भाग-३१(31) राजा दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध

 


तब इक्ष्वाकुकुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञा से पीड़ित हो आँसू बहाते हुए लम्बी साँस खींचकर सुमन्त्र से फिर इस प्रकार बोले - सुमन्त्र! तुम शीघ्र ही रत्नों से भरी-पूरी चतुरङ्गिणी सेना को श्रीराम के पीछे-पीछे जाने की आज्ञा दो। रूप से आजीविका चलाने और सरस वचन बोलने वाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रय योग्य द्रव्यों का प्रसारण करने में कुशल वैश्य राजकुमार श्रीराम की सेनाओं को सुशोभित करें। जो श्रीराम के पास रहकर जीवन निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लों से ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकार का धन देकर उन्हें भी इनके साथ जाने की आज्ञा दे दो। 

‘मुख्य-मुख्य आयुध, नगर के निवासी, छकड़े तथा वन के भीतरी रहस्य को जानने वाले व्याध ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम के पीछे-पीछे जायें। वे रास्ते में आये हुए मृगों एवं हाथियों को पीछे लौटाते, जंगली मधु का पान करते और नाना प्रकार की नदियों को देखते हुए अपने राज्य का स्मरण नहीं करेंगे।' 

'श्रीराम निर्जन वन में निवास करने के लिये जा रहे हैं, अतः मेरा खजाना और अन्नभण्डार – ये दोनों वस्तुएँ इनके साथ जायें। ये वन के पावन प्रदेशों में यज्ञ करेंगे, उनमें आचार्य आदि को पर्याप्त दक्षिणा देंगे तथा ऋषियों से मिलकर वन में सुखपूर्वक रहेंगे। महाबाहु भरत अयोध्या का पालन करेंगे। श्रीमान् राम को सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न करके यहाँ से भेजा जाये।' 

जब महाराज दशरथ ऐसी बातें कहने लगे, तब कैकेयी को बड़ा भय हुआ। उसका मुँह सूख गया और उसका स्वर भी रुँध गया। वह केकयराजकुमारी विषादग्रस्त एवं त्रस्त होकर सूखे मुँह से राजा की ओर ही मुँह करके बोली – श्रेष्ठ महाराज! जिसका सारभाग पहले से ही पी लिया गया हो, उस आस्वादरहित सुरा को जैसे उसका सेवन करनेवाले लोग नहीं ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार इस धनहीन और सूने राज्य को, जो कदापि सेवन करने योग्य नहीं रह जायेगा, भरत कदापि नहीं ग्रहण करेंगे। 

कैकेयी लाज छोड़कर जब वह अत्यन्त दारुण वचन बोलने लगी, तब राजा दशरथ ने उस विशाललोचना कैकेयी से इस प्रकार कहा – अनार्ये! अहितकारिणि! तू राम को वनवास देने के दुर्बल भार में लगाकर जब मैं उस भार को ढो रहा हूँ, उस अवस्था में क्यों अपने वचनों का चाबुक मारकर मुझे पीड़ा दे रही है? इस समय जो कार्य तूने आरम्भ किया है अर्थात् श्रीराम के साथ सेना और सामग्री भेजने में जो प्रतिबन्ध लगाया है, इसके लिये तूने पहले ही क्यों नहीं प्रार्थना की थी? अर्थात् पहले ही यह क्यों नहीं कह दिया था कि श्रीराम को अकेले वन में जाना पड़ेगा, उनके साथ सेना आदि सामग्री नहीं जा सकती। 

राजा का यह क्रोधयुक्त वचन सुनकर सुन्दरी कैकेयी उनकी अपेक्षा दूना क्रोध करके उनसे इस प्रकार बोली - महाराज! क्या भरत आपका पुत्र नहीं ? क्या आप मुझे दाम देकर खरीद लाये हैं ? आपके ही वंश में पहले राजा सगर हो गये हैं, जिन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज को निकालकर उसके लिये राज्य का दरवाजा सदा के लिये बंद कर दिया था। इसी तरह इनको भी यहाँ से निकल जाना चाहिये। 

उसके ऐसा कहने पर राजा दशरथ ने कहा- 'धिक्कार है।' वहाँ जितने लोग बैठे थे सभी लाज से गड़ गये; किंतु वह अपने कथन के अनौचित्य को अथवा राजा द्वारा दिये गये धिक्कार के औचित्य को नहीं समझ सकी। उस समय वहाँ राजा के प्रधान और वयोवृद्ध मन्त्री सिद्धार्थ बैठे थे। वे बड़े ही शुद्ध स्वभाववाले और राजा के विशेष आदरणीय थे। 

