(रावण के विषय में विस्तार से जानने के लिए अध्याय-३ वंश चरित्र को पढ़ें।)
उधर शूर्पणखा ने जब देखा कि श्रीराम ने भयंकर कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को अकेले ही मार गिराया तथा युद्ध के मैदान में दूषण, खर और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया, तब वह शोक के कारण मेघ गर्जना के समान पुन: बड़े जोर-जोर से घोर चीत्कार करने लगी। श्रीराम ने वह कर्म कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुष्कर है; यह अपनी आँखों देखकर वह अत्यन्त उद्विग्न हो उठी और रावण द्वारा सुरक्षित लंकापुरी को गयी।
वहाँ पहुँचकर उसने देखा, रावण पुष्पक विमान (या सतमहले मकान ) के ऊपरी भाग में बैठा हुआ है। उसका राजोचित तेज उद्दीप्त हो रहा है तथा मरुद्गुणों से घिरे हुए इन्द्र की भाँति वह आस-पास बैठे हुए मन्त्रियों से घिरा है। रावण जिस उत्तम सुवर्णमय सिंहासन पर विराजमान था, वह सूर्य के समान जगमगा रहा था। जैसे सोने की ईंटों से बनी हुई वेदी पर स्थापित अग्निदेव घी की अधिक आहुति पाकर प्रज्वलित हो उठे हों, उसी प्रकार उस स्वर्णसिंहासन पर रावण शोभा पा रहा था।
देवता, गन्धर्व, भूत और महात्मा ऋषि भी उसे जीतने में असमर्थ थे। समरभूमि में वह मुँह फैलाकर खड़े हुए यमराज की भाँति भयानक जान पड़ता था। देवताओं और असुरों के संग्राम के अवसरों पर उसके शरीर में वज्र और अनि जो घाव हुए थे, उनके चिह्न अबतक विद्यमान थे। उसकी छाती में ऐरावत हाथी ने जो अपने दाँत गड़ाये थे, उसके निशान अब भी दिखायी देते थे।
उसके बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे। उसके छत्र, चँवर और आभूषण आदि उपकरण देखने ही योग्य थे। वक्ष:स्थल विशाल था। वह वीर राजोचित लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देता था। वह अपने शरीर में जो बैदूर्यमणि (नीलम) का आभूषण पहने हुए था, उसके समान ही उसके शरीर की कान्ति भी थी। उसने तपाये हुए सोने के आभूषण भी पहन रखे थे। उसकी भुजाएँ सुन्दर, दाँत सफेद, मुँह बहुत बड़ा और शरीर पर्वत के समान विशाल था।
देवताओं के साथ युद्ध करते समय उसके अङ्गों पर सैकड़ों बार भगवान् विष्णु के चक्र का प्रहार हुआ था। बड़े-बड़े युद्धों में अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रों की भी उस पर मार पड़ी थी (उन सबके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे)। देवताओं के समस्त आयुधों के प्रहारों से भी जो खण्डित न हो सके थे, उन्हीं अङ्गों से वह अक्षोभ्य समुद्रों में भी क्षोभ (हलचल) पैदा कर देता था। वह सभी कार्य बड़ी शीघ्रता से करता था।
पर्वतशिखरों को भी तोड़कर फेंक देता था, देवताओं को भी रौंद डालता था। धर्म की तो वह जड़ ही काट देता था और परायी स्त्रियों के सतीत्व का नाश करनेवाला था।वह सब प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने वाला और सदा यज्ञों में विघ्न डालनेवाला था। एक समय पाताल की भोगवती पुरी में जाकर नागराज वासुकि को परास्त करके तक्षक को भी हराकर उसकी प्यारी पत्नी को वह हर ले आया था। इसी तरह कैलाश पर्वत पर जाकर कुबेर को युद्ध में पराजित करके उसने उनके इच्छानुसार चलने वाले पुष्पक विमान को अपने अधिकार में कर लिया।
वह पराक्रमी निशाचर क्रोधपूर्वक कुबेर के दिव्य चैत्ररथ वन को, सौगन्धिक कमलों से युक्त नलिनी नामवाली पुष्करिणी को, इन्द्र के नन्दनवन को तथा देवताओं के दूसरे दूसरे उद्यानों को नष्ट करता रहता था। वह पर्वत-शिखर के समान आकार धारण करके शत्रुओं को संताप देनेवाले महाभाग चन्द्रमा और सूर्य को उनके उदयकाल में अपने हाथों से रोक देता था। उस धीर स्वभाव वाले रावण ने पूर्वकाल में एक विशाल वन के भीतर दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को अपने मस्तकों की बलि दे दी थी।
उसके प्रभाव से उसे देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्पों से भी संग्राम में अभय प्राप्त हो गया था। मनुष्य के सिवा और किसी के हाथ से उसे मृत्यु का भय नहीं था। वह महाबली राक्षस सोमसवन कर्म विशिष्ट यज्ञों में द्विजातियों द्वारा वेदमन्त्रों के उच्चारण पूर्वक निकाले गये तथा वैदिक मन्त्रों से ही सुसंस्कृत एवं स्तुत हुए पवित्र सोमरस को वहाँ पहुँचकर नष्ट कर देता था।
समाप्ति के निकट पहुँचे हुए यज्ञों का विध्वंस करने वाला वह दुष्ट निशाचर ब्राह्मणों की हत्या तथा दूसरे दूसरे क्रूर कर्म करता था। वह बड़े ही रूखे स्वभाव का और निर्दय था। सदा प्रजाजनों के अहित में ही लगा रहता था। समस्त लोकों को भय देने वाले और सम्पूर्ण प्राणियों को रुलाने वाले अपने इस महाबली क्रूर भाई को राक्षसी शूर्पणखा ने उस समय देखा। वह दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से विभूषित था। दिव्य पुष्पों की मालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सिंहासन पर बैठा हुआ राक्षसराज पुलस्त्यकुलनन्दन महाभाग दशग्रीव प्रलयकाल में संहार के लिये उद्यत हुए महाकाल के समान जान पड़ता था।
