सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथ की भाँति चीरवस्त्र धारण करने लगीं, तब सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे - राजा दशरथ ! तुम्हें धिक्कार है !
वहाँ होनेवाले उस कोलाहल से दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ ने अपने जीवन, धर्म और यश की उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयी से इस प्रकार बोले - कैकेयी! सीता कुश - चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वन में जाने के योग्य नहीं है। यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखों में ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वन में जाने योग्य नहीं है। राजाओं में श्रेष्ठ जनक की यह तपस्विनी पुत्री क्या किसी का भी कुछ बिगाड़ती है? जो इस प्रकार जन-समुदाय के बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षुकी के समान चीर धारण करके खड़ी है?
'जनकनन्दिनी अपने चीर-वस्त्र उतार डाले। यह इस रूप में वन जाये ऐसी कोई प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसी को इस तरह का वचन ही दिया है। अत: राजकुमारी सीता सम्पूर्ण वस्त्रालंकारों से सम्पन्न हो सब प्रकार के रत्नों के साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वन को जा सकती है। मैं जीवित रहने योग्य नहीं हूँ। मैंने तेरे वचनों में बँधकर एक तो यों ही नियम (शपथ) पूर्वक बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर डाली है, दूसरे तूने अपनी नादानी के कारण सीता को इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ कर दिया। जिस प्रकार बाँस का फूल उसी को सुखा डालता है, उसी प्रकार मेरी की हुई प्रतिज्ञा मुझी को भस्म किये डालती है।'
‘नीच पापिनि! यदि श्रीराम ने तेरा कोई अपराध किया है तो (उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी) विदेहनन्दिनी सीता ने ऐसा दण्ड पाने योग्य तेरा कौन-सा अपकार कर डाला है? जिसके नेत्र हिरणी के नेत्रों के समान खिले हुए हैं, जिसका स्वभाव अत्यन्त कोमल एवं मधुर है, वह मनस्विनी जनकनन्दिनी तेरा कौन-सा अपराध कर रही है?'
'पापिनि! तूने श्रीराम को वनवास देकर ही पूरा पाप कमा लिया है। अब सीता को भी वन में भेजने और वल्कल पहनाने आदि का अत्यन्त दुःखद कार्य करके फिर तू इतने पातक किसलिये बटोर रही है? देवी! श्रीराम जब अभिषेक के लिये यहाँ आये थे, उस समय तूने उनसे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर मैंने उतने के लिये ही प्रतिज्ञा की थी। उसका उल्लङ्घन करके जो तू मिथिलेशकुमारी जानकी को भी वल्कल - वस्त्र पहने देखना चाहती है, इससे जान पड़ता है, तुझे नरक में ही जाने की इच्छा हो रही है।'
राजा दशरथ सिर नीचा किये बैठे हुए जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वन की ओर जाते हुए - श्रीराम ने पिता से इस प्रकार कहा - धर्मात्मन्! ये मेरी यशस्विनी माता कौशल्या अब वृद्ध हो चली हैं। इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है। देव! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं। इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा। वरदायक नरेश ! ये मेरे न रहनेसे शोक के समुद्र में डूब जायेगी। अतः आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें।
‘आप पूज्यतम पति से सम्मानित हो जिस प्रकार यह पुत्रशोक का अनुभव न कर सकें और मेरा चिन्तन करती हुई भी आपके आश्रय में ही ये मेरी तपस्विनी माता जीवन धारण करें, ऐसा प्रयत्न आपको करना चाहिये। इन्द्र के समान तेजस्वी महाराज ! ये निरन्तर अपने बिछुड़े हुए पुत्र को देखने के लिये उत्सुक रहेंगी। कहीं ऐसा न हो मेरे वन में रहते समय ये शोक से कातर हो अपने प्राणों को त्याग करके यमलोक को चली जाये। अतः आप मेरी माता को सदा ऐसी ही परिस्थिति में रखें, जिससे उक्त आशङ्का के लिये अवकाश न रह जाये।
