भाग-३२(32) श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र धारण तथा गुरु वशिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कल-धारण का अनौचित्य बताना



प्रधान मन्त्री की पूर्वोक्त बात सुनकर विनय के ज्ञाता श्रीराम ने उस समय राजा दशरथ से विनीत होकर कहा – राजन्! मैं भोगों का परित्याग कर चुका हूँ। मुझे वन के फल-मूलों से जीवन-निर्वाह करना है। जब मैं सब ओर से आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेना से क्या प्रयोजन है? जो श्रेष्ठ गजराज का दान करके उसके रस्से में मन लगाता है - लोभवश रस्से को रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथी का त्याग करने वाले पुरुष को उसके रस्से में आसक्ति रखने की क्या आवश्यकता है?

‘सत्पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरत को अर्पित करने की अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो माता कैकेयी की दासियाँ चीर (चिथड़े या वल्कल-वस्त्र) ला दें। दासियो ! जाओ, खन्ती और पेटारी अथवा कुदारी और खाँची ये दोनों वस्तुएँ लाओ। चौदह वर्षों तक वन में रहने के लिये ये चीजें उपयोगी हो सकती हैं।' 

कैकेयी लाज-संकोच छोड़ चुकी थी। वह स्वयं ही जाकर बहुत-सी चीर ले आयी और जनसमुदाय में श्रीरामचन्द्रजी से बोली - लो, पहन लो। 

पुरुषसिंह श्रीराम ने कैकेयी के हाथ से दो चीर ले लिये और अपने महीन वस्त्र उतारकर मुनियों के से वस्त्र धारण कर लिये। इसी प्रकार लक्ष्मण ने भी अपने पिता के सामने ही दोनों सुन्दर वस्त्र उतारकर तपस्वियों के से वल्कल-वस्त्र पहन लिये। तदनन्तर रेशमी-वस्त्र पहनने और धर्म पर ही दृष्टि रखने वाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहनने के लिये भी चीरवस्त्र को प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जाल को देखकर भयभीत हो जाती है। वे कैकेयी के हाथ से दो वल्कल वस्त्र लेकर लज्जित सी हो गयीं। उनके मन में बड़ा दुःख हुआ और नेत्रों में आँसू भर आये। 

उस समय उन्होंने गन्धर्वराज के समान तेजस्वी पति से इस प्रकार पूछा - नाथ! वनवासी मुनिलोग चीर कैसे बाँधते हैं? यह कहकर उसे धारण करने में कुशल न होने के कारण सीता बारम्बार मोह में पड़ जाती थीं - भूल कर बैठती थीं। 

चीर-धारण में कुशल न होने से जनकनन्दिनी सीता लज्जित हो एक वल्कल गले में डाल दूसरा हाथ में लेकर चुपचाप खड़ी रहीं। तब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम जल्दी से उनके पास आकर स्वयं अपने हाथों से उनके रेशमी वस्त्र के ऊपर वल्कल- वस्त्र बाँधने लगे। सीता को उत्तम चीरवस्त्र पहनाते हुए श्रीराम की ओर देखकर रनवास की स्त्रियाँ अपने नेत्रों से आँसू बहाने लगीं। 

वे सब अत्यन्त खिन्न होकर उदीप्त तेजवाले श्रीराम से बोलीं - पुत्र! मनस्विनी सीता को इस प्रकार वनवास की आज्ञा नहीं दी गयी है। प्रभो! तुम पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये जब तक निर्जन वन में जाकर रहोगे, तब तक इसी को देखकर हमारा जीवन सफल होने दो। पुत्र! तुम लक्ष्मण को अपना साथी बनाकर उनके साथ वन को जाओ, परंतु यह कल्याणी सीता तपस्वी मुनि की भाँति वन में निवास करने के योग्य नहीं है। पुत्र! तुम हमारी यह याचना सफल करो। भामिनी सीता यहीं रहे। तुम तो नित्य धर्मपरायण हो अतः स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते हो परंतु सीता को तो रहने दो। 

माताओं की ऐसी बातें सुनते हुए भी दशरथनन्दन श्रीराम ने सीता को वल्कल वस्त्र पहना ही दिया। पति के समान शीलस्वभाव वाली सीता के वल्कल धारण कर लेने पर राजा के गुरु वशिष्ठजी के नेत्रों में आँसू भर आया। उन्होंने सीता को रोककर कैकेयी से कहा - मर्यादा का उल्लङ्घन करके अधर्म की ओर पैर बढ़ाने वाली दुर्बुद्धि कैकेयी ! तू केकयराज के कुल की जीती-जागती कलङ्क है। अरी! राजा को धोखा देकर अब तू सीमा के भीतर नहीं रहना चाहती है? 