उन्होंने कैकेयी से इस प्रकार कहा - देवी! असमञ्ज बड़ी दुष्ट बुद्धि का राजकुमार था। वह मार्ग पर खेलते हुए बालकों को पकड़कर सरयू के जल में फेंक देता था और ऐसे ही कार्यों से अपना मनोरञ्जन करता था। (इस कथा को विस्तृत रूप से जानने के लिए अध्याय-२ वंश चरित्र का भाग ३२ पढ़ें) 

'उसकी यह करतूत देखकर सभी नगरनिवासी कुपित हो राजा के पास जाकर बोले - राष्ट्र की वृद्धि करनेवाले महाराज! या तो आप अकेले असमञ्ज को लेकर रहिये या इन्हें निकालकर हमें इस नगर में रहने दीजिये। 

‘तब राजा ने उनसे पूछा - 'तुम्हें असमञ्ज से किस कारण भय हुआ है?'  राजा के पूछने पर उन प्रजाजनों ने यह बात कही - महाराज! यह हमारे खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चों को पकड़ लेते हैं और जब वे बहुत घबरा जाते हैं, तब उन्हें सरयू में फेंक देते हैं। मूर्खतावश ऐसा करके इन्हें अनुपम आनन्द प्राप्त होता है।' 

'उन प्रजाजनों की वह बात सुनकर राजा सगर ने उनका प्रिय करने की इच्छा से अपने उस अहितकारक दुष्ट पुत्र को त्याग दिया। पिता ने अपने उस पुत्र को पत्नी और आवश्यक सामग्री सहित शीघ्र रथ पर बिठाकर अपने सेवकों को आज्ञा दी -' इसे जीवनभर के लिये राज्य से बाहर निकाल दो। असमञ्ज ने फल और पिटारी लेकर पर्वतों की दुर्गम गुफाओं को ही अपने निवास के योग्य देखा और कन्द आदि लिये वह सम्पूर्ण दिशाओं में विचरने लगा। वह जैसा कि बताया गया है, पापाचारी था, इसलिये परम धार्मिक राजा सगर ने उसको त्याग दिया था। श्रीराम ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण इन्हें इस तरह राज्य पाने से रोका जा रहा है? '

‘हम लोग तो श्रीरामचन्द्रजी में कोई अवगुण नहीं देखते हैं; जैसे शुक्लपक्ष की द्वितीया के चन्द्रमा में मलिनता का दर्शन दुर्लभ है, उसी प्रकार इनमें कोई पाप या अपराध ढूँढ़ने से भी नहीं मिल सकता। अथवा देवी ! यदि तुम्हें श्रीरामचन्द्रजी में कोई दोष दिखायी देता हो तो आज उसे ठीक-ठीक बताओ। उस दशा में श्रीराम को निकाल दिया जा सकता है। जिसमें कोई दुष्टता नहीं है, जो सदा सन्मार्ग में ही स्थित है, ऐसे पुरुष का त्याग धर्म से विरुद्ध माना जाता है। ऐसा धर्मविरोधी कर्म तो इन्द्र के भी तेज को दग्ध कर देगा।' अत: देवी! श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक में विघ्न डालने से तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा। शुभानने! तुम्हें लोकनिन्दा से भी बचने की चेष्टा करनी चाहिये।' 

सिद्धार्थ की बातें सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त थके हुए स्वर से शोकाकुल वाणी में कैकेयी से इस प्रकार बोले - पापिनि! क्या तुझे यह बात नहीं रुची? तुझे मेरे या अपने हित का भी बिलकुल ज्ञान नहीं है? तू दुःखद मार्ग का आश्रय लेकर ऐसी कुचेष्टा कर रही है। तेरी यह सारी चेष्टा साधु पुरुषों के मार्ग के विपरीत है। अब मैं भी यह राज्य, धन और सुख छोड़कर श्रीराम के पीछे चला जाऊँगा। ये सब लोग भी उन्हीं के साथ जायेंगे। तू अकेली राजा भरत के साथ चिरकाल तक सुखपूर्वक राज्य भोगती रह। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३१(31) समाप्त !

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