श्रीराम की बात सुनकर और उन्हें मुनि वेष धारण किये देख स्त्रियों सहित राजा दशरथ शोक से अचेत हो गये। दु:ख से संतप्त होने के कारण वे श्रीराम की और भर आँख देख भी न सके और देखकर भी मन में दु:ख होने के कारण उन्हें कुछ उत्तर न दे सके। दो घड़ी अचेत-सा रहने के बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे महाबाहु नरेश श्रीराम का ही चिन्तन करते हुए दुःखी होकर विलाप करने लगे।
‘मालूम होता है, मैंने पूर्वजन्म में अवश्य ही बहुत-सी गौओं का उनके बछड़ों से विछोह कराया है अथवा अनेक प्राणियों की हिंसा की है, इसी से आज मेरे ऊपर यह संकट आ पड़ा है। समय पूरा हुए बिना किसी के शरीर से प्राण नहीं निकलते; तभी तो कैकेयी के द्वारा इतना क्लेश पाने पर भी मेरी मृत्यु नहीं हो रही है। ओह! अपने अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र को महीन वस्त्र त्यागकर तपस्वियों के से वल्कल वस्त्र धारण किये सामने खड़ा देख रहा हूँ फिर भी मेरे प्राण नहीं निकलते हैं। इस वरदानरूप शठता का आश्रय लेकर अपने स्वार्थसाधन के प्रयत्न में लगी हुई एकमात्र कैकेयी के कारण ये सब लोग महान् कष्ट में पड़ गये हैं।
ऐसी बात कहते-कहते राजा के नेत्रों में आँसू भर आये। उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं और वे एक ही बार 'हे राम !' कहकर मूर्च्छित हो गये। आगे कुछ न बोल सके।
दो घड़ी बाद होश में आते ही वे महाराज आँसूभरे नेत्रों से देखते हुए सुमन्त्र से इस प्रकार बोले - तुम सवारी के योग्य एक रथ को उसमें उत्तम घोड़े जोतकर यहाँ ले आओ और इन महाभाग श्रीराम को उस पर बिठाकर इस जनपद से बाहर तक पहुँचा आओ। अपने श्रेष्ठ वीर पुत्र को स्वयं माता-पिता ही जब घर से निकालकर वन में भेज रहे हैं, तब ऐसा मालूम होता है कि शास्त्र में गुणवान् पुरुषों के गुणों का यही फल बताया जाता है।
राजा की आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्रगामी सुमन्त्र गये और उत्तम घोड़ों से सुशोभित रथ जोतकर ले आये। फिर सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर कहा - महाराज ! राजकुमार श्रीराम के लिये उत्तम घोड़ों से जुता हुआ सुवर्णभूषित रथ तैयार है।
तब देश और काल को समझने वाले, सब ओर से शुद्ध (इहलोक और परलोक से उऋण) राजा दशरथ ने तुरंत ही धन-संग्रह के व्यापार में नियुक्त कोषाध्यक्ष को बुलाकर यह निश्चित बात कही - तुम विदेहकुमारी सीता के पहनने योग्य बहुमूल्य वस्त्र और महान् आभूषण जो चौदह वर्षों के लिये पर्याप्त हों, गिनकर शीघ्र ले आओ।
महाराज के ऐसा कहने पर कोषाध्यक्ष ने खजाने में जा वहाँ से सब चीजें लाकर शीघ्र ही सीता को समर्पित कर दीं। उत्तम कुल में उत्पन्न अथवा अयोनिजा और वनवास के लिये प्रस्थित विदेहकुमारी सीता ने सुन्दर लक्षणों से युक्त अपने सभी अङ्ग को उन विचित्र आभूषणों से विभूषित किया। उन आभूषणों से विभूषित हुई विदेह्नन्दिनी सीता उस घर को उसी प्रकार सुशोभित करने लगीं, जैसे प्रात: काल उगते हुए अंशुमाली सूर्य की प्रभा आकाश को प्रकाशित करती है।
उस समय सास कौशल्या ने कभी दुःखद बर्ताव न करनेवाली मिथिलेशकुमारी सीता को अपनी दोनों भुजाओं से कसकर छाती से लगा लिया और उनके मस्तक को सूँघकर कहा - बेटी! जो स्त्रियाँ अपने प्रियतम पति के द्वारा सदा सम्मानित होकर भी संकट में पड़ने पर उसका आदर नहीं करती हैं, वे इस सम्पूर्ण जगत में 'असती' (दुष्टा) के नाम से पुकारी जाती हैं। दुष्टा स्त्रियों का यह स्वभाव होता है कि पहले तो वे पतिके द्वारा यथेष्ट सुख भोगती हैं, परंतु जब वह थोड़ी-सी भी विपत्ति में पड़ता है, तब उस पर दोषारोपण करती और उसका साथ छोड़ देती हैं।