'शील का परित्याग करनेवाली दुष्टे! देवी सीता वन में नहीं जायेगी। राम के लिये प्रस्तुत हुए राजसिंहासन पर ये ही बैठेंगी। सम्पूर्ण गृहस्थों की पत्नियाँ उनका आधा अङ्ग हैं। इस तरह सीता देवी भी श्रीराम की आत्मा हैं; अतः उनकी जगह ये ही इस राज्य का पालन करेंगी। यदि विदेहनन्दिनी सीता श्रीराम के साथ वन में जायेगी तो हम लोग भी इनके साथ चले जायेंगे। यह सारा नगर भी चला जायेगा और अन्त: पुर के रक्षक भी चले जायेंगे। अपनी पत्नी के साथ श्रीरामचन्द्रजी जहाँ निवास करेंगे, वहीं इस राज्य और नगर के लोग भी धन-दौलत और आवश्यक सामान लेकर चले जायेंगे।' 

'भरत और शत्रुघ्न भी चीरवस्त्र धारण करके वन में रहेंगे और वहाँ निवास करने वाले अपने बड़े भाई श्रीराम की सेवा करेंगे। फिर तू वृक्षों के साथ अकेली रहकर इस निर्जन एवं सूनी पृथ्वी का राज्य करना । तू बड़ी दुराचारिणी है और प्रजा का अहित करने में लगी हुई है। याद रख, श्रीराम जहाँ के राजा न होंगे, वह राज्य राज्य नहीं रह जायेगा - उजाड़ हो जायेगा तथा श्रीराम जहाँ निवास करेंगे, वह वन एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन जायेगा।' 

‘यदि भरत राजा दशरथ से पैदा हुए हैं तो पिता के प्रसन्नतापूर्वक दिये बिना इस राज्य को कदापि लेना नहीं चाहेंगे तथा तेरे साथ पुत्रवत् बर्ताव करने के लिये भी यहाँ बैठे रहने की इच्छा नहीं करेंगे। तू पृथ्वी छोड़कर आसमान में उड़ जाये तो भी अपने पितृकुल के आचार-व्यवहार को जानने वाले भरत उसके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे। तूने पुत्र का प्रिय करने की इच्छा से वास्तव में उसका अप्रिय ही किया है; क्योंकि संसार में कोई ऐसा पुरुष नहीं है। जो श्रीराम का भक्त न हो।' 

‘कैकेय! तू आज ही देखेगी कि वन को जाते हुए श्रीराम के साथ पशु, सर्प, मृग और पक्षी भी चले जा रहे हैं। औरों की तो बात ही क्या, वृक्ष भी उनके साथ जाने को उत्सुक हैं। देवी! सीता तेरी पुत्रवधू हैं। इनके शरीर से वल्कल - वस्त्र हटाकर तू इन्हें पहनने के लिये उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण दे। इनके लिये वल्कल - वस्त्र देना कदापि उचित नहीं है।' 

ऐसा कहकर वशिष्ठ ने उसे जानकी को वल्कल-वस्त्र पहनाने से मना किया। 

वे फिर बोले - केकयराजकुमारी ! तूने अकेले श्रीराम के लिये ही वनवास का वर माँगा है सीता के लिये नहीं; अत: ये राजकुमारी वस्त्राभूषणों से विभूषित होकर सदा श्रृङ्गार धारण करके वन में श्रीरामचन्द्रजी के साथ निवास करें। राजकुमारी सीता मुख्य-मुख्य सेवकों तथा सवारियों के साथ सब प्रकार के वस्त्रों और आवश्यक उपकरणों से सम्पन्न होकर वन की यात्रा करें। तूने वर माँगते समय पहले सीता के वनवास की कोई चर्चा नहीं की थी अत: इन्हें वल्कल - वस्त्र नहीं पहनाया जा सकता। 

ब्राह्मणशिरोमणि अप्रतिम प्रभावशाली राजगुरु महर्षि वशिष्ठ के ऐसा कहने पर भी सीता अपने प्रियतम पति के समान ही वेशभूषा धारण करने की इच्छा रखकर उस चीर-धारण से विरत नहीं हुईं। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३२(32) समाप्त !

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