श्ववर्ती सहायक के और अपने भाइयों के बल पर ही मैं समस्त देवताओं की यहाँ कोई परवाह नहीं करता, अत: तुम मेरे सहायक हो जाओ; क्योंकि तुम मेरी सहायता करने में समर्थ हो। पराक्रम में, युद्ध में और वीरोचित अभिमान में तुम्हारे समान कोई नहीं है। नाना प्रकार के उपाय बताने में भी तुम बड़े बहादुर हो। बड़ी-बड़ी मायाओं का प्रयोग करने में भी विशेष कुशल हो। निशाचर! इसीलिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ। सहायता के लिये मेरे कथनानुसार तुम्हें कौन-सा काम करना है, वह भी सुनो।'
'तुम सोने के बने हुए मृग जैसा रूप धारण करके रजतमय बिन्दुओं से युक्त चितकबरे हो जाओ और राम के आश्रम में सीता के सामने विचरो। विचित्र मृग के रूप में तुम्हें देखकर सीता अवश्य ही अपने पति राम से तथा लक्ष्मण से भी कहेगी कि आप लोग इसे पकड़ लावें। जब वे दोनों तुम्हें पकड़ने के लिये दूर निकल जायँगे, तब मैं बिना किसी विघ्न-बाधा के सूने आश्रम से सीता को उसी तरह सुखपूर्वक हर लाऊँगा, जैसे राहु चन्द्रमा की प्रभा का अपहरण कर लेता है। उसके बाद स्त्री का अपहरण हो जाने से जब राम अत्यन्त दुःखी और दुर्बल हो जायगा, उस समय मैं निर्भय हो सुखपूर्वक उसके ऊपर कृतार्थचित्त से प्रहार करूँगा।'
रावण के मुख से श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा सुनकर मारीच का मुँह सूख गया। वह भय से थर्रा उठा। वह अपलक नेत्रों से देखता हुआ अपने सूखे ओठों को चाटने लगा। उसे इतना दुःख हुआ कि वह मुर्दा-सा दिखायी देने लगा। उसी अवस्था में उसने रावण की ओर देखा। उसे महान् वन में श्रीरामचन्द्रजी के पराक्रम का ज्ञान हो चुका था; इसलिये वह मन-ही-मन अत्यन्त भयभीत और दु:खी हो गया तथा हाथ जोड़कर रावण से यथार्थ वचन बोला। उसकी वह बात रावण के तथा अपने लिये भी हितकर थी।
राक्षसराज रावण का यह वचन सुनकर मारीच बोला – निशाचरशिरोमणे! मित्र के रूप में तुम्हारा वह कौन सा ऐसा शत्रु है, जिसने तुम्हें सीता को हर लेने की सलाह दी है ? कौन ऐसा पुरुष है, जो तुमसे सुख और आदर पाकर भी प्रसन्न नहीं है, अत: तुम्हारी बुराई करना चाहता है? कौन कहता है कि तुम सीता को यहाँ हर ले आओ ? मुझे उसका नाम बताओ। वह कौन है, जो समस्त राक्षस- जगत का सींग काट लेना चाहता है?
‘जो इस कार्य में तुम्हें प्रोत्साहन दे रहा है, वह तुम्हारा शत्रु है, इसमें संशय नहीं है। वह तुम्हारे हाथों विषधर सर्प के मुख से उसके दाँत उखड़वाना चाहता है। राजन्! किसने तुम्हें ऐसी खोटी सलाह देकर कुमार्ग पर पहुँचाया है? किसने सुखपूर्वक सोते समय तुम्हारे मस्तक पर लात मारी है। रावण! राघवेन्द्र श्रीराम वह गन्धयुक्त गजराज हैं, जिसकी गन्ध सुँघकर ही गजरूपी योद्धा दूर भाग जाते हैं। विशुद्ध कुल में जन्म ग्रहण करना ही उस राघवरूपी गजराज का शुण्ड दण्ड है, प्रताप ही मद है और सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत हैं। युद्धस्थल में उनकी ओर देखना भी तुम्हारे लिये उचित नहीं है; फिर जूझने की तो बात ही क्या है।'
'वे श्रीराम मनुष्य के रूप में एक सिंह हैं। रणभूमि के भीतर स्थित होना ही उनके अङ्गों की संधियाँ तथा बाल हैं। वह सिंह चतुर राक्षसरूपी मृगों का वध करनेवाला है, बाणरूपी अङ्गों से परिपूर्ण है तथा तलवारें ही उसकी तीखी दाढ़ें हैं। उस सोते हुए सिंह को तुम नहीं जगा सकते। राक्षसराज! श्रीराम एक पाताल तलव्यापी महासागर हैं, धनुष ही उस समुद्र के भीतर रहने वाला ग्राह है, भुजाओं का वेग ही कीचड़ है, बाण ही तरंगमालाएँ हैं और महान् युद्ध ही उसकी अगाध जलराशि है। उसके अत्यन्त भयंकर मुख अर्थात् बड़वानल में कूद पड़ना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है।'
'लंकेश्वर! प्रसन्न होओ। राक्षसराज ! सानन्द रहो और सकुशल लंका को लौट जाओ। तुम सदा पुरी में अपनी स्त्रियों के साथ रमण करो और राम अपनी पत्नी के साथ वन में विहार करें।'