'जो झूठ बोलनेवाली, विकृत चेष्टा करनेवाली, दुष्ट पुरुषों से संसर्ग रखनेवाली, पति के प्रति सदा हृदयहीनता का परिचय देनेवाली, कुलटा, पाप के ही मनसूबे बाँधनेवाली और छोटी-सी बात के लिये भी क्षणमात्र में पति की ओर से विरक्त हो जानेवाली हैं, वे सब की सब असती या दुष्टा कही गयी हैं। उत्तम कुल, किया हुआ उपकार, विद्या, भूषण आदि का दान और संग्रह (पति के द्वारा स्नेहपूर्वक अपनाया जाना), यह सब कुछ दुष्टा स्त्रियों के हृदय को नहीं वश में कर पाता है; क्योंकि उनका चित्त अव्यवस्थित होता है।'
‘इसके विपरीत जो सत्य, सदाचार, शास्त्रों की आज्ञा और कुलोचित मर्यादाओं में स्थित रहती हैं, उन साध्वी स्त्रियों के लिये एकमात्र पति ही परम पवित्र एवं सर्वश्रेष्ठ देवता है। इसलिये तुम मेरे पुत्र श्रीराम का, जिन्हें वनवास की आज्ञा मिली है, कभी अनादर न करना। ये निर्धन हों या धनी, तुम्हारे लिये देवता के तुल्य हैं।'
सास के धर्म और अर्थयुक्त वचनों का तात्पर्य भलीभाँति समझकर उनके सामने खड़ी हुई सीता ने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा - आर्ये! आप मेरे लिये जो कुछ उपदेश दे रही हैं, मैं उसका पूर्णरूप से पालन करूँगी । स्वामी के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, यह मुझे भलीभाँति विदित है; क्योंकि इस विषय को मैंने पहले से ही सुन रखा है। पूजनीया माताजी! आपको मुझे असती स्त्रियों के समान नहीं मानना चाहिये; क्योंकि जैसे प्रभा चन्द्रमा से दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार मैं पतिव्रत धर्म से विचलित नहीं हो सकती। जैसे बिना तार की वीणा नहीं बज सकती और बिना पहिये का रथ नहीं चल सकता है, उसी प्रकार नारी सौ बेटों की माता होने पर भी बिना पति के सुखी नहीं हो सकती।
'पिता, भ्राता और पुत्र – ये परिमित सुख प्रदान करते हैं, परंतु पति अपरिमित सुख का दाता है - उसकी सेवा से इहलोक और परलोक दोनों में कल्याण होता है; अतः ऐसी कौन स्त्री है, जो अपने पति का सत्कार नहीं करेगी। आर्ये! मैंने श्रेष्ठ स्त्रियों - माता आदि के मुख से नारी के सामान्य और विशेष धर्मो का श्रवण किया है। इस प्रकार पातिव्रत्य का महत्त्व जानकर भी मैं पति का क्यों अपमान करूँगी? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्री का देवता है।'
सीता का यह मनोहर वचन सुनकर शुद्ध अन्तःकरणवाली देवी कौशल्या के नेत्रों से सहसा दुःख और हर्ष के आँसू बहने लगे।
तब परम धर्मात्मा श्रीराम ने माताओं के बीच में अत्यन्त सम्मानित होकर खड़ी हुई माता कौशल्या की ओर देख हाथ जोड़कर कहा - माँ! इन्हीं के कारण मेरे पुत्र का वनवास हुआ है; ऐसा समझकर तुम मेरे पिताजी की ओर दुःखित होकर न देखना। वनवास की अवधि भी शीघ्र ही समाप्त हो जायेगी। ये चौदह वर्ष तो तुम्हारे सोते-सोते निकल जायेंगे, फिर एक दिन देखोगी कि मैं अपने सुहृदों से घिरा हुआ सीता और लक्ष्मण के साथ सम्पूर्णरूप से यहाँ आ पहुँचा हूँ।
माता से इस प्रकार अपना निश्चित अभिप्राय बताकर दशरथनन्दन श्रीराम ने अन्य साढ़े तीन सौ स्त्रियों की ओर दृष्टिपात किया और उनको भी कौशल्या की ही भाँति शोकाकुल पाया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन सबसे यह धर्मयुक्त बात कही - माताओ! सदा एक साथ रहने के कारण मैंने जो कुछ कठोर वचन कह दिये हों अथवा अनजान में भी मुझसे जो अपराध बन गये हों, उनके लिये आप मुझे क्षमा कर दें। मैं आप सब माताओं से विदा माँगता हूँ।
उन सभी स्त्रियों ने श्रीरघुनाथजी का यह समाधानकारी धर्मयुक्त वचन सुना, सुनकर उन सबका चित्त शोक से व्याकुल हो गया। श्रीराम द्वारा ऐसी बात कहते समय वे सभी स्त्रियां कुररियों के समान विलाप करने लगीं। उनका वह आर्तनाद उस राजभवन में सब ओर गूंज उठा। राजा दशरथ का जो भवन पहले मुरज, पणव और मेघ आदि वाद्यों के गम्भीर घोष से गूँजता रहता था, वही विलाप और रोदन से व्याप्त हो संकट में पड़कर अत्यन्त दुःखमय प्रतीत होने लगा।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३३(33) समाप्त !

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